बीस सौ इक्यावन का एक दिन: कहानी (नमिता सिंह)

"मित्र ने बताया कि हिंदुस्तान के विदेशी मित्रों ने देश को लबालब आर्थिक सहायता इस शर्त पर दी थी कि देश से गरीबी हटा दी जाएगी। मित्र राष्ट्रों से पर्यटक आते तो उन्हें गरीबी और भुखमरी को देखकर अच्छा नहीं लगता था। ... Read More...

ग्लोबल गांव में रंगकर्म पर संकट: आलेख (राजेश कुमार)

मौजूदा जो हालात है उसमें रंगमंच को विकेन्द्रित करना ही होगा। रंगमंच की स्थानीयता को पहचान देनी होगी। इसके कथ्य और रंगकर्म को सम्मान देना होगा क्योंकि इन्होंने कारपोरेट के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं बल्कि जो व्य... Read More...

श्रृंखला : कहानी (अखिलेश)

चिट्ठी, वजूद, श्रृंखला, सोने का चाकू, हाकिम कथा, जैसी कालजयी कहानियों वाले चार कथा संग्रह अँधेरा, आदमी नहीं टूटता, मुक्ति, शापग्रस्त और अन्वेषण, निर्वासन उपन्यास के लेखक, हिंदी के यशस्वी कथाकार "अखिलेख" को 'आनं... Read More...

कट्टी बट्टी का फ्लॉप शो : फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

कट्टी बट्टी का फ्लॉप शो संध्या नवोदिता कट्टी बट्टी का बहुत इंतज़ार था. इधर कंगना रानौत ने फैशन, क्वीन, तनु वेड्स मनु, फिर तनु मनु पार्ट दो से उम्मीदें इतनी बढ़ा दीं कि कंगना के नाम पर किसी भी फिल्म की एडवांस ब... Read More...

मरने के अलग-अलग स्टैंडर्ड : व्यंग्य (सुजाता तेवतिया)

जीवन भर पेटभर रोटी नहीं ..... बाद मरने के ख्वाब सुहाने |  बाज़ार के सपनीले सब्जबाग की गांठे खोलने का प्रयास करता 'सुजाता तेवतिया' का व्यंग्य ...... कबीर की इस लाइन के साथ “हम न मरै मरिहै संसारा हमको मिला जियावन ... Read More...

सुखिया की डोली एवं अन्य कवितायें, अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर

वर्तमान समय में लगातार बढ़ती तकनीकी और बाजारवाद के प्रभाव के कारण मानवीय रिश्तों के बीच आई दरार को बयाँ करती अमरपाल सिंह 'आयुष्कर की कवियायें -  अनीता चौधरी  सुखिया की डोली अमरपाल सिंह 'आयुष्कर ' सुखिया कं... Read More...

कलबुर्गी तुम्हारे लिए : कविता (पुलकित फिलिप)

युवा कवि 'पुलकित फिलिप' की कविताओं के रचना संसार का ज्यादा भाग आक्रोश से भरा है | यह रचनाएं गवाह हैं इस बात की कि वर्तमान युवा केवल निराशा से ही नहीं बल्कि आक्रोश से भी भर रहा है | बतौर बानगी पूँजी और पूँजीवाद ... Read More...

आवाज़ों के घेरे : आलेख (डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’)

सामाजिक और राजनैतिक, वैचारिक समानता और द्वन्द के बीच साहित्य से लालित्य और भारतीय संस्कृति के लोक रंग कहीं विरक्त हो रहे हैं | निसंकोच साहित्य की सार्थकता वैचारिक प्रवाह एवं राजनैतिक चेतन के बिना न केवल अधूरी ब... Read More...

हवा हवाई है हमारा यह अंध राष्ट्रवाद : आलेख (पलाश विस्वास)

"हमें मुल्क की परवाह हो न हो, इस मुल्क के लोगों की परवाह हो न हो, हमें सरहद और देश के नक्शे की बहुत परवाह है। हमें इस देश की जनता की रोजमर्रे की बुनियादी जरुरतों की, उनकी तकलीफों की, उनके रिसते हुए जख्मों की, उ... Read More...

एक संक्षिप्त परिचय और कवितायें : स्मरण-शेष, वीरेन डंगवाल

इस त्रासद समय में भी 'उजले दिन जरूर आएंगे' का भरोसा दिलाने वाले साथी जन कवि 'वीरेन डंगवाल' हमारे बीच नहीं रहे | आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली ....| इस जन साहित्यिक त्रासद पूर्ण घटना से दुखी सम्पूर्ण हमरंग परिव... Read More...