सामाजिक ताने-बाने में सहज घटित अच्छी-बुरी घटनाएँ,  महज़ साधारण सूचनाएँ नहीं होती बल्कि एक लेखकीय संवेदना के ज्वार से गुज़रती हुई कहानियाँ होतीं हैं जो कलेवर में छोटी रहकर भी बहुत बड़ा कहने का प्रयास करतीं हैं। अपनी मौलिक शैली में ख़ुद से व समाज से बतियातीं “सबाहत आफ़रीन” की तीन कहानियाँ ॰॰॰॰॰॰

शरारती लड़की 

सबाहत आफ़रीन

गावँ के पुराने जमींदार घर के नई पौध के लड़के असग़र दर्ज़ी के यहां उठने बैठने लगे थे।असग़र इस इज़्ज़त अफ़ज़ाई से दिल ही दिल मे ममनून रहा करता था कि एक ज़माने मे बड़े दरवाज़े के लोग उससे सीधे मुंह बात नही करते थे ।

आज का ज़माना अच्छा है , नई नस्ल यह सब नही मानती ,असग़र को चचा कह कर पुकारा जाने लगा है , ग़रीब होना कोई जुर्म नही रह गया आजकल ।

“चचा मटके का पानी पिलवाओ यार , हलक़ सूख गया गर्मी में ।”लड़को में से किसी ने आवाज़ लगाई ।

 “वाह बाबू। आप लोग फ्रिज का पानी छोड़कर मेरे मटके का पानी पीने आते हो , अल्लाह आप लोगो के दिलो में रहम बनाये रख्खे । सजीला , ठंडा पानी ले आ ,  बड़े दरवाज़े से लोग आए हैं ।”

लड़कों ने एक दूसरे को नज़रो में इशारे किये , फिऱ असग़र की निहायत खूबसूरत बेटी की आमद का इंतज़ार करने लगे ।

सजीला की ख़ूबसूरती पूरे गाँव मे मशहूर हो चुकी थी और इस वजह से असग़र दर्ज़ी सख़्त परेशान रहा करता था । आहिस्ता आहिस्ता यह भेद खुल ही गया कि बड़े दरवाज़े के लड़के किस ग़रज़ से उठते बैठते हैं असग़र की दुकान पर ।

ख़ैर ऐसी कोई अनहोनी नही होने पाई न ही सजीला का किसी के साथ रूमानी सिलसिला जुड़ा ।

असग़र ने कमउम्र शोख़ ,बेहद हसीन बेटी की शादी मुम्बई में काम धंधा करने वाले इरशाद से तय कर दी ।

अपने तयशुदा वक़्त पर शादी हो गई गावँ के नौजवान लड़के बुझ कर रह गए , बड़े दरवाज़े के लड़के फिर से अपनी हैसियत के लोगो मे उठने बैठने लगे । सब कुछ मामूल पर आ गया ।

मुम्बई में सजीला इरशाद के साथ खोली में रहने लगी , आस पास और भी बहुत सी फैमिलीज़ थीं जो एक कमरे के घर मे रह रहे थे । सजीला को मुम्बई काफ़ी पसन्द आया ,उसने पाया कि आसमान तो बेहद वसी है बहुत बड़ा । दुनिया काफ़ी हसीन है , मज़ेदार है ,रंग बिरंगी है ।

इरशाद उसकी खूबसूरती से खाइफ़ रहा करता था ,उसने अपने पड़ोस में रहने वाली उम्रदराज़ ख़ातून से सजीला की देखभाल करने को  कहा और ज़रूरत केघरेलू सामान लाने की जिम्मेदारी भी   पड़ोसियों को सौंप दी ।

ख़ैर , परिंदों को कैद में रहना कब पसन्द आया है ,मछलियां रेत में कब रहना चाहती हैं ?

