‘नीता पोरवाल’ की दो कवितायेँ

(नीता पोरवाल की प्रस्तुत कविताऐ श्रमिक जीवन की त्रासद स्थिति और भरपेटों के नकली दुखों की पड़ताल करती है...संपादक ) १-  कह सकोगे क्या ? हम मेहनतकशों की बाजुओं की ताकत और ज़ज्बा देख उद्व्गिन रहते हो त... Read More...

‘निलय उपाध्याय’ की दो कवितायेँ

कबीर नगर   तुम्हारा नगर तो अजीब है कबीर सच कहूं तो अदभुत, क्या तुम्हे पता था इसीलिए रच दिए एक साथ दो दो प्रतीक और किया उलटवासियों का विधान सच कहता हूं मजा आ गया उलट बांसिया उलट रही है ,पुलट रही है ... Read More...

शहीद एक प्रेरक चरित्र: सिने चर्चा (सैयद एस तौहीद)

अजीब विडम्बना है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में भगत सिंह पर दर्जनों फिल्मे आने के बाद भी क्या एक भी फिल्म भगत सिंह को उनके वास्तविक विचार के साथ चित्रित कर सकी है.....? जिस पर आज चर्चा की जा सके.....बावजूद इसके... Read More...

पिंजर पर टंगी त्वचा एवं अन्य कविता (पुलकित फिलिप)

23 वर्षीय भगत सिंह आज तक युवाओं के प्रेरणा श्रोत हैं ..... यह अलग बात है कि कम ही युवा पीढ़ी भगत सिंह को महज़ एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं उन्हें उनके सम्पूर्ण विचार के साथ जानती पहचानती है, और यह बात कहने से नह... Read More...

…और फिर परिवार: कहानी (मज्कूर आलम)

मज़्कूर आलम की कहानी 'और फिर परिवार' एक बेहद मजबूर, बेबस और लाचार लड़की की त्रासदी लगी, जो खुद को विकल्पहीन महसूस कर आत्महत्या कर लेती है, लेकिन पुनर्पाठ में लगा कि कई बार स्थितियां आपसे बलिदान मांगती हैं। रतिका... Read More...

‘विमल कुमार’ की तीन कविताएँ

(दंगे इंसानियत के माथे पर कलंक की तरह होते हैं और जिनोसाइड जैसी अमानवीय कृत्य से इंसानियत शर्मसार होती है. दंगो में मारे गए लोग चाहे किसी धर्म/जाति/नस्ल/लिंग  के हों बेबात मारे जाते हैं और न्याय-तंत्र सबूतों के... Read More...

‘श्वेता मिश्र’ की कवितायें

नाइजीरिया में फैशन डिजाईनर के रूप कार्यरत 'श्वेता मिश्र' की कवितायें निच्छलता के साथ मुक्त रूप से स्त्री मन की उस अभिव्यंजना के तरह नज़र आती हैं जो न केवल लेखकीय अभिव्यक्ति है बल्कि कहा जाय कि वर्तमान सामाजिक मा... Read More...

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं य... Read More...

क्या हम भगत सिंह को जानते हैं …? संपादकीय (हनीफ मदार)

क्या हम भगत सिंह को जानते हैं ...?  हनीफ मदार ऐसे समय में जब पूंजीवादी व्यवस्थाओं के दमन से आर्थिक व सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है जो सामाजिक राष्ट्रीय विघटन को तो जन्म दे ही रहा है साथ ही स्वार्थ और संकीर्णता ... Read More...