“शास्त्र से संवाद” : समीक्षा (अभिषेक कुमार उपाध्याय)

प्रस्तुत पुस्तक 'नामवर के नोट्स' संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान 'संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप नि... Read More...

मदारी: लघुकथा (दिलीप कुमार)

हमरंग हमेशा से ही उभरते नए कलमकारों का स्वागत करता रहा है बिना उनकी शिल्प और शैली पर ज्यादा ध्यान के हाँ किन्तु विषय-वस्तु और वैचारिक प्रवाह के साथ उसमें एक संभावनाशील कलमकार दिखाई देता हो | हमरंग के इस प्रयास ... Read More...

कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘चौथी क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय”  द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की चौथी क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक  अली  शाह  के  छोटे भाई ... Read More...

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृ... Read More...

‘सूफी सुरेन्द्र चतुर्वेदी’ की गज़लें……

'सूफी सुरेन्द्र चतुर्वेदी' की ग़ज़लें वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक हालातों का साहित्यिक आईना हैं इनसे गुज़रते हुए शब्दों के बीच से ताज़ा बिम्बों का जीवंत हो उठना इन गजलों की सार्थकता है |  'सूफी सुरेन्द्र चतुर्वेदी... Read More...

कटी नाक, जुड़ी नाक: कहानी (अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’)

'अमरपाल सिंह' की कहानियों में भाषाई पकड़ और कहानीपन निश्चित ही एक प्रौड़ कथाकार होने का आभास कराता है | प्रस्तुत लघुकहानी में भी अमरपाल सिंह में एक संभावनाशील लेखक के तेवर नज़र आते हैं ......|- संपादक  कटी नाक,... Read More...

बिहार वाली बस : लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

"ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा." एक चुप्पी के बाद... Read More...

नये स्वरों की वाहिका-‘वाड्.मय’ पत्रिका :समीक्षा (डॉ अल्पना सिंह)

इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्राप्त है। यह वर्ग आज से नहीं बल्कि सदियों से समाज की प्रताड़न... Read More...

झोपड़पट्टी: नाटक (राजेश कुमार)

'राजेश कुमार' ऐसे इकलौते हिंदी नाटककार हैं जो निरंतरता में ऐसे नाट्यालेखों को लिख रहे हैं जो यथा स्थिति ही बयान नहीं करते बल्कि वे एक चेतना भी पैदा करते हैं और प्रतिरोध भी |  उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर ... Read More...

हिंदी-उर्दू द्वंद्व और टोपी शुक्ला: आलेख (मोहम्मद हुसैन डायर)

राही मासूम रज़ा की कृतियों के पात्र भाषायी द्वंद्व से जूझते देखे जा सकते हैं। आधा गांव जहां उर्दू और आंचलिक भाषा  में उलझा हुआ है, वहीं टोपी शुक्ला हिंदी उर्दू विवाद पर लंबी बहस कर पाठकों को झकझोर देने वाले संवा... Read More...