शातिर आँखें: एवं अन्य कविताएँ (डॉ० मोहसिन खान ‘तनहा’)

इंसानी हकों के उपेक्षित और अनछुए से पहलुओं के मानवीय ज़ज्बातों को चित्रित करतीं 'डॉ० मोहसिन खान 'तनहा' का कवितायें  शातिर आँखें  डा0 मोहसिन खान ‘तनहा कई जगह, कई आँखें पीछा कर रही हैं आपका क़ैद कर रही हैं ... Read More...

कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘पाँचवीं क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय”  द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की पांचवीं क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक  "एक तरफ किसानों को ल... Read More...

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृ... Read More...

एक कमज़ोर लड़की की कहानी: कहानी (सूरज प्रकाश)

उस दिन की बात वहीं खत्‍म हो गयी थी। बाद में बेशक कई बार फेसबुक पर उनकी हरी बत्‍ती उनके मौजूद होने का संकेत दे रही थी लेकिन मैंने कभी अपनी तरफ से पहल करके उन्‍हें डिस्‍टर्ब नहीं किया था। कभी करता भी नहीं। किसी क... Read More...

‘मृगतृष्णा’ की कवितायें……

मृगतृष्णा की कविताएँ पढ़ते हुए महज़ पढ़ी नहीं जाती बल्कि मानवीय आन्तरिकता से होकर निकलती महसूस होती हैं ...... पत्नी   google से साभार आजकल उजाला होने से ठीक पहले पत्नी की आँखें देखने लगती हैं पके सावन... Read More...

ए गुड सेकेण्ड बॉय : संस्मरण (पद्मनाभ गौतम)

हिन्दी की पुस्तकों के पीछे जैसे पागल था मैं! पुस्तक-महल से छपी पुस्तक ’संसार के 501 अद्भुत आश्चर्य’ जब बैकुण्ठपुर के बस-स्टैंड की पुस्तक-दुकान पर बिकने आई, तो उसे महीनों तक दुकान के सामने खड़े होकर निहारता रहा व... Read More...

अतुल्य भारत की अतुल्य तस्वीर : व्यंग्य (विवेक दत्त मथुरिया)

जब कोई शख्य किसी भी अतुल्यता के अतुल्य सच को कहने की जुर्रत करता है तो अतुल्य सहिष्णुता अतुल्य असहिष्णुता में तब्दील हो जाती है। अगर आज कबीर दास कुछ कहते तो वह भी इसी अतुल्य असहिष्णुता का शिकार हो गए होते। अच्छ... Read More...

डॉ0 अनीता सिंह की गज़लें…..

इंसानी ज़ज्बातों से होकर जीवन स्पंदन की तरह हरहराती किसी हवा सी गुज़रतीं अनीता सिंह की कुछ ग़ज़लें........ डॉ0 अनीता सिंह की गज़लें.....  डॉ0 अनीता सिंह १-  ऐसा न था कि पुकारे नहीं थे वो सुनते हीं क्यों जो हमा... Read More...

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृ... Read More...

वह किसान नहीं है….?: (हनीफ मदार)

वह किसान नहीं है….?  हनीफ मदार किसान और किसानी पर बातें तो खूब होती रहीं हैं उसी तादाद में होती रही हैं किसानों की आत्महत्याएं | बावजूद इसके कोई ठोस नीति किसानों के हक़ में अब तक नहीं बन पाई | हालांकि ऐसा भी ... Read More...