समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी लम्बे समय से सिर्फ जवाब देते-देते सवाल करना मैं लगभग भूल चुकी थी, या शायद करना ही नहीं चाहती थी। असफल कहलाते- कहलाते अब सफलता से पहचान भी मिट ही गयी थी। वैसे यह मेरी अपनी सोची-समझी रणनीति थी। एकबार ‘असफल’ बन जाने के बाद आपसे सारी अपेक्षायें समाप्त हो जाती हैं। धीरे-धीरे आप खुद से भी कोई अपेक्षा रखना भूल जाते हैं। कितनी बेफिक्री का एहसास होता है। आप चैन की बंसी बजाते हैं क्योकि आपको खुद को साबित नहीं करना…..

नाक के नीचे

रुपाली सिंहा

आप सबने नाक के नीचे… वाला मुहावरा सुना ही होगा। इसका मतलब होता है कि आपके बिलकुल नज़दीक या आँखों के सामने कोई बात हो जाये और आपको खबर भी न हो या हो भी तो आप उसे नज़रअंदाज़ कर रहे हों। पर ये तो हुई मुहावरे की बात। नाक की अवस्थिति ही ऐसी है कि आँखे उसे ठीक प्रकार देख नहीं पातीं। कभी आपने कोशिश की है अपनी ही नाक के नीचे देखने की? आँखें भैंगी हो जाएँगी पर आप देखने में सफल नहीं हो पाएंगे बशर्ते कि आप आईने का सहारा न लें। कोई भी चीज अगर हमारी आँखों के बहुत नज़दीक हो तो वह हमें स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। साफ़-साफ़ देखने के लिए एक अपेक्षित दूरी की ज़रूरत पड़ती है, इसके अभाव में चीज़ें धुंधली ही दिखती हैं। असल ज़िन्दगी में नाक के नीचे की जगह बड़ी ही महफूज़ जगह होती है। आपके नज़दीक भी रहती है और दूर भी। दूर ऐसे कि आप की आँखें सचमुच उसके नीचे देख नहीं पातीं और नज़दीक ऐसे कि आप उसे खुद से अलग भी नहीं कर सकते। तो जो भी बातें आपको तंग करें,परेशान करें लेकिन उन्हे खुद से दूर करने में नुकसान नज़र आए ,उन्हें नाक के नीचे रख दीजिये। दोनों समस्याएँ खुद ब खुद हल हो जाएँगी।
वापस आती हूँ मैं नाक के नीचे के मुद्दे पर। मैंने भी नाक के इतने नज़दीक ढेरों चीज़े रखीं थीं कि उनके होने का एहसास तो मुझे होता था पर वे मुझे दिखती नहीं थीं। बेशक ऐसा मैंने जान-बूझकर किया था क्योंकि मैं उन्हें देखना नहीं चाहती थी। क्यों? खुद के ऊपर से परतें उखाड़ना, रगड़ना ,नापना-तौलना अव्वल तो बहुत दिलेरी का काम है और कभी आप ये दिलेरी दिखाते भी हैं तो तब जब ‘कोई दूसरा नहीं होता’ । धीरे-धीरे आप खुद को भी ये दिलेरी दिखाना (जान बूझकर) भूलने लगते हैं।क्योंकि यह काफी तकलीफदेह प्रक्रिया भी होती है। सो जानबूझ कर खुद को कष्ट देना कहाँ की, कौन सी समझदारी है भला ! वैसे भी अब इतनी दूर निकल आयी हूँ कि पीछे मुड़कर देखने से
डर लगता है कि कहीं कोई उघड़ी परत न दिख जाये। क्या था यह डर ? असुरक्षा, हीनता बोध या और कुछ?पर इंसान एक परत का होता है क्या भला?सारे ही लोग बहु परतीय होते हैं, कम से कम मैंने तो एक परत का इंसान नहीं देखा है अब तक। सभी इंसानो को जटिल ही पाया है मैंने। शायद अरस्तु मनुष्य की अपनी दी हुई परिभाषा में जटिल जोड़ना भूल गए।
समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी लम्बे समय से सिर्फ जवाब देते-देते सवाल करना मैं लगभग भूल चुकी थी, या शायद करना ही नहीं चाहती थी। असफल कहलाते- कहलाते अब सफलता से पहचान भी मिट ही गयी थी। वैसे यह मेरी अपनी सोची-समझी रणनीति थी। एकबार ‘असफल’ बन जाने के बाद आपसे सारी अपेक्षायें समाप्त हो जाती हैं। धीरे-धीरे आप खुद से भी कोई अपेक्षा रखना भूल जाते हैं। कितनी बेफिक्री का एहसास होता है। आप चैन की बंसी बजाते हैं क्योकि आपको खुद को साबित नहीं करना। वैसे भी सफल बन कर, कहला कर क्या करना है?सफलता हमेशा ही आपको ऐसी कसौटी की तुला पर लटकाये रखती है जहाँ से उतर कर आप अपनी मर्जी से टहल-घूम नहीं सकते। वहां असफल होने की कोई सम्भावना नहीं। इसीलिए मैंने जान- समझ कर असफलता की चादर तान ली थी जिसके नीचे चैन और सुकून था। सम्मान और गरिमा को अपनी नाक के ठीक नीचे दबा दिया था। उन्हें लेकर करना भी क्या था? वे नारी मुक्ति की मीटिंगों में ही भली लगती थीं मुझे। मेरी ज़िन्दगी बिना मेरी मशक्कत के ही भली-चंगी गुज़र रही थी। खुद को साबित करने का व्यायाम व्यर्थ था। जीवन का नुस्खा मैंने पा लिया था। अब नाक का सवाल मुझे बेकार का सवाल लगता। हाँ ,नाक के नीचे के मुहावरे को मैंने जिंदगी में कुशलता से प्रयोग करना सीख लिया था।

