भाषा और ऐतिहासिक नायक सुरक्षा की मजबूत दीवारें हैं। इसके अलावा हमें अपनी कमजोर पड़ गई खिड़की तो बदलनी ही है…’’ 

बहुत भोला विश्वास है सावित्री तुम्हारा। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर-बाहर, स्कूल, देवालय, बस-टेªन कहीं भी….दुनिया सभ्य हो रही है और स्त्रियाँ उसी रफ़्तार से असुरक्षित होती जा रही हैं…. 

‘ये सब बेकार की बातें हैं। हमारी शिनाख्त हो चुकी है और हम अवांछित घोषित किए जा चुके हैं…. बिट्टी तो मराठी पढ़ी है। बोर्ड में उसे मराठी में सौ में पैंसठ नम्बर मिले थे। इस समय वह हमसे बड़े खतरे में है। हम ज्यादा से ज्यादा एक बार ही मारे जाएँगे और वह जिन्दगीभर मारी जाती रहेगी…’’

 ‘‘अन्ना को मैं ढूँढ़ लूँगा। ऐसा नहीं होगा कि तुम उसके पैरों में अपना सिर झुकाओ…..यह शहर उससे ज्यादा तुम्हारा है। तुम्हारी नौक की लौंग के नग में सुलतान पुर के आसमान का सूरज नहीं, दादर की लोकल है, ‘गेट वे’ के कबूतर हैं, समंदर का ज्वार-भाटा है और कांदीवली के इस घर के बर्नर की नीली लौ है। और तुमसे ज्यादा यह बिट्टी का है। इस शहर में उसने जीवन की पहली और सबसे पवित्र साँस ली है….’’

अन्नाभाई का सलाम 

नक्शानवीस महावीर अखबार लिए बैड पर लेटा था। लेकिन वह अख़बार पढ़ने की जगह बिट्टी को देख रहा था।

   बिट्टी बाहर निकलने के लिए उत्साह से तैयार हो रही थी।

   महावीर बेचैनहो  गया।

   बिट्टी बहुत खुश थी और कोई गाना गुनगुना रही थी।

   महावीर उदास हो गया।

   बिट्टी जवान हो गई थी और बेहद खूबसूरत भी।

   महावीर दहशत से भर गया।

   उसकी पत्नी और बिट्टी की माँ सावित्री गैस पर नाश्ता तैयार कर रही थी। वह झुकी हुई थी। उसकी नाक की लौंग के सफेद नग में गैस बर्नर की नीली लौ चमक रही थी।

   सावित्री दुलहन बन कर आई थी तो सरू के पेड़ की तरह दिखाई देती थी। यह पच्चीस बरस पहले की बात है। सुलतानपुर के गाँव मिलानी की। उसके पुश्तैनी घर की कच्ची दीवारों-आँगन और दूर दूर तक फैले खेतों की। वह तीन रंगों की दुनिया थी। मिट्टी के रंग की, लहलहाती और कटकर सूखती फसल के रंग की। महावीर ने तब तीन रंगों की उस छोटी-सी दुनिया में उसकी नाक की लौंग के नग में चमकता सूरज देखा था…

   वो सब पच्चीस साल पीछे छूट गया। वह सावित्री को अनन्त रंगों और संभावना की दुनिया में ले आया। और यहाँ, कांदीवली के इस बैरकनुमा डेढ़ कमरे के घर में, उसे, अब सावित्री की लौंग के नग में बर्नर की नीली लौ दिखाई देती है…

   पच्चीस साल के इस अरसे में उसने सावित्री की लौंग में सिर्फ बर्नर की नीली लौ ही देखी हो, ऐसा भी नहीं है।

   वह पहली बार लोकल से यात्रा कर रही थी। दादर से कांदीवली तक। महावीर का साथ होने के बावजूद वह तूफ़ान की तरह गुज़रती गाड़ियों को देखकर घबरा गई थी और सैलाब की तरह फैलते आदमियों को देखकर भी। दो लोकल निकल र्गइं। वह हिम्मत ही नहीं कर सकी। उसके पैरों में महावर का रंग था और टखनों पर पायल बंधी थी। वह इस शहर में संगीत और सपने लेकर आई थी…

   ‘‘यहाँ जो लोकल नहीं पकड़ सकता वो जिन्दा नहीं रह सकता। यह इस शहर की जीवन रेखा है। चलो, मेरा हाथ थाम लो। मजबूती से। छोड़ना मत और मेरे साथ दौड़ना। यह बस सेकेंडों का खेल है। इसमें ही उतरना और चढ़ना होता है। बच्चे, बूढ़े, लंगड़े-लूले सभी को। यह किसी को भी कोई रियायत नहीं देती…’’

   गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे तैयार हो गए और उसके रुकते ही वे हाथ थामकर दौड़े। लेकिन उतरती भीड़ के धक्के से दोनों के हाथ छूट गए और सावित्री उसके रेले में हिचकोले खाती हुई दूर छिटक गई। भीड़ छँटने पर वह उसे प्लेटफार्म के किनारे खड़ी मिली। मेले में खोए बच्चे की तरह बिबकाई और डरी हुई। उसके बाल बिखरे हुए थे और एक टखने की पायल कहीं गुम थी। घबराई हुई होने के बावजूद उसकी आँखों में अपनी खोई पायल ढ़ूँढ़ने की चाह थी। वह उसे नहीं मिली। पच्चीस बरस बाद आज भी जब वह वहाँ से गुजरती है, उसकी आँखों की वह चाह सुर्ख हो जाती है… लोकल धड़धड़ाते हुए स्टेशन छोड़ कर अगले पड़ाव के लिए गुजर रही थी। तब महावीर ने दादर की रोशनियों में लोकल को पटरियों पर नहीं, एक चीख की तरह सावित्री की लौंग के नग में गुजरते देखा था…

   सावित्री ने नाश्ता तैयार कर लिया था और अब वह धोती के छोर से माथे का पसीना पोंछ रही थी। पंखा चल रहा था। मौसम उमस से भारी था और हांफ रहा था।

   बिट्टी मेज़ पर नाश्ता लगाने में माँ का हाथ बंटाते हुए बोली, ‘‘पापा एक छुट्टी के दिन साथ नाश्ता करने का मौका मिलता है और आप उसे भी बरबाद कर देते हैं।’’

   उसकी शिकायत जायज थी और नाराज़गी भी। एक ही छत के नीच रहते हुए वे सचमुच अजनबी हो गए हैं। महावीर ने सोचा लेकिन कोई जवाब दिए बिना बैड से उठ गया। तैयार होने का वक्त वह आलस में गँवा चुका था। उसने वाशबेसिन में अपने मुँह पर पानी के छींटे मारे और उन्हें तौलिए से पोंछते हुए कहा, ‘‘ले बाबा अब तो खुश है….’’

   ‘‘जैसे जबर्दस्ती कोई ठेल रहा हो… बिट्टी ने तुनककर कहा, ‘‘लगता है पापा अब आप हमें प्यार नहीं करते।’’

   इस आरोप का कोई जवाब नहीं हो सकता था। उसने दिया भी नहीं। वह बस मुस्काया। यह एक करुण मुस्कान थी। माहौल को भारी करनेवाली। और सचमुच माहौल भारी हो भी गया। उसके भीतर एक अंधड़ गुजरने लगा। यह लड़की अपने पापा को इतना प्यार क्यों करती है…और गुस्सा होती है तो इतनी मोहक क्यो लगती है…

   नाश्ता करते हुए तीनों ने इस भारीपन को महसूस किया। तीनो ही इसे हल्का करना चाहते थे। लेकिन तीनों ने ही ऐसा कुछ नहीं किया।  

   वे चुपचाप नाश्ता करते रहे और मौसम पसीना बनकर उनके माथों, चेहरों और कनपटियों पर बहता रहा।

   नाश्ता खत्म होते ही बिट्टी उछली। जैसे मछली फँसते ही काँटे की डोर उछाली गई हो। उसने सिर पर टिकाए गाॅगल्स को आँखों पर उतारा और कंधे पर बैंग लटकाते हुए कहा, ‘‘बाई मम्मा, बाई पापा।’’ और हवा में हाथ लहराते हुए तेज़ी से बाहर निकल गई। कलाई में बंधी घड़ी देखी और दौड़ने लगी।

   शहर एक दौड़ है जो खुद पहियों पर घूम रहा है, और आदमी के दिमाग़ को भी पहियों में बदल रहा है। महावीर ने सोचा। वह भी पैंतीस साल से दौड़ रहा है। इस दौड़ ने उसे कहीं नहीं पहुँचाया। लेकिन अपने दौड़ने पर उसे कोई अफ़सोस नहीं होता। यह दौड़ उसने खुद ख़रीदी है। पर बिट्टी की दौड़….वह ऐसे दौड़ रही है जैसे तपती हुई ज़मीन पर एक नाज़ु़क फूल दौड़ रहा है….

