‘आया हमीं में से है’: अखिलेश्वर पांडेय की कविताएँ…

अखिेलश्वर पांडेय का एक कविता संग्रह ‘पानी उदास है’ हालिया प्रकाश्य है। भारी-भरकम शब्दावलियों से बाहर फिजाओं में तत्सम और तद्भव के बीच तैर रहे देसी आमफहम शब्दों से लैस इनकी कविता पढऩे पर एकबारगी यह कवितानुमा लगत... Read More...

एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं: हृषिकेश सुलभ

एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं:  15 फरवरी 1955 को बिहार के सीवान जिले के लहेजी ग्राम में स्वतंत्रता सेनानी रमाशंकर श्रीवास्तव के आंगन में एक बच्चे का जन्म हुआ जो अपनी प्रारंभिक पढाई के ... Read More...

जब ग़ज़ल मेहराबान होती है: समीक्षालेख (प्रदीप कांत)

कभी कतील शिफाई ने कहा था- लाख परदों में रहूँ, भेद मेरे खोलती है, शायरी सच बोलती है| अशोक भी इस तरह के सच का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तभी कह पाते हैं-  "मुझे ज़रूर कोई जानता है अन्दर तक मेरे खिलाफ़ ये सच्चा... Read More...

जिनकी दुआ को तरसे जमाना, उन्हें भी दुआ नसीब हो : समीक्षा लेख (पद्मा शर्मा)

जीवन जीने के लिए शरीर के समस्त अंग और अवयव अपनी-अपनी अहमियत रखते हैं। शरीर का कोई भी अंग यदि अपूर्ण है तो जीवन की दौड़ में कई बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। समाज की विवाह संस्था की मूल धुरी पर आधारित जिन शारीरिक अव... Read More...

बेवकूफी का सौन्दर्य: समीक्षा (आरिफा एविस)

"पूरी वर्णमाला में मेरे और तेरे और 'ञ' के अलावा और कोई स्त्रीलिंग नहीं है. .... क्या पता खूब सारे स्त्रीलिंग शब्द रहे हों लेकिन उनको मिटा दिया गया हो जिस तरह आज लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है. क्या पता वर्... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘चौथी क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

1949 में फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सिमोन द बुआ ने ‘सेकिंड सेक्स’ पुस्तक लिखी। इसमें अपने मित्र अस्तित्ववादी फ्रांसीसी लेखक-चिंतक ज्याँ पाल सात्र से सहमत होते हुए स्त्रीवाद-अस्तित्ववाद के प... Read More...

एक अकेली स्त्री से मिलकर, एवं अन्य कविताएँ (डॉ० रंजना जयसवाल)

विवशता, कोमलता, आक्रान्त एवं संवेदनात्मक स्पंदन जैसे सूक्ष्म प्राकृतिक रूपों में प्रत्यक्ष स्त्री के मानसिक, दैहिक और वैचारिक मनोभावों को खोजने और समझने का प्रयास करतीं डॉ० रंजना जयसवाल की कवितायें....... एक... Read More...

‘डॉ. राकेश जोशी’ की ग़ज़लें:

डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लों को दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली ग़ज़लें माना जाता है. उनकी ग़ज़लों में आम-जन की पीड़ा एवं संघर्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है, इसलिए ये आज के इस दौर में भीड़ से बिलकुल अल... Read More...

शांतिनिकेतन की यात्रा : संस्मरण (बाबा मायाराम)

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था, क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से... Read More...