सांझी संस्कृति की भाषा है, हिंदी और उर्दू

मोहम्मद हुसैन डायर

खड़ी बोली के दो रूप हैं, हिंदी और उर्दू। हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब को समझने के लिए खड़ी बोली के इन दोनों का ज्ञान बहुत आवश्यक है। भारत की साझा विरासत इनके साहित्य में मौजूद है। पर स्वतंत्रता संग्राम के दरमियान इन दोनों रूपों को कुछ फिरकापरस्त ताकतों द्वारा मजहबों में बांटने के गंदे प्रयास के कारण देश का अमन-चैन दाव पर लग गया जिसका एक घाव हम भारत विभाजन के रूप में भी देखते हैं। आजादी के पश्चात् भी भाषा को लेकर भारतीय जन मानस में कुछ ऐसा ही जहर फैलाया गया। राही मासूम रजा का यह मानना था कि अगर हमें हमारी सांझा संस्कृति को सही तरीके से समझना है तो उसके लिए हिंदी और उर्दू दोनो भाषाओं का अध्ययन करना बहुत जरूरी है। कई दिनों से उर्दू से जुड़े हुए विभिन्न प्रश्नों एवं पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाने की अभिलाषा पाले हुए था। संयोग से उर्दू के मशहूर शायर शीन काफ़ निजाम साहब हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएँ: अंत:संबंध और वैशिष्ट्य विषय पर 27-28 जनवरी 2017 को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्र संगोष्ठी में उदयपुर पधारें। इस संगोष्ठी के दरमियान आपने कुछ वक्त निकालकर मेरी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया। उनके मध्य जो वार्तालाप हुआ, वह कुछ इस प्रकार रहा-

हिंदी उर्दू विवाद को हम आज किस जगह पाते हैं एवं इस विवाद का भविष्य क्या है?

देखिए हिंदी-उर्दू का विवाद कोई है ही नहीं, असल विवाद तो सियासतदार अपनी रोटियां सेकने के लिए इसे बनाए हुए हैं। हिंदी और उर्दू का वैसा ही संबंध है जैसा कि मैंने पहले भी कहा है जैसे नाख़ून और गोश्त का रिश्ता होता है। भाषाओं का संबंध सृजनात्मक स्तर पर होता है। इस विषय पर कोई विवाद नहीं है। इस संबंध में नूरे नारवी का शेर है कि
‘आप हैं आप और सब कुछ हैं
और मैं और मैं कुछ भी नहीं?
अब इसमें आप बताइए कौन सा शब्द अरबी फारसी का है? आरज़ू लखनवी का पूरा दीवान इस तरह का है जिसमें कोई भी शब्द अरबी फारसी का नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि यह विवाद सियासतदार एवं हंगामा खड़ा करने वालों द्वारा पैदा किया गया है। दूसरा सवाल जो आपने पूछा है कि उर्दू का मुस्तकबिल क्या है? किसी भी जबान का मुस्तकबिल उसके सृजन पर निर्भर करता है। आज हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि आजकल की भाषाओं को सिर्फ कहानी, उपन्यास, कविताएं या कहें तो साहित्यिक गतिविधियों में प्रयोग लेने तक सीमित करके उन्हें परोसा जा रहा है, इससे भाषा का विकास नहीं हो सकता है। उस भाषा में साहित्य के साथ-साथ गणित, विज्ञान, भूगोल, इतिहास, दर्शन जैसे अन्य विषयों में भी प्रयोग में लेना आवश्यक है। उर्दू में लंबे समय से हम देख रहे हैं कि अच्छे अनुवाद नहीं हो रहे हैं या अनुवादकों की संख्या बहुत ही कम है। इससे यह साफ होता है कि उर्दू को केवल साहित्य तक सीमित रखना अनुचित है। किसी भी भाषा को केवल साहित्य द्वारा बचाना असंभव है।

उर्दू पर एक खास धर्म की छाप लगी हुई है, इस छाप से उर्दू को कैसे मुक्त किया जाए?