   बिट्टी को तप्त सतह पर नाज़ुक फूल की तरह दौड़ते देखकर वह भीतर तक दहल गया।

   उसने निग़ाह वापिस की। वह खिड़की पर अटक गई। उसकी चौखट सड़ गई थी और मौसम ने उसके सीखचों की आब को जंक में बदल दिया था। 

   ‘‘अजीब बात है, तुमने कभी बताया ही नहीं….’’ उसने कहा।

   सावित्री नाश्ते के बर्तन समेट रही थी। उसके हाथ रुक गए। उसने सहज ढंग से पूछा, ‘‘क्या नहीं बताया?’’

   ‘‘खिड़की की चौखट पता नहीं कबसे सड़ रही है। जानती हो, एक कमजोर खिड़की कितने खतरे पैदा करती है…’’

   सावित्री ने अचम्भे से उसकी ओर देखा। ‘‘तुम रोज इस पर आइना टिका कर शेव करते हो। यह मुद्दतों से सड़ रही है और तुमने इसका सड़ना नहीं देखा। यह तो हैरानी की बात है…’’

   ‘हाँ, सचमुच। हमारी आँखों के सामने बहुत कुछ सड़ रहा होता है और हमें पता ही नहीं चलता। बहरहाल, खिड़की की बात दूसरी है। इसका सड़ना हम भले ही न रोक सकें लेकिन इसे बदल तो सकते थे।’’ महावीर ने कहा, ‘‘खैर कोई दफ्ती मिल जाएगी?’’

   ‘‘दफ्ती! क्या करोगे?’’

   ‘‘जब तक यह बदली नहीं जाती तब तक के लिए मैं इस पर दफ्ती ठोक देता हूँ।’’

   ‘‘खिड़की बंद कर दोगे तो कमरे में रोशनी कहाँ से आएगी…’’

   ‘‘रोशनी से ज्यादा हिफाज़त की ज़रूरत है। तुम नहीं जानती हालात कैसे हैं।’’ महावीर ने कहा और खुद बहुत शिद्दत से दफ्ती तलाशने लगा। मानों अपनी खोई आत्मा तलाश रहा हो। उसने स्टोर का सारा कबाड़ खंगाल दिया। लेकिन दफ्ती या फिर वैसा कुछ उसके हाथ नहीं लगा जो खिड़की पर ठोका जा सकता था। वह हताश हो गया।

   सावित्री उसकी हालत देखकर पसीज गई। तौलिए से उसके चेहरे का पसीना पोंछते हुए उसने कहा, ‘‘क्या बात है? बहुत परेशान लग रहे…’’

   ‘‘ऐसी कोई बात नहीं। बस वक्त पर ज़रूरत का कुछ मिलता ही नहीं।’’

   ‘‘नहीं, बात तो ज़रूर कुछ है और उसकी वजह यह खिड़की नहीं है। कई दिन से देख रही हूँ, तुम रातभर करवटें बदलते रहते हो….’’ सावित्री ने कहा और उसका हाथ थाम लिया, ‘‘बताओ न क्या बात है।’’

   उसके स्पर्श में पाले में उड़ती चिड़िया को अनायास हरी शाख दिख जाने जैसा विश्वास था।

   ‘‘पता नहीं, तुम्हे बतानी चाहिए या नहीं। कई बार सोचा बताऊँ और उससे भी ज्यादा बार सोचा कि न बताऊँ,’’ महावीर ने कहा और खड़े होने की कोशिश की लेकिन उससे उठा नहीं गया। वह बहुत थका हुआ था।

   सावित्री के उसे सहारा दे कर खड़ा किया और बैड तक ले गई। ‘‘तुम उकडूँ बैठ कर काम कर रहे थे। आदत नहीं है, इससे घुटने झनझना गए। थोड़ा इंतजार कर लेते। मैं काम निबटा कर दफ्ती तलाश करती। अच्छा बताओ तो ऐसा क्या हुआ…’’

   ‘‘बात ही कुछ ऐसी है…’’

   ‘‘हमारे दुख-सुख साझे हैं…और हमने क़समें खाई हैं…’’

   महावीर ने असमंजस में सावित्री को देखा। उसके चेहरे की धैर्यहीन विकल उत्सुकता और आशंका की काली चादर ने उसे परास्त कर दिया।

   ‘‘ठीक है सावित्री। तुम यहाँ मेरे पास बैठो।’’ महावीर ने कहा। वह उसके भीतर अपना विश्वास ढूँढ रहा था।

   वह चुपचाप उसके पास बैठ गई।     

   ‘‘लगभग एक महीना पहले की बात है।’’ महावीर ने कहा, ‘‘चार लड़के मुझे मिलने आए। मैं उस वक्त कैंटीन में था। वे कैंटीन में ही आ गए और लापरवाही से मेरे सामने की कुर्सियों पर बैठ गए। उनमें से एक लड़के ने कहा, ‘‘आपको अन्नाभाई ने सलाम भेजा है।’’

   ‘‘भई, मैं तो किसी अन्नाभाई को नहीं जानता।’’

   ‘‘पर अन्नाभाई आपको जानते हंै।’’

   ‘‘अजीब बात है। खैर आप उन्हें भी मेरा सलाम कह दें।’’

   ‘‘भाई ने कहलाया कि आप अपना जो घर बेच रहे है, उन्हें ही बेचें।’’

   ‘‘मेरा घर बेचने का कोई इरादा नहीं है। अन्ना भाई ने गलत सुना है।’’

   ‘‘भाई कभी गलत नहीं सुनते। खैर, नहीं है, तो अब इरादा कर लें।’’

   ‘‘मैं आपका मतलब नहीं समझा…’’

   ‘‘एक दिन तो आपको घर बेचना ही है न।’’

   ‘‘आप मुझे धमका रहे हैं।’’

   ‘‘हमने जेबों से चाकू निकाले…बोलिए, निकाले क्या?’’

   ‘‘नहीं।’’

   ‘‘तो महाशय यह धमकाना नहीं, समझाना हुआ।’’

   ‘‘पर आप मुझे समझा क्यों रहे हैं?’’

   ‘‘क्योंकि हम जाग गए हैं। अब ऐसा नहीं होने देगें कि बाहर के लोग हमारे घरों और नौकरियों पर काबिज रहें।’’

   ‘‘मैं यहाँ पैंतीस साल से रह रहा हूँ। मेरा खयाल है आपके जन्म से पहले से। इतने अरसे में कोई भी शहर अपना हो जाता है। और मैंने तो नक्शानवीस के रूप में इसकी सेवा की है।’

   ‘‘हमें आपकी सेवा की जरूरत नहीं है। और जैसा कि आपने कहा पैतीस साल। आप इतने अरसे से इस शहर पर बोझ बने हुए हैं। वैसे आप इस बीच मराठी तो सीख ही गए होंगे।’’

   ‘‘मैं मराठी लिख और बोल नहीं सकता लेकिन समझ लेता हूँ।’’

   ‘‘पैंतीस साल में आपने मराठी लिखना और पढ़ना नहीं सीखा?’’

   ‘‘जल्दी ही सीख लूँगा। कोई भी भाषा सीखना अच्छी बात है। भाषा से दिमाग़ में खिड़की खुलती है।’’

   ‘‘नहीं सीखी न! अब क्या सीखेंगे। खैर, आप मकान कब बेच रहे हैं?’’

   ‘‘कहा न, नहीं बेच रहा हूँ।’’

   ‘‘ठंडे दिमाग से सोच लें। आपको पंद्रह दिनों का मौका दिया जाता है। वह भी इसलिए कि….खैर उस बात को छोड़िए…’’

   ‘‘मैं मकान नहीं बेच रहा हूँ। और यह मेरा आखरी फैसला है।’’

   ‘‘ठीक है। भाई का एक और पैगाम है। वह आपकी बेटी के नाम है।’’

   ‘‘देखो जनाब। आप हद से बाहर हो रहे हैं।’’

   ‘‘नाराज होने की कोई बात नहीं। भाई ने बिट्टी को प्यार भेजा है…’’

   

   ‘‘वे तुम्हे तुम्हारी कैंटीन में धमका गए और तुम…’’ पूरी बात सुनकर सावित्री ने कहा।

   ‘‘कैंटीन में मैं कई साथियों के साथ था लेकिन अन्ना का नाम सुनते ही वे वहाँ से खिसक गए। मैं अकेला रह गया और वे चार थे। हो सकता है कुछ कैंटीन के बाहर भी रहे हों। ऐसे में…’’

   ‘‘ये कमबख्त अन्नाभाई कौन है?’’ सावित्री ने भय और तिरस्कार के साथ पूछा।

   ‘‘मैंने उन सभी साथियों से, जो कैंटीन में अन्नाभाई का नाम सुन कर खिसक गए थे, उसके बाबत पूछा तो सभी ने कहा कि वे किसी अन्नाभाई को नहीं जानते। कैंटीन के मालिक और कर्मचारियों ने भी उतरे हुए चेहरों से ऐसा ही जवाब दिया। अजीब बात है, सब उसे जानते हैं और नहीं भी जानते…’’

   ‘‘तुमने पुलिस में रपट लिखवाई?’’

