उसने युवती के चेहरे को गौर से देखना चाहा | बैठे-बैठे घूम कर देखना शायद युवती को असहज कर सकता है यही सोचकर वह खड़ा हुआ है | लेकिन, तब तक उसकी ट्रेन आ गई और, “मम्मी ट्रेन आ गई है बाद में बात करती हूँ, नमस्ते |” कहती हुई वह ट्रेन के डिब्बे में समाती हुई कहीं खो गई | इशरत तो गौर से उसके चेहरे को देख भी नहीं पाया | वह अनजाने ही ट्रेन की तरफ बढ़ा, अचानक पीछे ट्रैक पर आई उसकी ट्रेन ने उसे पीछे लौटने को विवश कर दिया | वह तो अपनी ट्रेन छोड़ भी देता किन्तु युवती की ट्रेन चल पढ़ी | इशरत का मन अपना माथा पीट लेने को  हुआ | वह खुद को हताश, ठगा हुआ अपाहिज सा खड़ा महसूस कर रहा है  | अपनी रेल को अभी खड़ा देखकर उसका मन हुआ, एक बार दौड़ते हुए ही उसके डिब्बे में झांक कर देखे, शायद उसका चेहरा ढंग से देख ले | मगर देर हो गई, ट्रेन ने गति पकड़ ली और उसका डिब्बा बहुत आगे निकल गया है |

चुटकी-चुटकी प्रेम॰॰   

(हनीफ मदार)

हनीफ मदार

                                                    

१-                                                       

शाम करीब पांच बजे है | वही शोर-शराबा, चिल्ल-पों के बीच किसी महिला उद्घोषक की सुरीली सी आवाज़ | आज पलवल वाला सर्कुलर थोड़ा लेट है | इसलिए आज भीड़ और दिनों से कुछ ज्यादा दिख रही है | प्लेटफ़ॉर्म के इस कोने से उस कोने तक सिर ही सिर नज़र आ रहे हैं | प्लेटफार्म के एक कोने पर लगे एक बड़े से होर्डिंग पर, देश के प्रधानमंत्री का मुस्कराते हुए बड़ा सा फोटो है, होर्डिंग पर लिखा है ‘प्रगति पथ पर दौड़ता देश, शिक्षित बचपन, रोजगार युवा |’ उसी होर्डिंग के नीचे पांच से दस साल तक की उम्र के अर्ध नग्न कपड़ों में, चार-पांच बच्चे मायूसी से यात्रियों से खाने को कुछ मांग रहे हैं | पच्चीस से अट्ठाईस के युवा चाय की केन हाथ में लिए, ‘चाए॰॰॰चाए॰॰॰’ चिल्लाते हुए गुजर रहे हैं, जिनके भीतर, ठेकेदार को हिसाब देने के बाद, घर की दाल रोटी का जुगाड़ बना लेने की कसरत के कुछ निशान चेहरे पर भी उभर रहे हैं | स्टेशन की सभी बैंचें भरी हुई हैं । इन्हीं में से एक बैंच पर इशरत अपनी गाड़ी के इंतज़ार में फोन के ई-पेपर एप पर बे-मन अंगुली खिसकाते हुए एक ख़बर पर रुका है “बीफ़ के शक में पीट-पीट कर युवक की जान ली ।” | ख़बर पढ़ते हुए उसके चेहरे पर ऑफिस की थकान के चिन्ह और गहरे हो गए हैं | 

बगल में बैठी युवती ने उससे  कुछ पूछा।इशरत ने बिना उसकी तरफ देखे ही उसे जबाव दे दिया | युवती के फ़ोन की घंटी बजी | “मम्मी नमस्ते !, कैसी हैं आप॰॰॰॰? हाँ मैं ठीक हूँ……नहीं आज, आगरा में हूँ…. हाँ ऑफिस के एक काम से आई थी… स्टेशन पर गाडी के इंतज़ार में हूँ | हूँ…..! रोड़वेज, अचलपुर से ही….?” गाँव का नाम सुनते ही इशरत के शिथिल से शरीर को अचानक  झटका सा लगा | उसने कनखियों से युवती की  तरफ देखने का असफल प्रयास करते हुए उसकी बातों पर ध्यान दिया | “चलो मेरे लिए  सुविधा हो गई | अच्छा, कालीचरन चाचा उसी से आये थे..? अरे वाह! उन्होंने बताया नहीं….|” युवती के चाचा का नाम सुनते ही, इशरत एक अजीब कौतूहल से भरा उठ खड़ा हुआ | 

उसने युवती के चेहरे को गौर से देखना चाहा | बैठे-बैठे घूम कर देखना शायद युवती को असहज कर सकता है यही सोचकर वह खड़ा हुआ है | लेकिन, तब तक उसकी ट्रेन आ गई और, “मम्मी ट्रेन आ गई है बाद में बात करती हूँ, नमस्ते |” कहती हुई वह ट्रेन के डिब्बे में समाती हुई कहीं खो गई | इशरत तो गौर से उसके चेहरे को देख भी नहीं पाया | वह अनजाने ही ट्रेन की तरफ बढ़ा, अचानक पीछे ट्रैक पर आई उसकी ट्रेन ने उसे पीछे लौटने को विवश कर दिया | वह तो अपनी ट्रेन छोड़ भी देता किन्तु युवती की ट्रेन चल पढ़ी | इशरत का मन अपना माथा पीट लेने को  हुआ | वह खुद को हताश, ठगा हुआ अपाहिज सा खड़ा महसूस कर रहा है  | अपनी रेल को अभी खड़ा देखकर उसका मन हुआ, एक बार दौड़ते हुए ही उसके डिब्बे में झांक कर देखे, शायद उसका चेहरा ढंग से देख ले | मगर देर हो गई, ट्रेन ने गति पकड़ ली और उसका डिब्बा बहुत आगे निकल गया है | 