धीरे-धीरे मेरी नाक के नीचे का बोझ बढ़ता ही जा रहा था। मुझे कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर देखी हुई उस औरत की तस्वीर याद आने लगी जिसके चेहरे पर मधुमक्खी का छत्ता था और वह अपने पति का हाथ पकड़ कर चल रही थी। आखिर चेहरे पर छत्ता उगाने में ज़रूर उसकी अपनी ख्वाहिश और चुनाव का कुछ अंश तो रहा ही होगा। मेरा तो चेहरा सलामत था, बोझ तो सिर्फ नाक के नीचे थी। हाँ, सब ठीक ही चल रहा था।
पर कुछ दिनों से ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे-जैसे मेरी बाहरी आँखों के आगे नाक के नीचे का अम्बार बढ़ता जा रहा था,जिससे मुझे देखने में बाधा उत्पन्न होती थी , मेरे अंदर कोई तीसरी आँख पैदा हो गयी थी जिसकी नज़र बहुत पैनी थी। मैं अगर परेशान थी तो अपनी इस नयी नज़र से। मेरी शांति धीरे धीरे भंग होने लगी थी जिसका मुझे बहुत मलाल था, आखिर बहुत भारी कीमत चुकाई थी मैंने इसके लिए। जैसे-जैसे नाक के नीचे का बोझ बढ़ रहा था मेरे अंदर का खालीपन भी बढ़ता जा रहा था। ऊपर से ये तीसरी आँख। यह परत-दर परत छुपे मेरे ‘मैं ‘ को मेरे न चाहने के बावजूद गाहे-बगाहे देख ही लेती थी जिसे मैंने अपनी ही नाक के नीचे सालों से दबा रखा था। आप पूछेंगे मैंने ऐसा क्यों किया था ? जवाब सरल है। हमारा देखना मात्र देखना भर नहीं होता है, देखकर मन में सवाल उठते हैं, सही-गलत की बात होती है। नाक के नीचे रखने से ,वो भी अपनी नाक के ही नीचे ,आप सारे सवालों से बचे रहते हैं,क्योंकि आपको नाक के नीचे की चीज़ें दिखाई नहीं देतीं। मैंने भी बड़ी चालाकी से अपनी सारी उन चीज़ों को अपनी नाक के नीचे दबा दिया था जिनके दिखने से मुझे परेशानी होती और मेरी शांति भंग होती। अपने साथ हुई बेवफाइयाँ,अपमान सबकुछ मेरी नाक के नीचे था। उनकी जगह मैंने सहिष्णुता,प्रेम, त्याग की चादर ओढ़ ली थी जो सबको बहुत अच्छी लगती थी। मैं हारना नहीं चाहती थी सो मैंने त्याग का दुपट्टा ओढ़ लिया ,जब प्रेम अपनी ऊष्मा खो बैठा था और मुक्ति चाहता था तब वह मेरे लिए प्रतिष्ठा बन गया था तब मैंने स्पंदनहीन प्रेम को मुक्त करने के बजाय उसे अपनी नाक के नीचे रख लिया। इस तरह चाहे जैसे भी, वह मेरे पास बना रहा। अपनी असुरक्षा को कर्तव्यपरायणता का नाम दे दिया था,अपनी कमज़ोरी को उदारता का। हालांकि नाक के नीचे के अम्बार से कभी-कभी मेरा दम बुरी तरह घुटने लगता था।कभी-कभी गिरने के डर से जब अकेली होती तो घुटनो के बल भी चलने लगती थी। ऐसे चलने में कष्ट तो बहुत होता था पर सुरक्षा का एहसास होता था।