   ‘‘मैंने इसे एक क्रूर मजाक समझ कर भूल जाना चाहा था और भूल भी गया था। आखिर मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है कि वह मुझे शहर से बेदखल करना चाहेगा। लेकिन इस हादसे के ठीक पंद्रह दिन बाद चर्चगेट पर फिर चार लड़को ने मुझे घेर लिया। ये वे लड़के नहीं थे जो कैंटीन में मुझे मिले थे। लेकिन ये थे वैसे ही। एक ही सांचे में ढले। उनके बात करने का ढंग भी ठीक वैसा ही था मानो उनके दिमाग एक ही कंट्रोल सैंटर से संचालित हों।’’

   ‘‘पंद्रह दिन बाद एक और हादसा…’’

   ‘‘हाँ, चर्चगेट पर, जहाँ पच्चीस साल पहले जब तुम इस महानगर में आई थी और पहली बार मैं तुम्हें घुमाने ले गया था और जिसे देखकर तुमने पूछा था कि क्या यह इस शहर का दिल है। हम वहाँ दिनभर घूमते रहे थे। आर्ट गैलरी और म्यूजियम देखकर तुम एक साथ वर्तमान, अतीत और भविष्य में तैर रहीं थी। फिर वहाँ से ‘गेट वे’ गए थे हजारों कबूतरों और समुद्र की उछाल खाती लहरों में। लहरों ने तुम्हे भिगोया था। तुम्हारे कंधों और आह्लाद में फैली हथेलियों पर कबूतर बैठ थे। शहर ने तुम्हारे आगमन का ऐसे उत्सव रचा था। तुमने भी इस शहर की शुभकानाओं के लिए कबूतर उड़ाए थे….और फिर पच्चीस साल बाद जब यह हमारी आत्मा में बस गया…’’ आगे के लफ़्ज ठोस धातु के टुकड़ों में बदलकर महावीर के गले में फँस गए।

   सवित्री के लिए यह बेहद घबरानेवाली बात थी। इस शहर में उसकी नाक की लौंग से लोकल चीखते हुए गुजरी थी और उसकी हथेलियों पर कबूतर बैठे थे। इसके  उपनगर में अब उसका डेढ़ कमरे का आशियाना है जिसके खिड़की और दरवाजे पर समुद्र से चलती बयार में सरसराते पर्दे है, मछली धागे में पिरोई सीप की लड़ियाँ हैं, जहाँ उसकी नाक के लौंग के नग में बर्नर की नीली लौ चमकती है। और जो हवा को सुरभित करने वाली जवान होती बेटी बिट्टी की माँ है। 

   उसके चेहरे पर कुहासा फैल गया और आँखें दहकती हुई भट्टी की तरह दहकने लगी। वह डरी हुई भी थी और प्रतिरोध के जज्बे से भरी हुई भी। लगा जैसे वह एक साथ बिखरने और फूटने को व्याकुल है। लेकिन उसने अपने को बिखरने और फूटने से बचाते हुए सधी आवाज में कहा, ‘‘क्या चर्चगेट के हादसे के बाद तुमने पुलिस में रपट लिखवाई?’’

   कफ परेड की कैंटीन में घटे हादसे के बाद उसने अन्नाभाई के बारे में चैकस जासूसी की थी। उसका कोई सूराख नहीं मिला तो उसे यकीन हो गया कि यह एक भद्दा और क्रूर मजाक था और वह सदमें से बाहर हो गया। हादसे के आतंक से वह एक झटके के साथ बाहर निकल गया हो, ऐसा भी नही हुआ। उसे पूरे बारह दिन लगे। बारह दिनों में वह अकसर दुखान्तकी से बाहर निकलता रहा है। अपने पिता की मौत के आघात से बारह दिन बाद, जिस दिन उनकी तेरहवीं थी, वह पूरी तरह उबर गया था। सोग के बारह दिन उसने भयानक मानसिक अवसाद और अपराध-बोध में गुजारे थे। पिता सुल्तानपुर में पक्षाघात से लुंजपुंज मौत मरे थे और वह उनका इलाज नहीं करा सका था। लेकिन तेरहवीं का संस्कार सम्पन्न होते ही मौत को अनिवार्य सच्चाई मानकर वह शोकमुक्त हो गया था और उसने भाइयों से सलाह करके पैत्रिक मकान और ज़मीन बेचने का फैसला ले लिया था। तेरहवें दिन उसने यात्रा शुरु की और पंद्रहवे दिन वह पिता के इतिहास से निकल कर माया नगरी के अपने वर्तमान और अपनी दुनिया में था।

   कफ परेड की कैंटीन में हुए हादसे से उबरने में भी उसे बारह दिन लगे। यह दौर गहरे मानसिक संताप का था। वह न ढंग से सो सका और न खा सका। जरा-सी आहट पर उसका दिल मेंढक की तरह उछलता और दिमाग झुनझुने की तरह बजने लगता। वह अन्नाभाई का पता लगाने की चैकस जासूसी में हर मिलनेवाले को शक की निगाह से देखता रहा। यहाँ तक कि अपनी परछाईं को भी। उसका कोई पता नहीं चला तो वह तेरहवें दिन इस गुंझलक से निकल गया। 

   चैदहवें दिन उसकी आत्मा झिलमिलाने लगी। कांदीवली के अपने डेढ़ कमरे के घर का खुद मुख्तार और मालिक होने का अहसास उसके लहू में दौड़ने लगा। और सबसे बड़ी बात यह थी कि उसकी बेटी बिट्टी सान पर चढ़े शहर में नाजुक सपने देख सकती थी…

   लेकिन पद्रहवें दिन चर्चगेट पर दूसरा हादसा हो गया।

   वह उपनगरीय स्टेशन पर टिकट की लाइन में सबसे पीछे खड़ा था। उसके खड़े होते ही उसके पीछे और आदमी खड़े होते चले गए और लाइन लम्बी हो गई। उपनगरीय स्टेशनों पर वैसे ही लाइने कभी खत्म नहीं होतीं। आदमी बदलते रहते हैं । लाइनें  नहीं बदलतीं….

   सहसा पीछे खड़ा लड़का उसके कान के पास अपनी गर्दन झुका कर फुसफुसाया, ‘‘अन्नाभाई ने आपको दूसरा सलाम भेजा है।’’

   उसने घबरा कर पीछे देखा।

   माथे पर रोली की बिदीं लगाए लहरदार दाढ़ी का एक भगवा-भगत लड़का खड़ा था। 

   उसके कान धपधपाने लगे। फिर भी उसे लगा कि शायद भ्रम हुआ है। उसने कोई जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ती हुई लाइन के साथ आगे बढ़ने लगा।

   ‘‘इतनी जल्दी क्या है। लोकल तो हर दस-पंद्रह मिनट पर छूटती ही रहती हैं। चुपचाप लाइन से बाहर निकल कर अन्नाभाई का पैगाम सुनलो।’’ लड़के ने सख़्त आवाज़ में कहा।

   उसने अपनी पीठ पर कोई कठोर चीज महसूस की और समझ गया कि यह भ्रम नहीं दूसरा हादसा है। वह चुपचाप लाइन से बाहर आ गया। बाहर निकलते ही उसे चार लड़कों ने घेर लिया और वह सिर झुकाए उनके साथ चलने लगा। उसके झकाझक विचारों की धज्जियाँ उड़ चुकी थीं। फिर भी उसे लगा कि उसके साथ उत्तर भारत के मजदूरों से कहीं बेहतर सलूक किया जा रहा है। ‘आमची मुम्बई’ के नारे के साथ पागल भीड़ ठेले-रेहड़ी वालों और इसी तरह के दीगर काम करते लोगों को घेरती है और लहूलुहान कर देती है। उसके साथ वैसा नही किया जा रहा है। वह मज़दूर नहीं, नक्शानवीस है। उसके पास शहर के उपनगर में डेढ़ कमरे के मकान की हैसियत है, और….शायद वे उसे किसी पारसी रेस्त्रां में ले जाकर चाय की प्याली के साथ अन्नाभाई का पैगाम देना चाहते हैं। भय की सघन प्रतीति के बावजूद, जिसमें सिर्फ उसके पैर ही नहीं काँप रहे थे बल्कि पूरा चर्चगेट थरथरा रहा था, उसे कहीं हल्के से गर्व का अहसास हुआ…

   और तभी जब वह उनके घेरे में सिर झुकाए चल रहा था, एक लोकल आई और प्लेटफार्म पर भीड़ का रेला फैल गया। वह पस्त होने के बावजूद चैकन्ना था और वे अपने शिकार को दबोच लेने की लापरवाह मस्ती में थे। उसने मौके का फ़ायदा उठाया और उन्हें चकमा देकर भीड़ में ग़ायब हो गया। वह छुपते-छुपाते पिछले गेट पर पहुँचा और पुलिस की शरण के लिए सड़कों और लेनों में दौड़ने लगा। यह मुम्बई की सड़कों की दौड़ थी जहाँ दौड़े आतंक-उत्तेजना या आश्चर्य पैदा नहीं करतीं। वे चाहे हत्या करने के लिए हों अथवा हत्या से बचने के लिए….