इशरत की हालत एक पल में स्टेशन पर ठगी का शिकार हुए किसी लुटे हुए यात्री की सी हो गई | वह तब तक उस ख़ाली पटरी को देखता रहा जिस पर जा चुकी गाड़ी पूरी तरह से ओझल न हो गई | फिर, वह थके पैरों से अपनी गाड़ी तक पहुँचा पाया है ।

2-  

इशरत गाड़ी में चढ़ते ही इधर-उधर कोई खाली सीट देखने लगा।उसे लगा, वह शायद खड़ा नहीं रह पायेगा | कहीं कोई खाली जगह न पाकर वह बाहर गेट पर आकर पाइप पकड कर खड़ा हो गया, स्तब्ध  शून्य को ताकता हुआ | गेट पर लग रही तेज़ हवा उसके बचपन की स्मृतियों के पन्ने एक-एककर  पलट रही है। 

अचलपुर इशरत का गांव नहीं है, या, यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि उसकी पैदाइश वहां की नहीं थी । वह पाँच साल का था, तब नरौरा से निकलने वाली नहर पर पुल के निर्माण के वक़्त, उसके पिता काम की तलाश में वहां पहुंच गये थे । गाँव उसका कोई भी रहा हो लेकिन उसकी कल्पनाओं में जब भी अपने गांव की तस्वीर बनीती वह अचलपुर ही होता । वहीं की रेत में उसके पैरों ने चलना सीखा था । जीवन को समझने की क्रिया में गांव के सब खेल, लड़ना-झगड़ना, वे-मतलब भागना-दौड़ना, छिपना-छुपाना या पेड़ों पर चढ़ जाना, ईख के खेतों से गन्ने तोड़ना, मक्का के भुट्टे या बाजरे की बालियां चुराना, सारा-सारा दिन गंगा में डुबकी लगाना, कमली चाचा को चकमा देकर उनकी बारी से तरबूज ले भागना, आम की डाली पर बैठकर नमक के साथ कच्ची आमी खाना या सूखे अमरूद इकट्ठे करना जिन्हें दोपहरी भर पीसना, फिर काला नमक और तेजाब मिला कर चटखारे ले-ले कर चाटना, अंकिता के लिए जामुन तोड़ना और घर पर उसके साथ बैठकर इमली या लैमनजूस की गोलियां खाते हुए हंसना-ठठाना सब याद है उसे कुछ भी नहीं भूला है |

अचानक इशरत को लगा जैसे वह आठ नौ साल का बच्चा बन गया है । जैसे वह रेलगाड़ी में नहीं बैलगाड़ी में अंकिता के साथ बैठा है | आसपास यात्रियों की भीड़ उसे उन बच्चों सी लगने लगी जो अंकिता के चाचा कालीचरन की बारी से तरबूज गाड़ी में भरवाने जा रहे हैं | ऑफिस में काम की थकान से मलिन हुआ चेहरा भी उसे बारी की सीलन भरी गर्मी में भूख के कारण हुआ लग रहा है | अंकिता उसके चेहरे को देख रही है “इसरत, भूख लगी है क्या ?” इशरत मौन है कुछ नहीं कहा | उसे गुस्सा आ रहा है यह सोचकर कि ‘अंकिता उसे यहाँ क्यों ले आई है ?’ अंकिता एक तरबूज उठाती है “चल आ..|” वह उसे आम और अमरुद के पेड़ों के बीच लगी रहट पर ले आई है | दोनों रहट की लाठ पर ऊटपटांग बैठकर तरबूज खा रहे हैं | इशरत कह रहा है “तेरे चाचा चिल्लायेंगे तो नहीं |” 

“नहीं ! उन्हें पता है तू मेरा दोस्त है |” 

“लड़का, लड्किन के दोस्त नहीं होते |” 

“चल चुप, तू है |”  

“अच्छा बता, तू कैसे जान गई कि मुझे भूख लगी है |” 

“तेरी सकल पर तेरह बजे थे |”  इशरत जोर से ठठा कर हंस पड़ा | पीछे खड़े किसी यात्री ने चौंक कर पूछा “क्या हुआ भाई साहब ?” हड़बड़ा कर इशरत ने पीछे देखा जैसे उसका सपना टूटा हो “ज.. जी कुछ नहीं |” 

  अचानक इशरत को ध्यान आया, वह अंकिता को फेसबुक पर सर्च करते हुए बुदबुदाया ‘आई डी तो अपने असली नाम से ही बनाई होगी |’ पल भर में इस नाम की सैकड़ों की लिस्ट सामने आ गई | वह एक-एक प्रोफाइल खोल कर देखने के प्रयास में, थक कर वहीँ दीवार से सटे हुए ही खिसकता हुआ उकुडूं बैठ गया | उसने अगली प्रोफाइल खोलने को अंगुली टच की | फ़ोन स्क्रीन पर गोल-गोल चक्कर सा घूमने लगा | “ओह साला ये है डिज़िटल.. बतचोदी बड़ी-बड़ी हों रहीं हैं और नेट की माँ-बहन हुई रहती है |” स्क्रीन पर घूमता हुआ गोल चक्कर उसे अपने दिमाग में घूमता सा लगने लगा | वह झुंझलाया सा, खड़े होकर फिर बाहर देखने लगा | रेलवे लाइन के समानांतर चलने वाली सड़क पर, एक मोबाइल नेटवर्क कम्पनी के बड़े विज्ञापन होर्डिंग पर उसकी नज़र रुक गई ‘चलो नहीं, दौड़ो इंडिया, 4 जी, बिना रुके कहीं भी कभी भी |’ 

