कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘छटवीं और अंतिम क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय”  द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की छटवीं और अंतिम क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक  कश्मीर में आन... Read More...

हाकिम कथा: कहानी (अखिलेश)

"रजाई के भीतर आते ही उसे पास में पुनीत की अनुभूति होने लगती थी। अचानक वह भय से सिहर गई। हमेशा ऐसा ही होता रजाई उसे मादकता की नदी में डुबोकर खौफ़ की झाड़ी में फेंक देती थी। वर्तमान का अहसास ख़ौफ की झाड़ी ही था उ... Read More...

मुल्ला जी की गाय : व्यंग्य (अनीता मिश्रा)

टुन्ना पंडित को ये समस्या राम मंदिर जैसी बड़ी पेचीदा समस्या लगी इसलिए तत्काल एक पुड़िया निकाली.. मुहं में डाल कर बोले..मुल्ला जी समस्या बहुत कठिन है, वो भी आजकल के माहौल में...अब मोहल्ले की बात है तो कुछ तो करना ... Read More...

स्मृतियाँ एवं अन्य कवितायें : रूपाली सिन्हा

वर्तमान समय की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में कुछ सुनहले पल, यादों की पोटली लिए मन के किसी कोने को थामे रहते है जब भी थकती साँसों को थोड़ा आरम की जरुरत होती हैं, यही यादें उन्हें संबल के रूप में पुनर्जीवित कर देती है |... Read More...

भोलाराम का जीव: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

यमदूत हाथ जोड़ कर बोला - "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया. आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक... Read More...

हरिशंकर परसाई को मेरा जानना और समझना: संस्मरण (ब्रजेश कानूनगो)

इंदौर से निकलने वाले 'नईदुनिया' अखबार का 70-80 कभी बड़ा महत्त्व हुआ करता था. बल्कि यह अखबार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता के स्कूल की तरह भी जाना जाता रहा. हिन्दी के बहुत महत्वपूर्ण सम्पादक, सर्वश्री राहुल बा... Read More...

उफ़ परसाई हाय परसाई: आलेख (युनुस खान)

हिम्‍मत नहीं थी कि आकाशवाणी की कैजुएली वाले उन दिनों में अपनी बेहद प्रिय 'स्‍ट्रीट-कैट' साइकिल को परसाई जी के घर की ओर मोड़ दिया जाए । लेकिन ये शौर्य हमने दिखा ही दिया एक दिन । और नेपियर टाउन में परसाई जी के घर... Read More...

परसाई की प्रासंगिकता और जाने भी दो यारो: आलेख (‘प्रो0 विजय शर्मा’)

"हमारा देश अजीब प्रगति के पथ पर है। मूल्य से मूल्यहीनता और आदर्श से स्वार्थपरता की ओर, नैतिकता से अनैतिकता की ओर बड़ी तेजी से दौड़ लगा रहा है। परसाई की दृष्टि इस पर शुरु से अंत तक रही। ‘जाने भी दो यारों’ का श्याम... Read More...

साहित्य में स्त्री सर्जनात्मकता: ऐतिहासिक संदर्भ : आलेख (नमिता सिंह)

इक्कीसवीं सदी में हम स्त्रियाँ जिन्होंने स्वतंत्रता, समानता और विकास के अधिकार प्राप्त कर सृजन क्षेत्र में और समाज में अपने लिये स्थान बनाया, परंपरा जनित परिवार अथवा व्यवस्था जनित समाज के स्तर पर होने वाले अन्य... Read More...

समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई…: आलेख (’सुधेंदु पटेल)

हरिशंकर परसाई केवल लेखक कभी नहीं रहे. वे लेखक के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे. उनका समूचा जीवन आन्दोलनों और यूनियनों से जुड़ा रहा. आन्दोलन छात्रों के, श्रमिकों के, शिक्षकों के, लेखकों के भी. वे लेखक के रूप में अपनी... Read More...