पिछले कुछ समय से अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रेखांकित करते हुए कई विद्वानों ने इस दौर को अघोषित आपातकाल की संज्ञा तक दे डाली,  इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का नाम अग्रणी है । कांग्रेस सरकार के समय घोषित आपातकाल के कारणों एवं उसके पश्चात के हालातों को जानने के अलावा मौजूदा दौर की हलचलों को समझने के लिए मोहम्मद हुसैन डायर ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से बातचीत की॰॰॰

अधिकार तो है, पर उनको आप उपयोग में नहीं ले सकते 

प्रश्न- जयप्रकाश नारायण द्वारा सांप्रदायिक ताकतों से हाथ मिलाना क्या आपातकाल लगाने की औचित्यतता को स्पष्ट करता है?

उत्तर- आपातकाल और जयप्रकाश नारायण के निर्णय के संदर्भ में अगर हमें विचार करना हो तो इतनी सरलता से विचार नहीं किया जा सकता। आपातकाल अपने आप में जनतंत्र का स्थगन था इसमें कोई दो राय नहीं है। इसमें भी संदेह नहीं है कि जयप्रकाश नारायण ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सहयोग लिया था जिसको किसी भी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। जयप्रकाश नारायण आपातकाल के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। उसके लिए उस समय की परिस्थितियाँ जिम्मेदार है। जयप्रकाश नारायण का निर्णय जरूर ऐसा है जिस पर सवाल उठाए जा सकते है कि उन्होंने आर एस एस के साथ जाना क्यों स्वीकार किया।

प्रश्न- आपातकाल के पश्चात देश के बिखरे हालातों के लिए जयप्रकाश नारायण के इस निर्णय को कितना जिम्मेदार माना जाएगा?

उत्तर- एक व्यक्ति के निर्णय से स्थितियां नहीं बदलती। हमें यह देखना होगा कि कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनीतिक एवं सांप्रदायिक संगठनों का गठजोड़ हुआ था। ऐसे में इन संगठनों को आरोप मुक्त करना और अकेले जयप्रकाश नारायण को दोष देना अनुचित है। कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इन लोगों के साथ मिलकर सरकार बनाई। साठ के दशक में कई विधान मंडलों में जनसंघ से गठजोड़ करके कम्युनिस्टों ने सरकार बनाई थी। देश के अस्थिर माहौल के लिए देश के हर जनतांत्रिक दल की भूमिका है। अगर कांग्रेस को छोड़ दें तो सपा, बसपा, मार्क्सवादी, जेडीयू लगभग सभी पार्टियों ने जनसंघ और उनके संगठकों से गठजोड़ किया और सरकारें बनाई जिससे संघ और उसकी विचारधारा को संसदीय राजनीति में जगह मिली। परिणामस्वरुप धीरे-धीरे जगह बनाते हुए ये ताकत इतनी बढ़ गई कि आज वह हम पर काबिज हैं।

प्रश्न- क्या आज का दौर आपातकाल से भी ज्यादा गंभीर है?

उत्तर- बिल्कुल माने। क्योंकि आपातकाल घोषित था और यह अघोषित आपातकाल है। उस समय अधिकारों को स्थगित कर दिया गया। आज के माहौल में वे अधिकार तो है, पर उनको आप उपयोग में नहीं ले सकते।

प्रश्न- बिकाऊ और दरबारी मीडिया के दौर में आज हम हाशिए के वर्ग की आवाज को कहां देखते हैं?

उत्तर- जब अंग्रेजों ने व्यक्तिगत सत्याग्रह से जुड़ी खबरें छापने के लिए मना किया था, विशेषकर विनोबा भावे के भाषणों को तो उस समय गांधी ने एक बात कही थी कि अगर मैं जो छापना चाहता हूं, वही नहीं छाप सकता तो मैं अखबार क्यों निकालूं? इसके पश्चात उन्होंने अपने अखबार को स्थगित कर दिया और पाठकों को यह संदेश दिया कि अब हर व्यक्ति को चलता-फिरता अखबार बनना होगा। तो अभी का दौर यही चल रहा है। अभी भी हर व्यक्ति को चलता फिरता अखबार या मीडिया का एक माध्यम बनना होगा और जिम्मेदारी के साथ खबरों को लोगों के पास पहुंचाना होगा। अब हमारे पास साधन भी बहुत हैं। उनका हमें अधिक-से-अधिक प्रयोग करना होगा, पर जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ। अगर आप के पक्ष में भी कोई खबर हो तो उसमें रत्ती भर भी पक्षपात या मिलावट नहीं होनी चाहिए। जो चीज जैसी है वैसी ही रिपोर्ट करें।

प्रश्न- बढ़ती कट्टरता के इस दौर में देश का भविष्य कैसा है?

उत्तर- सुरक्षित तो कतई नहीं है, पर यही तो हमारे लिए चुनौती का समय है और हमें अपने आप को  सही  साबित करने का यही समय है। हमें देश की जनता को यह बताना होगा कि  दरअसल हम अपने भारत से प्यार करते हैं और हम अपने इस भारत को बहुतसंख्यकवादियों के हाथ में नहीं जाने देंगे। इसके लिए संघर्ष करने के लिए हम तैयार हैं। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि अगर सब कुछ आसान होता तो लड़ने का मजा ही क्या आता, संघर्ष में मजा ही नहीं आता। अब हमें यह साबित करना है कि गांधी और उनकी विचारधारा जिसका हम नाम लेते थकते नहीं, वह कितनी जरूरी हैं और जिस तरह उन्होंने संघर्ष किया, कुछ ऐसा ही माद्दा हममें भी हैं।

प्रश्न- अन्ना की लंबी चुप्पी को क्या समझे?

उत्तर- अन्ना हजारे इस लायक नहीं है कि आप उन पर बात करें। आप कहां बात कर रहे हैं गांधी की और आप कहां बात कर रहे हैं अन्ना हजारे की।

Leave a Reply

Your email address will not be published.