3- 

तेजी से घर की सीढियां चढ़ते हुए  वह सीधा कमरे में जाकर अपने बैड पर धम्म से  गिरा | बैग भी बेतरतीबी से पटक  दिया जिसे वह बेहद सहेज और संभालकर रखताहै | यहाँ रहते हुए यही बैग तो उसका पूरा ऑफिस, घर सबकुछ है।बाकी तो इस छोटे से कमरे में, एक पाइप वाला पलंग, चार बर्तन, कुछ जोड़ी कपड़े और कुछ किताबों के अलावा उसका फोन है उसका साथी | रोजाना घर आकर वह बैड पर पसर जाता था।कुछ देर बाद छोटे से गैस चूल्हे पर चाय चढ़ाता  जब तक चाय उबलती, वह मुंह हाथ धो लेता । चाय के साथ कोई किताब पढ़ता, छत पर कुछ देर टहलता फिर बाहर जाता खाना खाने, सोने से पहले कुछ देर पढ़ता और सो जाता | लेकिन आज वह सब कुछ भूल गया है । 

उसने ने बैठते ही फोन उठाया और फिर से अंकिता की खोज शुरू | ‘फ़ेसबुक पर होगी तो ज़रूर ।’ सोचते हुए प्रोफाइल बदलने लगा । उसके माथे की लकीरें और ज्यादा गाढ़ी होती जा रहीं हैं | “एक ही झलक देखी थी लेकिन चेहरा दिमाग की मैमोरी में फिट तो है, बस सामने तो आये पहचान तो लूंगा |” वह बुदबुदाया । आख़िरकार भूख और थकान के सामने घुटने टेक ही दिए जब बहुत देर तक फ़ोन पर जूझने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ । 

उसे जैसे ज़िंदगी के और क़रीब लाने का, कोई व्यसन मिल गया था । कई दिन तक, जब भी समय मिलता वह इसी क्रिया के सम्पादन में व्यस्त हो जाता । ऑफिस, रेलवे स्टेशन, रास्ते में, घर पर | एक दिन अचानक वह बैड से उछल पड़ा “यस…. अंकिता…..!” प्रोफाइल पर लगे अंकिता के फोटो को अपलक देर तक देखता रहा | जैसे वह अंकिता का फोटो न हो बल्कि खुद अंकिता उसकी स्मृतियों से बाहर निकल आई हो | “तू तो बहुत खूबसूरत है…. तब तो ऐसी नहीं थी…|” उसने जैसे फ़ोटो से कहा और रिक्वेस्ट भेज कर एक लम्बी सांस खींची |  

इशरत को लगा उसने आधा रास्ता पार कर लिया है।इसी तसल्ली में उसने अपने कपड़े खोले, चाय चढ़ाई  और फ़ोन पर लाइव न्यूज़ देखने लगा ‘एंटी रोमियो सक्वाइड दस्तोंने पार्कों में बैठे लोगों से कराई उठक-बैठक॰॰॰॰’ तभी उसका फोन बज उठा “नरेन्द्र॰॰॰॰ओह यार !” उसे याद आया नरेंद्र ने तीन दिन पहले अपनी एक प्रजेंटेशन तैयार करने में मदद मांगी थी | जिससे उसे प्रमोशन मिल जाएगा | इशरत  ने व्यस्त होने का बहाना भी किया था।लेकिन उसने “यार तेरा मैथ अच्छा है तो प्लीज़ कर देन |” इशरत ने फोन उठाया “हाँ नरेंद्र कर रहा हूँ यार….ओके ओके |” इशरत को बुझेमन से कम्प्यूटर खोलना ही पड़ा | 

अचानक उसे कुछ याद आया और वह मुस्कराने लगा, मैं गणित में बहुत होशियार था। इसी गणित की वजह से मेरी अंकिता से दोस्ती हुई थी। हालांकि यह बात मुझे तो बहुत बाद में पता चली थी, तब तक हम पक्के दोस्त बन गए थे। वह गणित में कहीं भी अटकती तो मुझसे पूछती । इसी बहाने उसका मेरे घर आना-जाना शुरू हुआ था। वह दोपहर का वक्त होता था जब वह मेरे घर कोई कापी या किताब लेकर आती थी। हर दोपहर उसका सामना अम्मा से ही होता था। एक-दो बार तो अम्मा ने पूछा ‘‘कैसे आई है लली….?’’ वह बोल देती इसरत से कुछ सवाल पूछने हैं चाची । फिर अम्माँ ने भी पूछना बंद कर दिया था । पहले-पहल गणित के सवाल करते फिर हम घंटों बतियाते रहते। वह मुझे अपनी जेब से निकाल कर लैमनजूस की गोलियां या इमली देती, दोनों चटखारे लेकर खाते और बिना किसी मतलब के हंसते ।

अंकिता मेरे साथ ही चौथी कक्षा में पढती थी | पांच कक्षाओं पर अकेले धनीराम मास्साब ही हुआ करते थे | वही हैड मास्साब भी थे | दूसरे मास्साब कभी-कभी आते, रजिस्टर में कुछ लिखते और हफ़्तों को गोल हो जाते | पूरे स्कूल में, मैं अकेला लड़का था जिसे पच्चीस तक पहाड़े याद थे | अब तो कैलकुलेटर ने सब भुला दिया । मास्टरों के अभाव में धनीराम मास्साब मुझे दूसरी, तीसरी कक्षा में गणित पढ़ाने को कह देते | मेरी छाती चौड़ी हो जाती, मुझे लगता मैं मास्टर हो गया हूँ | खाने की छुट्टी में भी मुझे लगता मैं पढ़ाता ही रहूँ | लेकिन जब सब बच्चे अपनी रोटियां खोलकर खाने में लग जाते तब मजबूर होकर मैं बाहर निकल आता । अंकिता मेरा इंतज़ार करती मिलती | मैं अपनी रोटियां लेकर अंकिता के पास पहुँचता तो वह गुस्सा हो जाती | “बड़ा मास्टर हुआ है ?” 

“तैने खाई चौं नाँय॰॰॰?” मैं उससे पूछता ।  

“आज अम्मा ने खीर और परांटे बनाए थे, नईं खानें तो जा मर, खा अपनी रोटी |”

“मैं खाय लूंगो तो तू भूखी नईं रहेगी॰॰॰ ?”