काफी वक्त बीत चुका था। बच्चे अपने-अपने नीड़ों की तरफ उड़ चले थे… मेरे पास अब वक़्त ही वक़्त था। .. और इस खाली वक्त में अक्सर ही मैं बहुत बेचैनी और खालीपन से भर जाती। तब मन करता नाक के नीचे के बोझ को उतार फेकूँ पर यह इतना आसान नहीं था। जीवन भर लगाए गए गणित का सारा हिसाब शून्य में ही दिख रहा था मुझे। तब लगता यह जगह सबसे खतरनाक जगह है। इसकी झाड़-बुहार सबसे ज़रूरी है नहीं तो यह नज़र को धुंधला कर देती है और बाद में अंधा तक बना देती है। आपके पास परजीवी बन कर जीने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
एक दिन तय ही कर लिया इस बोझ से मुक्त होने का। लेकिन आदत पड़ चुकी थी इस बोझ की सो तय किया कि इस बोझ को धीरे-धीरे ही उतारा जाये। सबसे पहले मैंने सबसे नीचे दबे मेरे ‘मैं’ को निकाला, झाड़ा-पोछा। इस एक को निकालने से ही मुझे बहुत हल्का महसूस हो रहा था। मुझे साँस लेने में पहले की अपेक्षा बहुत कम तकलीफ हो रही थी अब। बोझ को उतारने का हौसला बुलंद होता गया। हाँ, इससे जीवन का संतुलन थोड़ा गड़बड़ा रहा था पर मुझे भरोसा हो गया था कि जब इतने बोझ को इतने सालों तक संभाल लिया तो बोझ उतार कर भी संभल ही जाऊँगी।जाने कहाँ से एक आवाज़ सुनाई दी , ‘ खुद को जानने,समझने और पाने की कोई उम्र नहीं होती’।

One Response

  1. अजय

    “हर आदमी में होते है दस- बीस आदमी,
    देखना हो किसी को बार-बार देखिए ।”
    आधुनिक मानव इतने कृत्रिम वातावरण का आदी बन चुका है कि मन की अनेक परतें बनी-बिछी है।ऐसे में स्व की तलाश अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।जब हम नाक के नीचे अपने स्व (self)को रखकर भूल जाते है,तब बैडफेथ के शिकार बन जाते है।जब परिस्थितियों के जाल में स्व के अनुरूप चयन करते है तब वास्तविक (Athentic)जीवन जीते है।आखिर चयन ही हमारे अस्तित्व को सिद्ध कर्ता है।बढती उम्र के साथ स्व की तलाश उस वास्तविक(Athentic) जीवन जीने की ललक है।साधुवाद, आपने बेहतरीन लिखा है।

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