   शहर ने दौड़ में कोई दखल नहीं दिया, बल्कि उसके लिए जगह बनाकर अपना सौजन्य ही दिखाया। ग़लती शहर से नही, उससे हुई। वही उल्टी दिशा में दौड़ रहा था। यह हैरानी की बात थी कि सड़कों की पैंतीस साल की पहचान पलक झपकते ही ग़ायब हो गई थी। वह दौड़ रहा था जैसे अनजानी जगह दौड़ रहा हो। उसने विक्टोरिया टर्मीनस को भी नहीं पहचाना जिसकी दुनियाभर में एक मुकम्मिल पहचान है। उसकी निगाह सिर्फ पुलिस चैकी ढूँढ रही थी।

   आखिर उसने बेतहाशा दौड़ते हुए पुलिस चैकी ढूँढ ही ली।

   खोटे साहब मानवीय संवेदना के व्यक्ति थे। उन्होंने उसे बैठने के लिए सीट दी और उसकी उखड़ी साँस को राहत देने के लिए उसे पानी पिलाया। आवश्यक शासकीय कार्य मुल्तवी करके उसकी बात ध्यान से सुनी। बात सुनकर वे हँसने लगे और बहुत देर तक हँसते ही चले गए।

   खोटे साहब, यानी जी0 खोटे, पुलिस चैकी के प्रभारी थे। थुल-थुल, हास्यभरे और गंजे। डेविड धवन की तरह।

   उनके हँसने के दौरान महावीर चुपचाप उनके पूरे नाम के बारे में सोचता रहा जो अंगे्रजी वर्णमाला के अक्षर जी से कुछ था। लेकिन पहला और अंतिम नाम जो उसके जेहन में उभरा, वो एक अश्लील किस्म का नाम था। जाहिर है, वह या उस जैसा उनका नाम नहीं हो सकता था, भले ही वे वैसे रहे हांे।

   प्रभारी जी0 खोटे पूरी तरह हँस लिए तो बोले, ‘‘मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ….’’

   ‘‘आप एफआईआर लिख लें बहुत मेहरबानी होगी।’’

   ‘‘महोदय आपकी एफआईआर लिखने मे लाॅजिस्टिक प्राब्लम है।’’

   जीवन में पहली बार चैकी में कदम रखने की वजह से महावीर को एक दूसरे किस्म की दहशत ने घेर लिया था। उसकी समझ में लाॅजिस्टि प्राब्लम नहीं आई। वह लड़खड़ा गया और विनम्र याचक नजरों से खोटे को देखने लगा।    

   ‘‘महोदय,’’ खोटे ने लपलपाती नज़रों से उसे घूरते हुए कहा, ‘‘आपके साथ पहला हादसा कफ परेड मे हुआ, दूसरा चर्चगेट स्टेशन पर और वो घर जिसे बेचने के लिए दबाव डाला जा रहा है कांदीवली वैस्ट में है और आप एफआईआर लिखवाने के लिए भिंडी बाजार की चैकी पर आए हैं।’’

   ‘‘हे भगवान तो क्या मैं….यह मुझे क्या हो गया है?’’

   ‘‘कोई बात नहीं, घबराहट में अकसर ऐसा हो जाता है।’’ जी0 खोटे ने उसे सांत्वना दी।

   ‘‘माफ कीजिए मैंने अपका कीमती वक्त जाया किया। मैं एफइआईआर के लिए चर्चगेट चैकी चला जाता हूँ।’’ महावीर माथे का पसीना पोंछते हुए खड़ा हो गया।

   ‘‘एक बात महाशय…’’ जी0 खोटे ने सलाह दी, ‘‘मुझे उम्मीद है कि आपको चर्चगेट की चैकी मिल जाएगी। आप तीस-पैंतीस साल से यहाँ रह रहे हैं तो यह आपके लिए मुश्किल नहीं होगा। लेकिन हवाई रिपोर्ट से कोई फायदा नहीं। नामजद रिपोर्ट लिखवाने से कोई बात बन सकती है लेकिन उसमें प्राब्लम है। आप जानते ही नहीं अन्नाभाई कौन है और कहाँ रहता है। उनके नाम-पते भी नहीं जिन्होंने कफ परेड और चर्चगेट पर आपको अन्ना का संदेश दिया। मेरी सलाह है कि आप चर्चगेट चैकी जाने की जगह चर्चगेट से लोकल पकड़ कर कांदीवली वैस्ट लौट जाएँ। पहले अन्नाभाई के बारे में मालूम करलें और फिर नामजद रिपोर्ट लिखवाएँ। वैसे आपकी मर्जी…’’

   एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह जी0 खोटे से ही अन्ना के बारे में पूछ ले। वे जरूर जानते होंगे। लेकिन एक अजीब से भय से उसकी जुबान ऐंठ गई और उसने उनकी सलाह मानकर चर्चगेट से कांदीवली की लोकल पकड़ ली।

   ‘‘पुलिस में रपट लिखवाने के बारे में पूछ रही हूँ। तुमने बताया ही नहीं।’’ सावित्री ने दोबारा पूछा। इस बार उसके स्वर में झल्लाहट थी।

   ‘‘रपट लिखवाने के लिए अन्नाभाई का पता लगाया जाना जरूरी है। मैं हफ़्तेभर की छुट्टी ले रहा हूँ। इस बीच सबकुछ मालूम करके ही दम लूँगा। इसे हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। मामला बहुत गम्भीर है। पन्द्रह दिन बाद, याने कल रात मेरे साथ फिर एक हादसा हुआ। और वह भी कांदीवली में….’’

   ‘‘हे भगवान हमने उनका क्या बिगाड़ा जो वे हाथ धोकर हमारे पीछे पड़ गए,’’ सावित्री ने पीले पड़ गए चेहरे से कहा, ‘‘फिर एक और हादसा और वह भी कांदीवली में।’’ उसने अपने पैरों को कमज़ोर होते महसूस किया और इससे पहले कि वे उसका बोझ संभालने में असमर्थ हो जाते वह बैड पर बैठ गई और उस जंगले से बाहर, मौसम की उमस देखने लगी, जिसकी सड़ चुकी चैखट पर सुरक्षा की मद्दिम चाह में महावीर ने दफ्ती ठोकनी चाही थी और वह उसे मिली नहीं…

   चर्चगेट पर हुए दूसरे हादसे के बाद महावीर अतिरिक्तरूप से चैकन्न हो गया था और उसने किसी भावी हादसे के खिलाफ पक्की रणनीति तैयार कर ली थी। वह सिर पर हैट लगाने लगा। आँखों पर काले गाॅग्ल्स चढ़ा लिए और अपनी मूँछ बढ़ाली। कैटीन जाना बंद कर दिया। उसके थैले में ‘सामना’ का ताजा अंक होता और कांदीवली के लिए वह लोकल भी अलग-अलग स्टेशनों से पकड़ता।

   पन्द्रहवें दिन वह कुछ ज्यादा ही चैकन्ना था। उसने आध घंटा पहले काम छोडा़ और बस पकड़ कर ताड़देव पहुँचा। एक गुमटी में चाय पी और सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए लापरवाह चाल से पैदल चलते हुए मुम्बई सैंट्रल आया। वह कुछ देर प्लेटफार्म पर टहलता रहा। उसने तीन-चार लोकल जाने दीं और जब वह आश्वस्त हो गया कि उसका पीछा नहीं किया जा रहा है तो कांदीवाली के लिए चौथी लोकल पर सवार हो गया। उसने अपने थैले से ‘सामना’ का अंक निकाला और उसके पृष्ठों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे अहसास हुआ कि उसने सुरक्षाकवच पहन लिया है।