“तेरी रोटी नईं हैं का ?” 

लगभग रोज ही हम दोनों ऐसे ही लड़ते-झगड़ते सब खा जाते फिर हँसते ‘ओये सब ख़तम’ | इशरत की मुस्कुराहट हंसी में तब्दील हो गई है | यहाँ कमरे में उसके अलावा कोई नहीं है जो उसे टोके | वह माउस पैड पर अंगुली घुमाता देर तक हंस रहा है | चाय उफन कर पतीली से बाहर आ रही है | उसने झटके से उठकर गैस बंद की है | 

कई दिनों से इशरत को हर समय इंतज़ार रहता है अपनी फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार किये जाने का | उसे फेसबुक में कोई आनंद नहीं रह गया है फिर भी, वक़्त मिलते ही वह फेसबुक खोलता, देखता और बंद कर देता | सपाट दौड़ती इशरत की जिंदगी में एक अजीब भूचाल सा आ गया है | ऑफिस में काम करते-करते वह अचानक कहीं खो जाता है और अगले ही पल वह खुद को नौ दस साल के बच्चे के रूप में अचलपुर के प्राइमरी स्कूल में पाता है | 

इशरत दोनों हाथों से दवात को पकड़कर अपनी पट्टी को घिस-घिस कर चमका रहा है, जैसे पट्टी चमकाने की प्रतियोगिता चल रही हो । कुछ बच्चे इशरत से वह पत्ते मांग रहे हैं जो उसने अपनी पट्टी चमकाने के लिए उस पर रगड़े थे | बच्चे उन पत्तों को चिक्का कहते थे । 

“इसरत ! मेरे पास आज खड़िया नहीं है |” अंकिता मायूस है । अचानक इशरत चिल्लाता है “खड़िया में चिक्का, खड़िया में चिक्का | एक पल में खड़िया इकट्ठी हो गई | अंकिता इशरत की इस तिकड़म पर हंसती-हंसती दुहरी हुई जा रही है | इशरत और जोश में अपनी पट्टी घिसने लगा है॰॰॰॰॰|

“इशरत ! क्या कर रहा है ?” नरेंद्र की आवाज़ ने इशरत को चौंका दिया | उसने अचकचा कर इधर-उधर देखा | वह तो ऑफिस में है और अपनी क़लम उस रिपोर्ट पर घिस रहा है, जो उसे कुछ देर पहले ही जांचने को नरेंद्र ने दी थी | “सौरी यार… में दूसरा प्रिंट लेकर, अभी करता हूँ |” 

आज सुबह ऑफिस में पहुँचते ही एक फरमान सुनाया गया, कम्पनी के कुछ नए नियमों की जानकारी के लिए सभी को अगले दस मिनट में जी०एम० ऑफ़िस में पहुँचना है । “और लो ! नई सरकार की तरह अब यह कम्पनियाँ भी नित नए शिगूफे छोड़ेंगी ।” रमाकान्त ने व्यंग्य किया । 

“अरे भाई ! ऐसा न करें, तो यहाँ तुम सैलरी बढ़ाने की माँग करोगे, बाहर पब्लिक सरकार से रोज़ी-रोज़गार की माँग करने लगेगी॰॰॰ लोगों को भुलाने का अच्छा तरीक़ा है दोनो के पास॰॰॰। अब चलो भी अंदर॰॰॰॰।” मुद्गल जी ने हाँक लगाई । कोई हँसा किसी ने मुँह बिचकाया और चल दिए जी० एम० ऑफ़िस । 

“आज से तीन दिन तक कोई लीव नहीं जाएगा, न ही कोई बहाना चलेगा, ऑडिट टीम आ रही है | सरकार कुछ नए क़ानून लाने वाली है न इसलिए ।” यूं तो यह फरमान ऑफिस में कम्पनी का जी० एम्० सुना रहा है लेकिन इशरत को लग रहा है जैसे धनीराम मास्साब प्रार्थना में कह रहे हों “आज कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं निकलेगा, आज सभी बच्चों के टीके लगेंगे |” अंकिता सुई से बहुत घबराती है, सोचते ही इशरत ने देखा अंकिता के चेहरे पर घबराहट है | इशरत ने आँखों-आँखों में इशारा किया | अंकिता कुछ और परेशान, धीरे से पूछ रही है “का…?” इशरत कुछ नहीं बोलता, उसे खुद नहीं पता क्या करेगा | स्कूल गेट पर मास्साब ने ताला लगा दिया है | 

मास्साब के ऑफिस में जाते ही आधे से ज्यादा बच्चे बस्ता छोड़ बाउंड्री से कूदकर भाग खड़े हुए।अंकिता लम्बाई कम होने के कारण चढ़  नहीं पाई तो रोने लगी | इशरत को आइडिया सूझा, वह मुर्गे की तरह दीवार के सहारे झुक गया।अंकिता उसके ऊपर चढ़कर बाउंड्री पार कूद गई | “इसरततू….?”

“तू जा…. |” 

“नहीं, मैं स्कूल के पीछे मिलूँगी…. |” 

अब इशरत को कुछ नहीं सूझा तो वह स्कूल के बरांडे से सटे नीम के पेड़ के सहारे छत पर जाकर, दीवार से लटक कर स्कूल के पीछे कूद गया | इस हड़बड़ी में उसके पैर में चोट लग गई | इशरत दर्द से कराह उठा | अंकिता देख कर रो पड़ी | अंकिता ने उसे उठाने में सहारा दिया | “रो मत, चल जल्दी मास्साब देख लेंगे…|” 

अंकिता घबराई सी स्कूल से लौटकर उसके घर आई थी | तब अम्मा ने पूछा “लली कैसैं लगी जाके |” अंकिता जाने क्या कह देगी सोचकर वह ख़ुद ही बोल पड़ा “बताय तौ दई, बन्दर की बजह ते भागो, सो गिर गओ, नाय री अंकिता |” अंकिता ने बिना कुछ बोले ही सिर हिला दिया | अम्मा अंदर गई तो दोनों खूब जोर से हँसे | कम्पनी जी० एम्० चिल्लाया है “इशरत ! इसमें हंसने जैसी क्या बात है..॰॰?” 