इसके लिए इसके अदब को आमजन तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचाना होगा और बताना होगा कि यह भी राजनीतिक पैतरा है जिसके कारण विवाद पैदा करके सियासतदार रोटियां सेकते हैं। जनता को यह समझना होगा कि जब मैं इंग्लिश पढ़कर ईसाई नहीं हो जाता, उसी तरह हिंदी और उर्दू पढ़ने से मैं हिंदू और मुसलमान कैसे हो जाऊंगा। इस सामान्य से तर्क पर हमें ध्यान देना होगा। ज़बाने मज़हबों की नहीं, बल्कि तहज़िबों की पैदाइश होती है और उनमें तहज़ीब की झलक साफ तौर से दिखाई देती है।

राही मासूम रजा ने जब फारसी लिपि छोड़कर देवनागरी लिपि में लेखन शुरू किया तो उर्दू वालों ने उनका बहुत विरोध किया, क्यों?

राही मासूम रजा को मैं बतौर एक शायर, उपन्यासकार एवं प्रगतिशील विचारक के रूप में जानता हूं। उनको मैंने पढ़ा भी है। राही साहब ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसे गलत कहा जाएगा। पर कुछ लोगों को तिल का ताड बनाने की आदत होती है। प्रेमचंद जैसे कई साहित्यकारों ने उर्दू के अलावा अन्य भाषा में लिखा है। इससे भी ये लोग पिछली जबान के विरोधी नहीं हो जाते हैं। शरतचंद्र को जिस तरह से हिंदी वालों ने अपना लिया है, उसी तरह उर्दू वालों ने क्यों नहीं। अगर चार लोगों ने उनका विरोध कर लिया, इसका मतलब राही उर्दू विरोधी नहीं हो जाते हैं। यगाना चंगेजी पर जो उनका काम है और तिलिस्मे होशरूबा पर जो उनकी थिसिस है, क्या वह उर्दू में नहीं है। इन दोनों विषयों पर राही का बेहतरीन काम हमारे सामने उपलब्ध हैं। हां, यह जरूर है कि राही की कुछ मान्यताओं पर मेरी असहमति है जैसे वह कहते हैं कि ग़ज़ल का फार्म दोहे से आया है, इसे मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं।

राही के द्वारा उर्दू में लिखा महाकाव्य 1857 क्रांति कथा विमर्श से दूर क्यों है?

देखिए कई चीजों के ऊपर चर्चा होती है और कई पर नहीं, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। जहां तक राही मासूम रजा का सवाल है वे तरक्की पसंद तहरीक से भी जुड़े हुए थे। जब तरक्की पसंद तहरीक में इंतहा पसंदी का साथ दिया, इस कारण उससे कई लोग अलग हो गए। वैसे ही जदिजीयत का दौरे आया। वहां पर भी ऐसा ही कार्य हुआ। दूसरी बात महाकाव्य का फॉर्मेट या तसव्वुर उर्दू काव्य में तो देखने को नहीं मिलता है। उर्दू में मसनवी, कसीदे या मर्सिया यह तीन फॉर्मेट लंबी रचना के रूप में हैं। महाकाव्य तसव्वुर हिंदी का फॉर्मेट हैं, पर हमने इसे इस रूप में स्वीकारा है। इसके अलावा पढ़ने का जो सिलसिला पहले था, वह अब खत्म होता जा रहा है। तब बताइए चर्चा से यह दूर होगी कि नहीं। आज उर्दू का बड़ा हिस्सा इसलिए जिंदा है, क्योंकि वह स्कूलों में कोर्स के रूप में पढ़ाया जाता है। आप भी जानते हैं कि आज के दौर में अदब कितना कम पढ़ा जा रहा है। इस कारण कई भाषाओं की बड़ी-बड़ी रचनाएं विमर्श के दायरे से दूर है।

सांप्रदायिक समस्या को उर्दू साहित्य किस नजर से देखता है?