   कांदीवली स्टेशन पर सिर्फ वही भीड़ थी जो उसके साथ लोकल से उतरी थी। वह उस भीड़ के किसी चेहरे को नहीं पहचानता था, फिर भी भीड़ उसे अपनी-सी लगी क्योंकि वह कांदीवली की भीड़ थी। वह चौकस सुरक्षा के लिए प्लेटफार्म की एक बैंच पर बैठ गया और भीड़ छंटने का इंतज़ार करने लगा। स्टेशन की इलैक्ट्रोनिक घड़ी नौ बजकर दस मिनट की सूचना दे रही थी। नौ बजकर पन्द्रह मिनट पर भीड़ छंट गई। प्लेटफार्म पर इक्का-दुक्का आदमी ही रह गए। अब हादसे की कोई गुंजाइश नहीं थी। उसका मनमयूर नाचने लगा। वह उन्हें चकमा दे चुका था। उसके पास एक बेहतर दिमाग़ था जो भविष्य में अन्ना को चकमा देने के कारगर तरीके इजाद करते हुए शहर में बना रह सकता था। उसकी इच्छा उछलकर खड़ा होने और सीटी बजाते हुए प्लेटफार्म पर टहलने की हुई। आनन्द के इन क्षणों को वह सन्नाटे में नहीं गुज़ारना चाहता था। वह उत्सवप्रिय था। बिट्टी का जन्मदिन मनाने के लिए वह बेकर को आर्डर देकर स्पेशल केक बनवाता था।

   वह सचमुच उछला और खड़ा हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह होंठ गोल करके सीटी बजाता, उसने पाया कि वह चार लड़कों के घेरे में है। वे चाय के स्टाल के पास छुपे उस पर निगाह रखे हुए थे। उसके उछलकर खड़ा होते ही वे भी चैकन्ने होकर उछले और उसे घेर लिया। इसके साथ ही उसके आनन्द की गदबदाई अनुभूति चोट खाए शीशे सी टूट कर बिखर गई। 

   इस बार उनका व्यवहार पिछले व्यवहारों से अलग तरह का था। उन्होंने भाई के बाबत कुछ नहीं कहा। न सलाम। न पैगाम। वे कुछ बोले ही नहीं और चुपचाप उसके साथ चलने लगे। उन में से एक लड़के को वह पहचानता था। वह कांदीवली में चारकोप के पास कहीं रहता था और बचपन में उसके घर के सामने सड़क पर क्रिकेट खेला करता था। कारपोरेशन के स्कूल में वह कभी बिट्टी के साथ पढ़ा भी था। तब उसे गोलू कहते थे। पर शायद उसका नाम दया सावन्त था। दिक्कत यह थी कि दया सावंत उसे नहीं पहचान रहा था। उसकी समझ में नहीं आया कि यह सचमुच कोई हादसा है या महज इत्तेफाक है। उसके दिमाग में कुछ बज रहा था। ठक-ठक की आवाज़ के साथ। जैसे कठफोड़वा अपनी पैनी चोंच से काठ में छेद कर रहा हो…

   वह बस अड्डे पर पहूँचा और चारकोप का टिकट लेकर बस में बैठ गया। वे भी उसका पीछा करते हुए बस अड्डे तक आए। उन्होंने भी चारकोप का टिकट लिया और उसके पीछे की सीट पर बैठ गए।

   इसके साथ ही उसके दिमाग में साफ हो गया कि यह महज इत्तेफाक नहीं है। वह उनकी गिरफ़्त में है। अब वे उसके साथ क्रूरता से पेश आएँगे। ऐसा करने का उन्हें हक़ है। उसने चालाकियाँ की है और पकड़े जाने से पहले उन्हें खूब छकाया है। याद रखोंगे बच्चू सुलतानपुरिए बहुत शातिर होते हैं । इस बार भी वो अन्नाभाई के सलाम को उसी तरह ठुकराएगा जैसे पहले ठुकराता रहा है। बर्दाश्त की एक सीमा है। कमस्कम उनके बर्दाश्त की। इस बार शायद वे गुस्से में उसे गोली मार दें। ऐसा भी हो सकता है कि कांदीवली में डेढ़ कमरे की हैसियत के तुच्छ आदमी को गोली मारने की जगह वे उसके पेट में छुरा घोपना पसंद करें। आर्थिक और सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से हत्या के लिए छुरा कहीं बेहतर विकल्प है। गोली चलने के बाद बर्बाद हो जाती है। छुरा बार-बार काम में लाया जा सकता है। भोंथरा होने पर उसकी धार पैनी की जा सकती है। वह भावी पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक धरोहर और हत्या के दस्तावेज़ की तरह म्युजियम में भी सजाया जा सकता है। जाहिर है वे उसी का इस्तेमाल करेंगे…..लेकिन फिलहाल डरने की कोई बात नहीं। उसने मन ही मन सोचा। अभी बीसेक मिनट वह बस में है। यहाँ वे ऐसी वारदात नहीं करेंगे। सुरक्षा के इस अहसास ने उसे बहुत राहत दी। बीस मिनट की जिन्दगी सचमुच बहुत कीमती है….

   बस चारकोप के अड्डे पर पहुँच गई। यह इस रूट का आखरी अड्डा था और सभी सवारियों को यहाँ उतर जाना था। वह बस से उतर गया। उसके साथ वे भी उतर गए। उसने भीड़ में डिसूजा को ढूँढना चाहा। वह उसका दो मकान के बाद का पड़ौसी था। अकसर इस बस में उससे मुलाकात हो जाती थी और उनके बीच बातचीत का एक कमजोर-सा पुल भी कायम था। भीड़ में डिसूजा का होना उसे ताक़त देता। उसने एक निरीह आशा में चेहरे खंगाले। डिसूजा कहीं नहीं था। भीड़ रूई के फाहों की तरह बिखर रही थी।

   वह बस अड्डे से बाहर निकल आया। वे चारों भी। उसके गिर्द घेरा बनाए। मुम्बई का सबसे खराब मौसम था। रोमकूपों के मुँह झरनों की तरह खुले हुए थे। पहली बारिश हो चुकी थी और उस बारिश के लिए जो मुम्बई को तबाह कर देती है आसमान पर बदलों का गिलाफ चढ़ा हुआ था।

   घर और उसके बीच लगभग दो सौ मीटर की सड़क अजगर की तरह पसरी हुई थी, जिस पर वह चार कातिलों से घिरा हुआ था। सड़क के किनारे निश्चित दूरियों पर खड़े बिजली के खम्भों की ऊंघती हुई रोशनियाँ सन्नाटे और आतंक का रहस्यमय संसार रच रहीं थी। वह अपनी पीठ के उस संभावित स्थान में एक ठंडा, झिरझिरा और घूमता हुआ गोला महसूस कर रहा था, जहाँ किसी भी क्षण छुरा घोपा जाने वाला था।

   वे ठंडी, निं ष्क्रय क्रूरता के साथ कदम से कदम मिला कर उसके पीछे चल रहे थे। उसने महसूस किया जैसे उसके दिमाग में बुरादे की तरह बिखेरता और दो फांक करता आरा चल रहा है। उसने चाहा कि वह रुक कर उनसे कहे, ‘प्रिय कातिलों अगर पैतीस साल इस शहर को देने के बाद भी मैं दुश्मन हूँ, कांदीवली में डेढ़ कमरे का मकान जोड़कर मैंने आपकी समत्ति लूटली है और नक्शानवीस बन कर मैंने आपकी सारी संभावनाएँ चुराली हैं तो प्रार्थना है, देर मत करो, छुरा चलाओ और मेरी हत्या करो। मैं बर्दाश्त कर लूँगा। लेकिन मुझसे यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि छुरा अब चला कि अब चला।’

   पर उनका इरादा शायद यही था…वे उसे अंतिम बिन्दु तक तोड़ देना चाहते थे…

   दो सौ मीटर सड़क का फासला कई किलोमीटर की यंत्रणा बनकर पार हो गया। इस दौरान उनका छुरा नहीं चला, सिर्फ उसके चलने का आतंक घना होता रहा। अब वह अपने घर पहँुच गया था और दरवाज़े के सामने खड़ा हुआ था। वे भी उससे कुछ दूरी पर खड़े हो गए। वक्त भी ठिठक कर खड़ा हो गया। सुरक्षा की उत्कट इच्छा के बावजूद उसने घंटी नहीं बजाई। उसे डर था कि कहीं बिट्टी ने दरवाज़ा खोला और….अकसर बिट्टी ही उसके लिए दरवाज़ा खोलती थी। 

   वे कुछ देर इंतजार करके के बाद लौट गए। उनके आंखों से ओझल होने के कुछ और देर बाद उसने घंटी बजाई। दरवाज़ा बिट्टी ने ही खोला। घर से छनकर आती रोशनी में वह उस वक्त नन्ही फाख्ता की तरह दिखाई दे रही थी….