“जी… नो…न॰॰॰ सौरी सर….|”       

आखिर कई दिन के इंतज़ार के बाद, सुबह उसे फेसबुक पर नोटिफिकेशन मिला है | वह उस दिन मारे ख़ुशी के जैसे पागल ही हो गया | मानो ख़ुद के लिए चाय-नाश्ते की ज़रूरत ही ख़त्म हो गई | ऑफिस पहुँचने पर उसने ख़ुद को कुछ कमज़ोर सा महसूस किया, तब उसे याद आया कि आज कुछ भी खाया-पीया नहीं है | लेकिन इस बीच वह अंकिता को फेसबुक मैसेंजर पर कई हेलो, हाय, गुडमोर्निंग, व्यस्त हो आदि मैसेज भेजता रहा | कई मैसेजों के बाद एक मैसेज अंकिता का आया॰॰॰॰॰ 

(अंकिता) “मोर्निंग”  

(इशरत) “कैसी हो ?” 

(अंकिता) “बढ़िया”

(इशरत) “पहचाना क्या मुझे”

(अंकिता) “नहीं !”

(इशरत) “आगरा कैंट पर तुम मेरे साथ ब्रेंच पर बैठी थीं और मुझे गाड़ी का समय पूछा था |”

(अंकिता) “कन्फ्यूजन वाली इमोज़ी”

(इशरत) “कोई बात नहीं, मैंने तो पहचान ही लिया है तुमको”

(अंकिता) “मतलब” 

(इशरत) “मैंने उस दिन के बाद, तुम्हारे लगभग सभी स्टेटस पढ़े हैं । तुम बहुत अच्छा सोचती हो | मैं बहुत प्रभावित हूँ |”

(अंकिता) “मैं कोई लेखक या कलाकार तो हूँ नहीं कि कोई मुझसे इतना प्रभावित हो जाय |”

(इशरत) “तुम बहुत खूबसूरत हो”

(अंकिता) “शुक्रिया ! वैसे मुझे इसकी जानकारी है | माफ़ करें, मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि आप, आखिर चाहते क्या हैं ? बेहतर है कि आप मतलब की सीधी-सीधी बात करें |”

(इशरत) “मैं तुम्हारे और तुम्हारे गाँव के विषय में जानना चाहता हूँ |”

(अंकिता) “मुझमें और मेरे गाँव के प्रति, इस इंटरेस्ट की कोई वज़ह ?”

(इशरत) “वज़ह है न, तुम खुद |”

(अंकिता) “मैं काम कर रही हूँ, इन बातों के लिए वक़्त नहीं है मेरे पास |” 

दो दिन बाद॰॰॰॰॰  

(इशरत) “गुड ईवनिंग अंकिता….|”

कोई जवाब नहीं ।

(इशरत) “हीरालाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कैसा है ? पैंठ में अब भी श्यामा चाट वाले की ही ठेल लगती है क्या ?”

(अंकिता) “माफ़ करें ! आप कौन हैं ? मैं पहचान नहीं पा रही हूँ |”

(इशरत) “बाबूजी की पोखर आज भी है या वह भी विकास की भेंट चढ़ गई ?”

(अंकिता) “देखो मैं सब बता दूंगी लेकिन यूँ मेरी जिज्ञासा बढ़ाने से क्या फ़ायदा । पहले अपने बारे में तो बताओ । मैं सही से पहचान नहीं पा रही हूँ । आपके फ़ोटो और प्रोफ़ाइल से ।” 

(इशरत) “क्या सच में तुम मेरा नाम तक भूल गई हो॰॰॰॰?”

(अंकिता) “आपके नाम ने ही तो मेरे भीतर हलचल मचा रखी है । लेकिन कैसे मान लूँ की तुम वही इशरत हो ॰॰॰?” 

अंकिता का यह मैसेज पढ़कर उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा मानो किसी भी पल बाहर आ गिरेगा । उसने जल्दी-जल्दी बहुत कुछ लिख देने के लिए फ़ोन पर अंगुली चलाईं, लेकिन उसके भीतर का स्पंदन जैसे उसके हाथों में उतर आया हो । उसके हाथ जुंबिश करने लगे । उसे लगा वह अब लिख नहीं पाएगा । नम्बर हो तो फ़ोन करके, उसे सब कुछ बता दे । उसने लिखा “अपना न0 दो, तो मैं फ़ोन पर बताऊँ ।” अचानक दिमाग़ में कुछ उमड़ा और लिखा हुआ मिटा दिया और॰॰॰॰॰ 

(इशरत) “तुम्हारे पति क्या करते हैं  ?” 

(अंकिता) “वैसे तो मेरा पति अभी कोई है नहीं, लेकिन तुम्हें भी औरों की तरह, मैं सिंगल हूँ या मैरिड, यह जानने में ज़्यादा रुचि है । वैसे तो मेरी प्रोफ़ाइल पर भी मेरा स्टेट्स लिखा हुआ है ।”

(इशरत) “बुरा मत मानिए मेरा आशय यह नहीं था जैसा आप समझ रहीं हैं॰॰॰।” 

(अंकिता) “मैं एक दम ठीक समझ रही हूँ । बाय॰॰॰॰।” 

बाद में इशरत ने माफ़ी के शब्द भी लिखे । मिन्नतें भी लिखीं । फ़ोन नम्बर लेने को निवेदन भी किया लेकिन अंकिता का कोई जबाव नहीं आया । 

मुश्किल से तीन दिन गुज़रे इशरत के । एक दिन अंकिता को विश्वास दिलाने के लिए उसने एक मैसेज, जिसे ऑफ़िस में ही टाइप कर लिया था । अंकिता को सेंड करने से पहले ‘फिर कुछ ग़लत न हो’ सोचकर एक बार पढ़ा । 

