एक जोड़ा झपकती हुई आँखें : कविता (पद्मनाभ गौतम)

हमरंग का संपादकीय आलेख 'विचलन भी है जरुरी ' को पढ़ते हुए 'पद्मनाभ गौतम' को यह अपना भोगा हुआ यथार्थ लगा | और सहज ही उनकी कलम से यह कविता आलेख पर टिपण्णी के रूप में निकली | यह कविता एक पद्मनाभ का ही यथार्थ नहीं लग... Read More...

पढ़ने-गुनने की जगह : संस्मरण (राजेश उत्साही)

"1985 में जब चकमक शुरू हुई तो किताबों से बिलकुल अलग तरह का रिश्‍ता शुरू हुआ।  हर महीने चकमक के लिए सामग्री जुगाड़ने, तैयार करने के लिए घंटों इस पुस्‍तकालय में लगाने होते थे।  तो यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि... Read More...

पागलों ने दुनिया बदल दी: कहानी (रमेश उपाध्याय)

घोर अँधेरे वक़्त की हताशाओं के बीच, संवेदनशील इंसानी धरती की आशाओं के सपने संजोने को, आसान है कि दिवास्वप्न देखना कह दिया जाय किन्तु उजाले की उम्मीदों के यही सपने ही तो हैं जो इंसान को अँधेरे के खिलाफ खड़े रहने औ... Read More...

जिस्म ही नहीं हूँ मैं : कविता (संध्या नवोदिता)

कविता के रूप में आकार लेती आधुनिक स्त्री जो लवरेज है अपने समय के ज़िंदा सवालों से, जो ढहा चुकी है सामाजिक रुढियों के मानवीय अंतर के किले को,.... खड़ी होती अपने पैरों पर इंसानी रूप में बुनने को एक आकाश सामाजिक भाग... Read More...

हाशिये पे खडे़ लोग : कवितायें (लतिका बत्रा)

कविता अभिव्यक्ति का वह आलोड़न है जो सहज ही व्यक्तिगत स्पन्दनों को समष्टिगत भावों की ओर अग्रसर कर देता है । ह्रदय स्पंदन से फूटती मानवीय अभिव्यक्ति, सामाजिक धरातल पर यथार्थ रूप लेतीं 'लतिका बत्रा' की कुछ कविताएँ... Read More...

लिखो ‘बसंत’ : कविता (के पी अनमोल)

अपने दौर की चिंता चुनौतियां हमेशा ही साहित्य सर्जकों के चित्त में शामिल रहे हैं | अपने समय से मुठभेड़ करती 'के पी अनमोल' की कविता .....| - संपादक   लिखो 'बसंत' के पी अनमोल धर्म को ज़रूरत नहीं होती गधों क... Read More...

तारकोल की सड़क पर : कविता (अनुपम त्रिपाठी)

युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र 'अनुपम त्रिपाठी' की यह कविता .....|... Read More...

थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन” , डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। 'रवींद्र जैन' एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है... Read More...

पश्चिमी नारीवाद की अवधारणा और विभिन्न नारीवादी आंदोलन :आलेख (डा0 नमिता सिंह)

"स्त्रियों की अंधेरी दुनियां में रोशनी के प्रवेश की, घर-परिवार की चारदीवारी के भीतर सामाजिक-धार्मिक बंधनों में जकड़ी स्त्री मुक्ति की कहानी लगभग अठारहवीं शताब्दी से ही शुरू हुई। विश्व के अलग-अलग देशों में यह बद... Read More...

विचलन भी है जरूरी: ‘हमरंग’ संपादकीय

विचलन भी है जरूरी  हनीफ मदार कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया और... Read More...