   ‘‘तो वे अब हमारे घर तक भी पहुँच गए।’’ सावित्री ने अंधकूप से निकली ठंडी-अंधेरी और विद्रूप आवाज़ में कहा।

   ‘‘हाँ, और हमारे घर की खिड़की की चौखट सड़ चुकी है….’’

   ‘‘तुमने ठीक पहचाना? दया सावंत ही था?’’

   ‘‘हाँ, और मैंने उसकी आँखों में लपलपाता खंजर भी देखा…’’

   ‘‘वह हमारे यहाँ आता था। बिट्टी के साथ उसकी दोस्ती थी। मैं उसे अपने बच्चे की तरह प्यार करती थी। मेरा खयाल है वह भी…’’

   ‘‘तब वह गोलू था।’’

   ‘‘उसने ही कल रात तुम्हारा घर तक पीछा किया और तुमने उसकी आँखों में लपलपाता खंजर देखा… हे भगवान….’’

   ‘‘हाँ, अब वह गोलू नहीं, दया सावंत है….’’

   सावित्री के चेहरे पर वैसे ही बादल छा गए जैसे बादलों ने आसमान को घेर रखा था, और जो मुम्बई को लहूलुहान करने के लिए अपनी सेनाएँ सजा रहे थे।

   ‘‘आगजनी, मारपीट और हत्याएँ हो रहीं हैं। लोग शहर छोड़कर भाग रहे हैं। पर हम शहर नहीं छोड़ेंगे। हमनें अपने जीवन का सबसे कीमती वक्त इसे दिया है। और यह अब हमारी आत्मा में है। हम इसे प्यार करते हैं….’’ महावीर ने आत्मविश्वास के साथ कहा।

   ‘‘ऐसे हालात में…जब वे हमें बाहर करने के जुनून से भरे हुए हैं। हर पंद्रह दिन में एक हादसा होता है और बिट्टी…’’ सावित्री के शब्द भारी हो कर बिखरने लगे।

   ‘‘इसके लिए ऐतिहात लेना जरूरी है। सुन रही हो न। हाँ ठीक है। पहला तो यह कि हम सुबह उठ कर नित्यकर्म से निबटने के बाद ‘गणपति बप्पा मोरया’ का कीर्तन करें।’’

   ‘‘मैं तो कर लूंगी। पर मुझे तुम्हारे बारे में शक है कि एक-दो दिन के उत्साह के बाद तुम इसे निभा सको और बिट्टी तो ऐसा कतई नहीं करेगी।’’

   ‘‘दूसरा, यह कि हमें मराठी लिखना-बोलना सीखना है। मैं उसका कायदा ले आऊँगा। तीसरा, यह कि हम अपने घर की दीवार पर शिवाजी का बड़ा चित्र टांग लेंगे। भाषा और ऐतिहासिक नायक सुरक्षा की मजबूत दीवारें हैं। इसके अलावा हमें अपनी कमजोर पड़ गई खिड़की तो बदलनी ही है…’’

   ‘‘ये सब बेकार की बातें हैं। हमारी शिनाख्त हो चुकी है और हम अवांछित घोषित किए जा चुके हैं…. बिट्टी तो मराठी पढ़ी है। बोर्ड में उसे मराठी में सौ में पैंसठ नम्बर मिले थे। इस समय वह हमसे बड़े खतरे में है। हम ज्यादा से ज्यादा एक बार ही मारे जाएँगे और वह जिन्दगीभर मारी जाती रहेगी…’’

   ‘‘तो हम क्या करें…क्या करें सावित्री… मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा सिवा इसके कि हम भाग जाएँ, लेकिन हम भागेंगे नहीं।’’

   ‘‘अन्नाभाई का पता मिल जाए। मैं उसके पैरों में अपना सिर रख कर बिट्टी के लिए…’’ सावित्री अपनी बात पूरी नहीं कर सकी और धोती के कोने से आँखें पोंछने लगी।

   ‘‘अन्ना को मैं ढूँढ़ लूँगा। ऐसा नहीं होगा कि तुम उसके पैरों में अपना सिर झुकाओ…..यह शहर उससे ज्यादा तुम्हारा है। तुम्हारी नौक की लौंग के नग में सुलतान पुर के आसमान का सूरज नहीं, दादर की लोकल है, ‘गेट वे’ के कबूतर हैं, समंदर का ज्वार-भाटा है और कांदीवली के इस घर के बर्नर की नीली लौ है। और तुमसे ज्यादा यह बिट्टी का है। इस शहर में उसने जीवन की पहली और सबसे पवित्र साँस ली है….’’

   सहसा फोन की घंटी घनघनाने लगी। चेतावनी की तरह। या फिर हवा में घुलते किसी शोक गीत की तरह। दोनों ने चौंक  कर एक दूसरे का मुँह देखा। किसी में भी फ़ोन का चोंगा उठाने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद सावित्री उठी। लेकिन उसके पहुँचने से पहले फ़ोन बंद हो गया और हवा में कटखन्नी चुप्पी भर गई।

   ‘‘पता नहीं किसका फ़ोन रहा होगा। कट गया।’’ उसने दुविधा में कलाई घुमाई। फिर आश्वस्ति में सिर हिलाया, ‘‘खैर, बिट्टी तो अभी लोकल में होगी।’’

   तभी महावीर ने ठंडे चाकू की तरह भीतर गुजरती उस लड़की की चीख सुनी जिसके साथ कुछ दिन पहले लोकल में यात्रियों की नंगी आँखों के सामने बलात्कार हुआ था। बहुत भोला विश्वास है सावित्री तुम्हारा। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर-बाहर, स्कूल, देवालय, बस-टेªन कहीं भी….दुनिया सभ्य हो रही है और स्त्रियाँ उसी रफ़्तार से असुरक्षित होती जा रही हैं….

   फ़ोन की घंटी फिर घनघनाने लगी। इस बार सावित्री ने झपटकर रिसीवर कान से लगा लिया। उसकी भंगिमा और अधूरे वार्तालाप से महावीर ने अनुमान लगाया कि फ़ोन कोई दुखद समाचार दे रहा है।   

   सावित्री ने बात खत्म करके रिसीवर वापिस रखा। वह एकदम थकी-हारी और उदास थी।

   ‘‘सब ठीक तो है सावित्री…’’ महावीर ने घबराए स्वर में पूछा।

   ‘‘नहीं, कुछ भी ठीक नही है।’’ सावित्री ने हताश स्वर में कहा।

   ‘‘बिट्टी….वह तो ठीक है न।’’

   ‘‘बिट्टी का नहीं, घाटकोपर से चाची का फ़ोन था। चाचा चार दिन से लापता हैं।’’

   महावीर के सीने में मुक्का-सा लगा। वे उसके चाचा नहीं थे, पर चाचा ही थे, और चाचा से भी बहुत ज्यादा थे।

   पैंतीस बरस पहले उन्होंने उसे सहारा दिया था। वह समुद्र में अंतिम छलांग लगाने के लिए जुहू बीच का तमाशा, और आमदरफ़्त खत्म होने का इंतजार कर रहा था। उसका फ़िल्म जगत में तहलका मचाने का जुनून उतर गया था, जो सुलतान पुर के क़स्बे सतियों के बाड़ा में ‘अषाढ़ का एक दिन’ नाटक ने पैदा किया था, और वह हताशा के सीमान्त पर था।

   क़स्बे में भूगोल के अध्यापक अशोक सरकार ने ‘अषाढ़ का एक दिन’ नाटक खेला था। उसमें वह विलोम बना था और वहाँ के सबसे बड़े आढ़ती की बेटी फूलकंवर ने मल्लिका का रोल किया था। उसने नाटक में कालीदास की बखिया उधेड़कर पूरे इलाके में अपने अभिनय की धूम मचा दी थी। स्थानीय अखबारों ने उसे सातवें आसमान में चढ़ा दिया था। इस भयानक सांस्कृतिक हादसे में उसने अपने भीतर एक बेचैन और महान कलाकार देखा। नाटक के दौरान ही उसके और फूलकंवर के बीच प्यार का अंकुवा फूटा और वह बट वृक्ष में बदल गया। क़स्बे में प्यार सर्वोच्च किस्म का अपराध था और कलाकार के लिए वहाँ कोई स्कोप भी नहीं था। उसका दम घुटने लगा। वह भागकर बम्बई आ गया। जब तक उसकी जेब में पैसा रहा वह फ़िल्म जगत के चक्कर काटता रहा और पैसा खत्म होते ही बम्बई ने उसे सड़क पर फेंक दिया।