“अंकिता तुम्हें याद है पाँचवीं में हमारा बोर्ड का इम्तिहान था । हमारा सेंटर हरदोई पड़ा था । बस तब आलमपुर तक ही चलती थी । वहाँ से आठ किलोमीटर पैदल का रास्ता । आज लिखते हुए लग रहा है इतनी दूर॰॰॰॰ यहाँ आज पाँच सौ मीटर के लिए भी ऑटो ले लेते हैं । 

आलमपुर पहुँचते-पहुँचते लगभग शाम हो चली थी, ब-मुश्किल आधा घंटा दिन ही बचा था । कच्चा रास्ता था तब । अब सुना है पक्की सड़क पर बसें चलतीं हैं । हमारे छपा-छप पदचापों से उड़ता हुआ धूल का ग़ुबार भी हमारे साथ चल रहा था । साथ आए बच्चे, उनके साथ मास्साब, आगे निकल गए थे । मेरे पास अम्मा के ब्याह वाला संदूक था । वह अम्मा के बनाए चावल और सूजी के लड्डू, मेरी किताबों और कपड़ों से इतना भारी हो गया था जिसे मैं कुछ क़दम ही उठाकर चल पाता था । तुम्हारे पास बस एक झोला था जो बहुत भारी नहीं था । तुम उसे उठाए, और बच्चों के साथ आगे जा सकतीं थीं लेकिन तुम मेरे साथ ही चल रहीं थीं । 

थका हुआ सूरज भी हमारा साथ छोड़कर दूर पेड़ों के पीछे कहीं छुप गया था । मौक़ा पाते ही झुट-पुटा अँधेरा हमारे रास्ते पर उतरने लगा था । आगे चलता बच्चों का रेला भी हमें दिखाई नहीं दे रहा था । शायद किसी अनचाहे डर से मैं रोने लगा था । मेरा दर्द या मेरे भीतर का डर, तुम्हारी आँखों में भी छलकने लगा था । अपना झोला तुमने मुझे दिया था और मेरा संदूक ख़ुद उठाया था । आसानी से उसे उठाकर चल तो तुम भी नहीं पा रहीं थीं । हम झोला, संदूक बदलते हुए हरदोई पहुँचे तब तक ख़ूब अँधेरा हो गया था॰॰॰॰॰॰॰ ।”

हरदोई पहुँचते ही हमें भूख लगी थी । उस दिन वहाँ पैंठ थी जो उठ चुकी थी । दूर एक कोने पर मोमबत्ती की लौ की तरह कुछ टिमटिमा रहा था । वहाँ चाट का ठेला था । अंत में उसके पास जो बचा था, वही खा लेना, जैसे हमारी बिना रोक-टोक के बाज़ार में ख़र्च करने के ऐहसास की तुष्टि थी । उसने दो आलू की टिक्की बनाई थीं और बट के हरे पत्ते पर रख कर दी थीं । चौकोर काटे हुए पत्ते के टुकड़े को ही चम्मच की तरह इस्तेमाल करना था । न जाने क्या हुआ कि पत्ते से उछटकर मिर्ची मेरी आँख में पड़ गई । मैं बिलबिलाकर रो पड़ा था । तब तुम उस घोर अंधेरे में कहीं पानी खोजने दौड़ पड़ीं थीं । बिना यह जाने, समझे कि नल, पैंठ में कहाँ और किधर है । 

पत्ते के बने हुए दौने में शायद एक चूल्लु के बराबर ही पानी आ पाया था । उसी से तुमने मेरी आँखें धोई थीं, अपने छोटे हाथों से । मुझे ऐसे दुलारा था जैसे अम्माँ ऐसे वक़्त में मुझे दुलारती थी । मेरे साथ तुम भी कुछ नहीं खा पाईं थीं । याद है तुम्हें॰॰॰॰॰।”

इसे पढ़ते हुए उसे लगा यह बहुत लम्बा मैसेज हो जाएगा । यह सब तो मिलने पर या फ़ोन पर ही ठीक लगेगा । यही सोचकर उसने “अंकिता तुम्हें पाँचवीं के बोर्ड का इम्तिहान याद है जिसके लिए हम हरदोई गए थे ।” लिखकर अंकिता को भेजा । 

उसने जैसे एक बड़ा तथ्य अंकिता को सेंड कर दिया हो । वह देर रात तक जागता रहा । घड़ी की तारीख़ बदल चुकी है । इशरत सो नहीं पा रहा है । उसे इंतज़ार है अंकिता कि ओर से आने वाले जवाब का । वह निर्निमेश फ़ोन की स्क्रीन को ताकते हुए ‘हो सकता है सो गई हो ।’ से तसल्ली पाकर ही सो पाया । 

सुबह जल्दी हुई उसकी । सबसे पहले फ़ोन देखा । कोई जबाव न पाकर कुछ मायूस हुआ । कुछ देर इंतज़ार का वक़्त काटने को, नीचे से अख़बार उठा लाया । ‘फिर गर्माया राम मंदिर मुद्दा’ “कौन रोकता है ? बना क्यों नहीं लेते ।” अख़बार की हैडलाइन पढ़ते ही वह बुदबुदाया । और  सोचकर ऑफ़िस जाने को तैयारी में लग गया । किंतु उसके कान फ़ोन के नौटीफ़िकेशन पर लगे रहे । ऑफ़िस को निकलते वक़्त उसके फ़ोन ने उसे संकेत दिया । वह देखते ही उछाल पड़ा । 

(अंकिता) “ओह नो॰॰ आइ काँट विलीव ईट॰॰॰॰॰! तुम सच में वही इसरत हो॰॰॰ ‘इशरत’॰॰॰? यार यक़ीन नहीं हो रहा । क्या सच में ऐसा होता है ।” 

(इशरत) “ऐसा होता है॰॰॰॰????”

