बच्चों को कम न आंके : नाट्य रिपोर्ट (शिवम् राय)

बच्चों को कम न आंके शिवम् राय भारतेन्दु नाट्य अकादमी ‘रंगमण्डल’ लखनऊ के द्वारा हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी एक माह की ‘बाल रंगमंच कार्यशाला’ की गयी। जिसके अन्तर्गत पंजाबी नाटककार डा० सत्यानन्द सेवक के नाटक ‘क... Read More...

भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए  हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स  देखते हैं | हालां... Read More...

मुर्दाखोर : कहानी (नंदलाल भारती)

('डॉ. नन्दलाल भारती' लघुकथाओं के ख्यातिलब्ध एक दलित चिन्तक और लेखक हैं | हिंदी की तमाम विधाओं पर काम करते हुए अपनी बात पाठकों तक पहुंचाते हैं...मुर्दाखोर दलित समाज की विसंगति और संघर्ष की विजय गाथा सी, कविता के... Read More...

मुट्ठी भर धूप : कविताएं (अमृता ठाकुर)

धूसर समय की विद्रूपताओं को देखती, समझती और मूर्त रूप में मानवीय कोमलता के साथ संघर्षशील स्त्री के समूचे वजूद का एहसास कराती दो कवितायें .....| सम्पादक  मुट्ठी भर धूप  अमृता ठाकुर घुप्प अंधेरा,कभी बेहद र... Read More...

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. : फिल्म समीक्षा (सैयद एस तौहीद)

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई..  एस तौहीद शहबाज़ प्रेम रतन की परिभाषा एवम दायरा इतना अधिक सीमित नही होना चाहिए जितना कि हालिया रीलिज 'प्रेम रतन धन पायो' या उसके समान फिल्मों में पेश किया जाता है. प्रेम एहसान तथ... Read More...

दुनिया बदल गई: कविता (अनीश कुमार)

क्रूर भूख के अट्टाहास के बीच रोटी के लिए मानवीय संघर्षों के रास्ते इंसानी बेवशी को बयाँ करतीं 'अनीश कुमार' की दो कवितायेँ ....... दुनिया बदल गई  अनीश कुमार काली रात के अतल गहराइयों में टिमटिमाता छोटा ... Read More...

सूत्रों के हवाले से : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

निरंतर डिजिटल होते समय में वास्तविक और जीवंत जगत स्मृतियाँ बनता जा रहा है, 'सूत्रों' की मानें तो ..... जी हाँ पहले कभी बेताबी से डाकिया बाबू का इंतजार किया करते थे अब रोज अपलक टीवी निहारा करते हैं देखें आज क्या... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान : आलेख ‘नवीं क़िस्त’ ( नमिता सिंह)

राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न कार्यक्रमों के नेतृत्व में हिन्दू स्त्रियों के अलावा मुस्लिम, पारसी और मार्गरेट कूजीन्स व ऐनी बेसेंट जैसी विदेशी महिलाएँ भी थीं।  राष्ट्रीय आंदोलन ने यह भी प्रमाणित किया कि महिलाओं क... Read More...

जन-गण-मन एवं अन्य कवितायें, स्मरण शेष (रमाशंकर यादव ‘विद्रोही)

3 जनवरी 1957 को फिरोज़पुर (सुल्तानपुर) उत्तरप्रदेश में जन्मे, रमाशंकर यादव 'विद्रोही' हमारे बीच नहीं रहे ... जैसे जे एन यू खाली हो गया है... जैसे फक्कड़ बादशाहों की दिल्ली खाली हो गयी है !! उनका बेपरवाह अंदाज़, फ... Read More...

परास्त: कहानी (धनंजय सिंह)

‘नहीं...नहीं साब। हम हाथ जोड़ता। हमको नई जाना। फिफ्टीन इयर में नायक का रैंक मिला है। एक बार सिक क्वार्टर चला गया तो रैंक चला जाएगा।’ डी.एस.सी. के मरीज गार्ड ने अपनी यूनीफॉर्म की कमीज में हाल ही में लगे नायक के र... Read More...