   वह थका-हारा और अंतिम हदों तक टूटा जुहू की रेत पर जीवन की आखिरी छलांग लगाने के लिए लेटा था और मेले के उठने और भीड़-भड़क्के के खत्म होने का इंतजार कर रहा था। आत्महत्या के निर्णय और उसकी प्रतीक्षा के दौरान उसे घर, गाँव, क़स्बे, माँ-बाप, फूलकंवर वगैरह किसी की भी याद नहीं आई। मानों उसकी स्मृतियों में किसी के लिए कोई जगह नहीं रह गई थी। उसे सिर्फ अशोक सरकार याद आया और उसने झिलमिल परदे पर, जो जुहू की सारी रेत पर फैला था, विलोम का किरदार निभाते हुए अपनी छवियों को देखा। उसे इस बात का कतई अफ़सोस नहीं था कि वह अपने महान जीवन को समाप्त करने जा रहा है। उसे भूख का भी अहसास नहीं रह गया था। वह अब व्याकुल आग्रहता की जगह हताश निष्क्रियता में बदल चुकी थी। उसे बस इस बात की संतुष्टि थी कि अंतिम क्षणों में भी वह एक कलाकार है…

   समुद्र की लहरें उसके साथ खिलवाड़ कर रही थीं। कभी वे सिर्फ उसके पैर को चूमकर लौट रही थीं। कभी उसके सीने में दुहत्थड़ मारकर हँुकार रही थीं और कभी उसके चेहरे पर नमक की महीन परत बना रही थी। वे हर बार उसके नीचे की रेत की परत बहा ले जातीं और वह सतह से कुछ और नीचे धस जाता। यह लहरों से संघर्ष नहीं, लहरों को समर्पण था।    

   सहसा किसी ने उसे झकझोरकरा, ‘‘ए लड़के उठकर बैठ।’’ 

   उसने आँख खोलकर देखा। एक अपरिचित आदमी पावभाजी की प्लेट लिए कह खड़ा था।

   वह उठ कर बैठ गया। लेकिन उसे यक़ीन नहीं हुआ। मायानगरी की निष्ठुरता में यह यक़ीन करने की बात नहीं थी। वह भौंचक्का रह गया।

   ‘‘तुझ से ही कह रहा हूँ। मुझे मालूम है, तू भूखा है….’’

   उसने कोई जवाब नहीं दिया और प्लेट झपटकर पावभाजी पेट में ठूँसने लगा। 

   पावभाजी खत्म हो गई तो आदमी ने कहा, ‘‘मेरे साथ आ। मुझे मालूम है कि तू सड़क पर है, और आत्महत्या करना चाहता है।’’

   वह बिना कोई सवाल किए उसके पीछे चलने लगा था।

   ये बदरी चाचा थे। उन्होंने कहा था, ‘‘बम्बई के दिल में सबके लिए जगह है। बस हिम्मत मत हारना।’’

   उसी चाचा के लिए मुम्बई में कोई जगह नहीं रही….

   ‘‘बहुत अफसोस की बात है सावित्री। मैं चाची की तरफ जा रहा हूँ। तुम्हें भी इस समय उनके के पास होना चाहिए, लेकिन हालात ऐसे हैं कि तुम्हें यहाँ भी रहना चाहिए। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा…’’

   ‘‘तुम जाओ। मैंने चाची को सदा चाचा के साथ देखा है। उन्हें चाचा के बिना देखना मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा…’’

चाचा की चाय की दुकान बंद थी और शहर के शोर में वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था।

   उसका मन उदास हो गया। यह चायघर ही मुम्बई में उसका पहला घर था। वह आहिस्ता आहिस्ता घर का जीना चढ़ने लगा। तीन-चार साल उसने हर दिन यह जीना चढ़ा था। चाची खाने पर उसका इंतजार कर रही होती थी। इस समय जीना चढ़ते हुए उसे लगा जैसे वह किसी अंधी गुफा में गुजर रहा है। वह इतना सॅकरा, अंधेरा और दुर्गम हो गया कि उसे घुटन महसूस हुई। सीढ़ी चढ़कर उसने निगाह उठाई। दरवाज़े पर मृत आत्मा की तरह पर्दा लटक रहा था। सहसा उसके भीतर कुछ टूट गया और कोई आवाज़ भी नहीं हुई। उतनी भी नहीं जितनी बच्चे का गुब्बारा फूट जाने पर होती है। लेकिन वह भीतर तक खोखला हो गया…   

   चाची खिड़की के सामने कुर्सी पर बुत की तरह बैठी थी। उसके बाल खुले हुए थे लेकिन माथे पर गोल सिंदूरी बिंदी चमक रही थी।

   ‘‘यह कैसे हो गया?’’ उसके लड़खड़ाए स्वर में पूछा। 

   वह उसके गले में बाँहें डालकर रोने लगी।

   पैंतीस साल पहले वह चाची के गले में बाँहें डालकर रोया था। यहीं, इसी घर में। चाची इसी कुर्सी पर बैठी थी। माथे पर ऐसी ही बिंदी लगाए। तब वह जवान थी और उसके बालों में मोंगरे का गजरा सजा हुआ था। दरवाज़े पर लटके पर्दे में घँुघरु बंधे हुए थे। हवा में चाची की महक थी और घँुघरुओं का रूनझुन संगीत था।  

   उसने पूछा था, ‘‘घर लौटने का मन है तो बोल। खर्च की फिकर मत करना।’’

   वह वापिस नहीं लौट सकता था। सांस्कृतिक और भवनात्मक तूफान ने उसके सीधा-सादे जीवन को तहस-नहस कर दिया था। अशोक साकार ने महान कलाकार का भ्रम पैदा करके उसकी अध्यापक या तहसील में पेशकार या ऐसा ही कुछ बनने की गवईं-क़स्बाई आकांक्षाओं की चिदियाँ उड़ा दी थी। वह बम्बई में बरतन मांज सकता था। लेकिन अपने गाँव और क़स्बे में उसकी पहचान एक कलकार की थी। वह इसके अलावा कुछ नहीं हो सकता था। और फिर फूलकंवर ने उसकी छाती को आँसुओं से भिगोते हुए कहा था, ‘मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकती महावीर। इस निष्ठुर समाज से मुझे कहीं दूर ले चलो, नहीं तो मैं जंगम के शिवालय की बावड़ी में कूद कर आत्महत्या कर लँूगी।’

   फूलकंवर के आँसुओं से उसके भावनात्मक ताने-बाने की सीवनं उघड़ गई थीं। तय हुआ था कि दोनों घर से नगदी और जेवर लेकर फलाँ दिन, फलाँ ट्रेन से बम्बई कूच करेंगे। वह टिकट लेकर इंतजार करेगा और फूलकंवर पकड़ें जाने की किसी भी संभावना को विफल करने के लिए बुर्का पहनकर टेªन खुलने के समय पर पहुँचेगी।

   उसने टिकट लेकर स्टेशन पर व्याकुल इंतजार की थी। फूलकंवर नहीं आई। गाड़ी सरकने लगी तो वह भग्न आत्मा के साथ उसमें सवार हो गया। फूलकंवर उसके साथ नहीं थी, लेकिन वह टिकट उसके पास था जो उसने फूलकंवर के लिए लिया था। फूलकंवर के प्यार ने उसे अपराधी बना दिया था। उसने माँ के कंगन और घर की नगदी चुराई थी। वह गाँव नहीं लौट सकता था। उसका सिर झुक गया था।  

   ‘‘मन छोटा मतकर महावीर। हमारे साथ रह। तेरी एक माँ यहाँ भी है।’’

   वही चाची उसके गले में बाँहें डालकर रो रही थी।

   वह मजबूर था। बर्फ दोनों तरफ पिघल रही थी। एक ही तरह से…

   उसे कफ परेड में आॅफिस कैंटीन में घेरा गया था। बदरी चाचा अपनी दुकान पर घेरे गए।

   वे माथे पर तिलक लगाए और कांधों पर डोर के दोनों छोरों में बंधी घंटियाँ लटकाए थड़े पर आए और घंटियाँ बजाने लगे।

   धार्मिक किस्म के गाहकों को देखकर चाचा आह्लादित हो गए। उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘आपका स्वागत है,’’ और नौकर को आवाज दी, ‘‘छोटू, गाहकों के बैठने का इंतजाम कर भई।’’

    ‘‘कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं। हम चाय पीने नहीं, अन्नाभाई का सलाम देने आए हैं।’’   

   ‘‘अन्नाभाई!’’ बदरी चाचा ने माथे पर हाथ रखकर सोचा और फिर निराशा में सिर झुलाते हुए कहा, ‘‘मैं तो किसी अन्नाभाई को नहीं जानता…’’

   वे उनके कान पर घंटी टुनटुनाते हुए हँसे, ‘‘हैरानी की बात है। मुम्बई में रहते हैं और अन्नाभाई को नहीं जानते..’’