(अंकिता) “छटी क्लास के बाद तुम तो न जाने कहाँ चले गए थे मेरा साथ छोड़कर॰॰॰॰ ।” 

(इशरत) “फिर॰॰॰॰।” चलते हुए वह इतना ही लिख पाया लेकिन उसकी हृदय गति बहुत तेज़ होने लगीं ।

(अंकिता) “आठवीं तक उन दो सालों मैंने तुम्हें बहुत मिस किया । फिर दिल्ली आ गई । बड़े चाचा के पास । गाँव का माहौल दिनों-दिन बिगड़ने लगा था । यहाँ मेरे बहुत से दोस्त हैं । लेकिन जब भी गाँव जाती या वहाँ की कोई बात चलती तो मुझे तुम्हारी याद भी हो आती । तब मैं सोचती, हिंदी फ़िल्मों की तरह अचानक तुम भी कहीं मिल जाओगे॰॰॰॰? आज तुम बिलकुल वैसे ही॰॰॰॰, मुझे अभी भी यक़ीन नहीं हो रहा है ।”

(इशरत) “यक़ीन हो गया हो तो अपना न0 दो । फ़ोन करता हूँ । मैं ऑफ़िस आ गया हूँ अब लिखना थोड़ा मुश्किल है ।”

अंकिता ने नम्बर भेज दिया । इसरत ने काम करते हुए ही फ़ोन किया । 

अंकिता- हैलो 

इशरत- ओह अंकिता ! सच कहा तुमने, विश्वास मैं भी नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं तुमसे बात कर रहा हूँ । 

अंकिता- (देर तक हँसती है) अब क्या कर रहे हो, कहाँ रहते हो ?

इशरत- मथुरा में, प्राइवेट बैंक में नौकरी कर रहा हूँ, आगरा पोस्टिंग है । तुम क्या रही हो ?

अंकिता- ह्यूमन रिसर्च पर एक एन जी ओ में काम कर रही हूँ। दिल्ली में ही हूँ ।

इशरत- तुमसे बातें करते हुए अब लगता है, वक़्त कितनी तेज़ी से गुज़र गया । न जाने कितना कुछ नया पनप कर हमारी जिंदगियों में शामिल हो गया है । 

अंकिता- तुम मुझे ढूँढ कर भी ख़ुश नहीं हो क्या॰॰॰?

इशरत- कितना ख़ुश हूँ मैं बता नहीं सकता अंकिता । यक़ीन मानो तुमसे बातें करते हुए लग रहा है जैसे हम आज उसी समय में खड़े हैं । यार यही एहसास तो मेरी ज़िंदगी की ताक़त रहा ॰॰॰॰॰ लेकिन॰॰॰॰ अब॰॰॰॰ !

अंकिता- फिर यह लेकिन॰॰॰॰॰॰?

इशरत- यार ! हमारे बोलने, हमारी इच्छाओं यहाँ तक कि हमारे खाने-पहनने पर भी पहरे लगे हैं॰॰॰॰॰ अब ऐसे में॰॰॰॰?

अंकिता- क्या इशरत तुम भी॰॰॰॰॰! अरे इंसानी ज़रूरतों और मन की इच्छाओं के ख़िलाफ़, किसी शोर-गुल से कुछ रुका है कभी, जो अब रुक जाएगा ? ख़ैर॰॰॰छोड़ो यह बेकार बातें । पहले तो हम ‘तुम’ से ‘तू’ के बीच की वर्षों लम्बी औपचारिकता को ख़त्म करने को मिलते हैं ।

इशरत- कल॰॰॰॰? बोलो न॰॰॰?

अंकिता- कल मुझे एक हफ़्ते को जयपुर जाना है । लौटते ही मिलते हैं । तब तक फ़ोन पर॰॰॰

4- 

मैने तय कर लिया है कि कल, मैं उससे वे सब बातें बोल दूंगा जो मैं अब तक उससे चैट करते हुए या फ़ोन पर कह नहीं पाया हूँ । रातों में सोने से पहले सोचता ही रहा हूं कि घुमा-फिरा कर कल लिख ही दूंगा कि ‘जब-जब मुझे नींद नहीं आई, तब-तब मैं तुम्हारे बारे में ही तो सोचता रहा  हूं । जब मैं तुम्हें सोचता हूँ, तब तुम भी किसी फ़िल्मी हीरोइन की तरह न जाने कहां से मुझे थपकी देकर सुलाने आ जाती हो । कभी सिर में दर्द हो तो, कोई गोली काम नहीं करती तब  तुम्हारा आभासी स्पर्श ही मेरी दवा बन जाता है । प्राइवेट नौकरी, मतलब मालिक की जी हुजूरी अपनी जिंदगी का कोई मोल-तोल नहीं….. कभी-कभी सोचता हूँ तो टेंशन हो जाता है | यार, तब मैं पूरी रात भर नहीं सो पाता | भागमभाग और एक दूसरे के लिए पराई इस शहरी जीवन शैली में तुम्हारे ख़याल ने मुझे हिम्मत नहीं हारने दी। 

यही सब सोचते हुए इशरत की आंखों में दूर-दूर तक नींद नहीं है। और शायद नींद ही नहीं आज तो वह अपने कमरे में, अपने बैड पर पड़े रह कर भी वहां नहीं है । उसकी आंखें खुली हैं और छत में लटकते मंथर गति से घूमते पंखे पर टिकी हैं । उसे वह घूमता पंखा, पंखा नहीं खुशी से नाचता खुद का मन दिख रहा है । इशरत का मन तो सच में ही नाचने को हो रहा है । लेकिन दूसरी मंजिल पर किराये के इस कमरे की बंदिशों ने उसे रोक रखा है । उसे इतना भान है कि नीचे कमरे में मकान मालिक सोता है जो थोड़ी सी खट-पट की आवाज पर भी सुबह पूछता है कि रात को क्या कर रहे थे । बस इसी डर से, वह नहीं कूद रहा । आज रात वह अकेला रह कर भी जैसे अकेला नहीं है । वह आज अंकिता के विषय में सोच ही नहीं रहा, बल्कि बातें कर रहा है  खुद से, उससे ‐‐‐‐‐। 