पहले मैं यह कहना भूल गया कि अगर तक्सीम न हुई होती तो उर्दू का बहुत बड़ा अदब लिखा ही नहीं जाता। मंटो, बेदी, इस्मत, इंतजार हुसैन, राही मासूम रजा आदि शायरों की कलम में भी वह धार पैदा नहीं हो पाती। जब-जब मुशायरा मस्कीन के दौर से गुजरा है, तब-तब बड़े-बड़े अदबकार पैदा हुए हैं विशेषकर उर्दू में। अहमद शाह अब्दाली का हमला होता है तब मीर तकी मीर, 1857 के आसपास के हालात में ग़ालिब, अंग्रेजों की ओछी राजनीति के कारण इकबाल, तक्सीम के समय मंटो, बेदी, राही, सरदार अली जाफरी, जोश महिलाबादी जैसे अदबकार पैदा हुए हैं। यह सभी उदाहरण इस बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है। जहां तक सांप्रदायिकता की बात है, दोनों तरफ ऐसे लोग मौजूद रहते हैं जो अपने हितों के लिए फसाद पैदा करते हैं। किसी भी एक पक्ष को महत्व देना परिस्थिति वो गंभीर बनाता है। कुछ ऐसी स्थिति भाषा के संदर्भ में भी है।
हेतु भारद्वाज
यहां पर मैं कुछ कहना चाहूंगा कि एक भी साहित्यकार या उसकी रचना विभाजन के पक्ष में नहीं है, चाहे वह किसी भी भाषा की रचना क्यों न हो। आप पहले यह तो तय कीजिए कि टोबा टेक सिंह किस देश का है? और कुछ लोगों ने तो मान लिया है कि बंटवारा हो चुका है, पर जनता का बड़ा भाग अभी तक इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
निजाम साहब- खोल दो अफसाने में सकीना के साथ जो जुल्म हुआ, उस पर जुल्म ढ़ाने वाले किस धर्म के थे? हमें यह भी देखना होगा कट्टरपंथी ताकते ऐसे हालातों का फायदा उठा कर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, पर वहां हमेशा इंसानियत मरती है सकीना के साथ में जो हुआ उसे हम निर्भया कांड से भी छोड़ सकते हैं।

आजादी के बाद उर्दू हाशिए की ओर क्यों जा रही है?

इसकी उपेक्षा को समझने के लिए हमें नए दृष्टिकोण से देखना होगा। बंटवारे ने इस भाषा पर बहुत प्रभाव डाला है। बंटवारे के कारण जब परिवार बिखर गए और साथ ही हिंदुस्तानी तरजीह भी बिखर गई। तकसीम का प्रभाव भाषाओं पर भी पड़ा है। बंटवारे ने कई भाषाओं पर बुरा प्रभाव डाला है। इसके अलावा जबानों को मजहब में बांटना हालात को और घातक बना देता है और दुख की बात यह है कि उर्दू के संबंध में इस मान्यता ने बहुत बुरा प्रभाव डाला। रही सही कसर भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों ने पूरी कर दी। पाकिस्तान में देखिए उर्दू का क्या हाल है, वहां पर कोई पश्तो बोलता है तो कोई पंजाबी तो कोई सिंधी। उर्दू वहां पर मात्र 8 फीसदी लोग बोलने वाले है। तकसीम ने सबसे ज्यादा दो भाषाओं को नुकसान पहुंचाया है, पहली उर्दू दूसरी सिंधी भाषा। इन दोनों का नाम लेने वाला ढूंढने से नहीं मिलता है, विशेषकर सिंधी के संदर्भ में, उर्दू तो फिर भी मिल जाती है।

हिंदी-उर्दू को और अधिक पास में कैसे लाएं

ऊपर के कुछ मतभेदों की बात अगर हम छोड़ दे तो इसमें एकता ही है। मतभेद हर जगह मिलते हैं जैसा कि हिंदू मुसलमानों को पास लाने की बात है यह भी इसी तरह से पास ही है। पर हमारा ध्यान मतभेद की ओर ज्यादा जाता है जो अनुचित है। क्या है कि अगर सफेद कपड़े के एक छोटे से भाग पर दाग लग जाता है तो हमारा ध्यान केवल उसे दाग पर जाता है और हम पूरे सफेद कपड़े को नजरअंदाज कर देते हैं। जो मोहल्ला बदमाशों के लिए जाना जाता है इसका मतलब यह नहीं है कि उस मोहल्ले केवल बदमाश या गुंडे ही रहते हैं। गुंडे हमेशा 2-4 ही होते हैं, पर बदनामी का ठीकरा सभी के ऊपर फोड़ा जाता है। ऐसे में हमें उन नकारात्मक विचारों की ओर ध्यान देने की बजाय समाज में जोड़ने वाले बिंदु कितने हैं, उनकी ओर ध्यान देना चाहिए। मुझे बताइए कि क्या रामपुर में केवल चाकू के अलावा कुछ नहीं बनता है? उर्दू और हिंदी में नजदीकी थी, है और रहेगी। जब तक अदब में संवेदना जिंदा रहेगी, तब तक भाषाओं में प्रेम मौजूद रहेगा।

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