   ‘‘माफ करना भाई, उमर ही भूलने की हो गई। बहरहाल आप उन्हें मेरा भी सलाम कह दें। वे कभी सेवा का मौका देंगे तो मुझे खुशी होगी।’’

   ‘‘भाई ने सेवा का ही मौका दिया है। खुश होइए जनाब।’’

   ‘‘सेवा…’’ बदरी चाचा अचकचाए।

   ‘‘हुक्म हुआ है कि आप बोरिया-बिस्तर समेटकर अपने वतन चले जाएँ।’’

   ‘‘आप मुझे धमकाने आए हैं, और वह भी मेरी ही दुकान पर।’’

   ‘‘ये तो गलत कह रहे हैं….हम धमकाने नहीं, समझाने आए हैं।’’

   ‘‘आप अन्नाभाई को बता दें। मैं यह शहर नहीं छोडूँगा।’’

   उन्होंने अपनी जेबों से चाकू निकालकर हवा में लहराए, ‘‘देखो भइय्ये मुम्बई तो छोड़ना ही पड़ेगा। उम्मीद है आप हमें चाकू चलाने को मजबूर नहीं करेंगे।’’

   ‘‘आप बेशक मेरे चाकू मार सकते हैं, लेकिन मुझे यहाँ से भगा नहीं सकते…’’

   ‘‘जब तक बहुत जरूरी नहीं होता हम चाकू का इस्तेमाल नहीं करते। सोचने का एक मौका है आपके पास। पूरे पंद्रह दिन। आप समझदारी दिखाएँगे। अच्छा तो पंद्रह दिन बाद…’’ उन्होंने कहा।

   छोटू काँपते हाथों से ट्रे में पानी के गिलास लिए खड़ा था।

   उन्होंने उसे धमकाया, ‘‘ए छोकरे तुझे भय्ये की नौकरी करते शर्म नहीं आती। इसी समय यहाँ से फूटले। समझा।’’ 

   घबराहट में छोटू के हाथ से ट्रे छूट गई और वह छूटी ट्रे उठाने की जगह बित्ती भरकर दुकान से निकल कर बाहर भाग गया।

   ‘‘तेरे चाचा ने उनकी धमकी की परवाह नहीं की,’’ चाची ने कहा, ‘‘छोटू नहीं लौटा। वह उस दिन से घर से ही गायब है। वे अकेले रह गए। उन्होंने अकेले ही दुकान खोली। वे हारनेवाले इंसान नहीं थे…’’

   ‘‘मुझे मालूम है।’’ महावीर ने सहमति में सिर हिलाया।

    ‘‘पंद्रहवें दिन वे ठीकठाक दुकान खोलने के लिए निकले और वापिस नहीं लौटे…..मुझे नहीं मालूम, उस दिन उनके साथ क्या हुआ। पुलिस इसे अपहरण नहीं मानती। कहती है, यह गुमशुदगी का मामला है। तलाश जारी है। तू क्या सोचता है महावीर…’’

   महावीर लड़खड़ा गया। वह जानता था, वे अगवा किए गए हैं। उसे भी चर्चगेट से अगवा किया जा रहा था। वह चकमा देकर बच गया। चाचा चकमा नहीं दे सके और अगवा हो गए। उसने सहज होने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘पुलिस ठीक कह रही है। उन्हें ढँूढ लिया जाएगा।’’

   ‘‘तू भी मुझे झूठी तसल्ली दे रहा है। मैं जानती हूँ, उन्हे उठाया गया है। हवा ही ऐसी चल रही है…गोरे गाँव से दीनानाथ को डेरी समेटकर जाना पड़ा। और भी न जाने कितने लोग…’’ चाची ने कहा। उनकी आँखें किसी खंदक में डूबती जा रही थीं। 

   उसे अफ़सोस हुआ। पैंतीस साल के अरसे में वह पहली बार उस समय उनसे झूठ बोला था, जब उन्हें सच की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। उसकी आवाज़ इतनी खोखली थी कि उसे खुद यक़ीन नहीं हुआ, यह उसकी आवाज़ है। उसके कान सुर्ख हो गए। वह एक अनिवार्य मज़बूरी में आँखें बचाकर खिड़की से बाहर देखने लगा। उसे धक्का लगा। इस घर की खिड़की की चैखट भी उसके़घर की चैखट की तरह सड़ रही थी…

   ‘‘मैं अकेली हो गई महावीर,’’ वे सुबकने लगीं, ‘‘वे थे तो….आज कुछ भी नहीं रहा। बहुत डर लगता है। घर खाने को दौड़ता है और रातें पहाड़ हो गई हैं। एक बेटा ही होता तो….’’

   पैंतीस साल पहले चाची ने माँ बनकर उसे टूटने नहीं दिया था। आज वह टूट रही है और वह बेटा बनकर उसे सहारा नहीं दे सकता। इस समय सबसे बड़ी मदद यही होती कि एक ऐलान की तरह चाचा का होटल खुले और खुलता रहे…लेकिन वह….

   ‘‘अरे, मैं तो चाय तक के लिए पूछना भूल गई….’’ वे घुटनों पर हाथ रखकर उठीं। 

   उसने मना करना चाहा। नहीं किया और वह भी उनके साथ कीचन में आ गया।

   एक वक़्त था। वे कीचन में काम करती रहतीं। वह हाथ बंटाता जाता। उनके बीच न खत्म होनेवाली बातें होतीं। वक्त नहीं बंधता लेकिन उनकी बातें उसे बाँध लेतीं। घड़ी की सुइयाँ घूमती रहतीं और अजीब बात कि वक्त थमा रहता। इस दीवाल पर कितनी बातें लिखी हैं। फूलकंवर के लिए अब उसकी स्मृतियों में कोई जगह नहीं रही। लेकिन वह आज भी चाची के कीचन की दीवारों पर बातों में लिखी हुई है। और इस समय बात करने को कुछ भी नहीं है सिवा दहशत के….वह उसे भी साझा नहीं कर सकता।

   चाय पीकर वह काफी देर बैठा रहा। यह एक व्यर्थ बैठना था। जैसे वह खुद एक बोझ हो। टूटी हुई बात का सिरा जुड़ ही नहीं रहा था। वह जोड़ना भी नहीं चाहता था। बाहर शाम एक ख़ौफ़ की तरह उतर रही थी।

   ‘‘अब चलूँ। कोई भी परेशानी हो तो….’’

   ‘‘तेरे सिवा और है ही कौंन…. और तू मुझे  कमजोर लग रहा है। अपना ख़याल नहीं रखता? सावित्री और बिट्टी को मेरा आशीष देना।’’ चाची ने कहा। उसके साथ दरवाजे़ तक आई। पर्दा सरकाया और सिमटकर दीवार के सहारे काठ की तरह खड़ी हो गई।

   उसने धीमें धीमें सीढ़ियाँ उतरनी चाही थी। चाची को कहीं यह अहसास न हो कि वह उसके भय से भाग रहा है। लेकिन वह बहुत तेज़ी से सीढ़िया उतर रहा था। वह चाची के नहीं, अपने भय से भाग रहा था।

   अन्नाभाई ने चाचा को सलाम भेजा और वे अगवा हो गए।

   उसे भिजवाया सलाम उधार है।

   और बिट्टी! उसे तो अन्नाभाई ने प्यार भेजा है….

   वह सीढ़ि़याँ उतर कर घाटकोपर से लोकल पकड़ने के लिए दौड़ने लगा। बजती हुई घंटियों, चाकू की लपक और लड़की की चीखों, आगजनी और हत्याओं के बीच वह इस यक़ीन के साथ दौड़ रहा था कि वो कांदीवली पहुँचेगा। घर का दरवाज़ा बिट्टी ही खोलेगी और वह मुस्कुरा रही होगी….

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    By: सुभाष पंत

    भारतीय वानिकी अनुसंधान एवम् शिक्षा परिषद, देहरादून से सेवामुक्त वरिष्ठ वैज्ञानिक ।
    प्रकाशित पुस्तकें
    कहानी संग्रह-तपती हुई ज़मीन, चीफ़ के बाप की मौत, इक्कीस कहानियाँ, जिन्न और अन्य कहानियाँ, मुन्नीबाई की प्रार्थना, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, एक का पहाड़ा, छोटा होता हुआ आदमी
    उपन्यास-सुबह का भूला, पहाड़चोर
    नाटक-चिड़ियाँ की आँख
    सम्पादन-शब्दयोग त्रैमासिक पत्रिका
    सम्प्रति-सवतंत्र लेखन
    पता-280, डोभालवाला, देहरादून-248001
    mail- scpantdw@gmail.com
    मोब-09897254818

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