लेकिन‐‐‐‐‐ अचानक इतने वर्षों बाद, इन कुछ दिनों की फ़ेसबुक या फ़ोन पर हुई बात-चीतों के बाद ही, उससे यह सब कहना क्या ठीक होगा‐‐‐‐‐? उसे कैसा लगेगा‐‐‐‐‐? वह बुरा भी तो मान सकती है ‐‐‐‐‐? नहीं‐‐‐‐‐ उसे बुरा नहीं लगेगा बल्कि खुश ही होगी यह सब बातें सुनकर । यह मैं दावे से कह सकता हूं । लेकिन यह दावा कैसे किया जा सकता है ? पन्द्रह साल‐‐‐‐‐ पन्द्रह साल कोई छोटा वक्त नहीं होता । कितना कुछ बदल गया । वह सब बचपन की बातें थीं । मैं ही तो ख्याल बुनता रहा हूं, क्या जरूरी है कि मैं भी उसकी यादों में रहा होऊं ‐‐‐‐? इंटरनेट, फेसबुक, व्हाटसऐप न जाने क्या-क्या पैदा हो गया आज । न जाने कितने और कैसे-कैसे दोस्त बन गये हैं । तब दस- बारह साल उम्र की वे तमाम शरारतें,  बातें,  खेल-कूद क्या सब को याद रहे हैं जो उसे रहे होंगे‐‐‐‐? मगर‐‐‐‐‐ मुझे तो याद हैं । मैने उन्हें जिंदा रखा है । अपनी उम्र के साथ उन्हें भी प्रौढ़ किया है‐‐‐‐‐ क्या यह सब किया होगा उसने ‐‐‐‐? 

यही सब सोचकर उसने एक लम्बी सांस भर कर छोड़ी जैसे वह किसी मचान से नीचे आया हो। उसने घड़ी देखी रात के बारह बजे हैं । उसने खुद को एक झटका देकर लम्बी सी अंगड़ाई ली, सोचा ‘जो होगा कल ही देखेंगे अब सोता हूं ।’ इशरत ने लाइट बंद की और सोने के लिए आंखें बंद कर लीं । पंखे की आवाज के साथ घड़ी की टिक-टिक का सम्वेत स्वर उसे कोई तेज संगीत सा सुनाई देने लगा। उसने थोड़ी देर में ही कई करवट बदलीं । वह ऐसे बेचैन होने लगा मानो वह इतनी तेज आवाजों के बीच है जहां वह सो नहीं सकता । उसने लाइट जलाई और उठकर बैठ गया। सिगरेट होठों में दबाकर उसे सुलगाते हुए, वह बैड पर ऊपर खिसक कर, तकिया के सहारे टिक कर बैठ गया। क्या सचमुच वह एक दूसरे के लिए प्रेम ही था या कुछ और…..? जिसे उसने प्रेम समझकर अब तक सहेज रखा है । इशरत ने सिगरेट का एक लंबा कस खींचा । जब बैठा नहीं गया तो वह नीचे खिसक कर लेट गया। रात के उस पहर, जब इंसान के भीतर छटपटाता दर्द भी झपकी ले जाता है, इशरत की भी आँख लग ही गई ।

५- 

इसरत ने आज ऑफ़िस से छुट्टी ले रखी है । वह तैयार हो रहा है । वह जानता है कि जूतों में पैर नहीं दिखेंगे फिर भी उसने आज सुबह देर तक अपने पैरों की एड़ियों को घिस-घिस कर चमकाया है । उसके पापा जब किसी ख़ास काम से जाया करते थे तब ऐसे ही किया करते थे । तब अम्मा बिना उनके बताए ही समझ जातीं थीं कि वे शगुन बना रहे हैं । इस हफ़्ते में ख़रीदी ख़ास ड्रेस पहन कर, वह शीशे के सामने बार-बार घूम कर देख रहा है । उसने अंकिता की पसंद का स्प्रे भी डाला है । नीचे तेज़ आवाज़ में टी वी पर समाचार चल रहे हैं । यह तेज़ आवाज़ उसके मन के विचार प्रवाह को बाधित कर रही है । न चाहते हुए भी समाचार सुनना उसे ख़ुद की मजबूरी लग रहा है । एक बारगी तो उसे ग़ुस्सा भी आया और वह मन ही मन बुदबुदाया ‘ये सुबह सुबह किसे नेतागीरी चढ़ी है ?’

 वह, आज अपना मूड ऑफ़ नहीं करना चाहता इसलिए बिना मर्ज़ी के समाचार सुनते हुए ही तैयारी में लगा है । अचानक उसने रुक कर, कुछ सचेत होकर, नीचे से आती आवाज़ पर कान लगाए । ध्यान देने पर आवाज़ उसे और तेज़ सुनाई देने लगी है ‘लव जेहाद के नाम पर हुई एक और मुस्लिम की हत्या॰॰॰॰॰॰॰॰।’ 

सुनकर उसे कुछ अजीब सा होने लगा है।उसका दिमाग़ चकरा सा रहा है।उसका शरीर शिथिल हो रहा है।वह धम्म से बैड पर बैठ गया है।नीचे एंकर घटना को विस्तार से बता  रहा है।इशरत के कानों में अंकिता के शब्द गूँज रहे हैं ‘इंसानी ज़रूरतों और मन की इच्छाओं के ख़िलाफ़, किसी शोर-गुल से कुछ रुका है कभी, जो अब रुक जाएगा।’ वह थोड़ी देर यूँ ही बैठा रहा, घड़ी पर नज़र डाली ‘अंकिता पहुँच रही होगी।’ मन ही मन कहा और उठ खड़ा हुआ।

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