सजीला को बाजार देखने और गोलगप्पे खाने का शौक़ था , इरशाद के काम पर जाने के बाद , घर के सारे काम निमटा कर  , बुरका डाल कर सजीला चल देती थी गोलगप्पे खाने ।

इस ज़बान ने क्या क्या न सितम ढाये हैं लोगो पर । गरीब सजीला कितने दिन बचती ? किसी दिलजले ने ख़बर कर दी इरशाद को ।

एक दिन इरशाद काम पर जाने का बहाना करके , बाज़ार में छुप कर बैठ गया । हस्बे आदत घरेलू कामो से फ़ारिग़ होकर सजीला बाज़ार पहुंची , गोलगप्पे बनवाये और चेहरे से पर्दा हटा कर ,धड़ल्ले से सी सी करके गोलगप्पा खाने लगीं। ऐन उसी लम्हे

इरशाद उसके सामने आ खड़ा हुआ , उसके बुर्के को नोच कर वहीं फेंक दिया , घसीटते हुए  ,भरे बाज़ार मुहल्ले में गालियों से नवाज़ते उसको घर लाया ।

मुम्बई में रहने वाले सजीला के क़रीबी रिश्तेदारो को बुलाया , और  मना करने के बावजूद ,चोरी छुपे चेहरा खोल कर गोलगप्पा खाने के जुर्म में उसे तलाक़ दे दी ।

लाख  मिन्नते की गईं माफ़ी माँगी गयी , मगर तलाक़ हो ही गया ,असग़र को बुला कर उसकी बेटी उसके हवाले कर दिया गया ।सजीला को एहसास हुआ उसका आसमान तो निहायत छोटा था ,  भरम था जो टूट गया । रोती बिलखती वापस गावँ आ गई , जहां रात दिन के तानो से उलझ कर ,अपनी सगी माँ के ख़राब रवैये से घबरा कर  उसने सल्फास खाकर अपनी जान दे दी ।

सच कहती हूँ जब से ये वाक़या सुना है तब से अक्सर ही एक ख़याल बार बार मन में आता है कि काश मैं सज़ीदा से पूछूं कि तुमने जान क्यों दे दी अरे॰॰॰ तुम्हें तो पूछना चाहिए था इरशाद से कि  किसने हक़ दिया तुम्हे मुझे यूँ बेज़्ज़त करने का ? बिना चेहरा खोले मैं कैसे खा सकती थी ? और तुम, तुमने राह चलते हुए कब-कब ग़ैर औरतो पे अपनी निगाह नही पड़ने दी ? कब तुमने अपनी नज़रो की हिफाज़त की ? तुम ज़िंदा होतीं तो चीख़तीं इस दुनियाँ के सामने कि 

कौन होते हो तुम यूँ किसी मासूम को बेइज़्ज़त कर उसकी जान लेने वाले ?

तेज़ औरतें 

बौदा का असल नाम क्या है यह जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी , मुझे भी न होती अगर दोपहर में बाक़ी घर की औरतों की तरह गहरी नींद आती तो इतनी ज़रा सी बात मेरे  ज़ेहन में न घूमती ।

 बौदा की औरत का पूरे गावँ में जलवा है , और जैसा कि  आमतौर पे होता है एक ख़ूबसूरत तेज़ तर्रार ,मर्दो को इशारों पे घुमाने वाली औरत से बाक़ी की औरतें दिल ही दिल में खूब जलती हैं । तो ज़ाहिर है बौदा बहू से भी ख़ुदा वास्ते का बैर पाले बैठी थीं ज़्यादातर औरतें ।

मुझे हमेशा उन बातों में दिलचस्पी होती थी जिन्हें घर वाले ममनून क़रार देते थे जिन पर पर्दे लगाए जाते थे , इसलिए पहली फ़ुर्सत में बौदा बहु से मेरी दोस्ती हो गयी ।

काजल की तीखी धार सजाये , भरे होंठ पान की लाली से सुर्ख़ किये ,गोल ठोड़ी पे नन्हा तिल । अल्लाह जाने तिल पैदायशी था या उस छैल छबीली ने बनवा रख्खा था । पहली नज़र में दिलकश लगी थी । ज़ात की  नाइन है इसलिए शादी ब्याह काम काज के सिलसिले में लोगो को उसका सहारा लेना ही पड़ता है । औरतों के लिए तीख़ी मिर्च ,मर्दों की नज़र में फ़ुर्सत से सधे हाथों से बनाया बनारसी पान है नाउन ।

दिल से दिल की राह होती है बौदा बहु को एहसास हो गया कि मेरे दिल मे उसके लिए कोई रार नही , सो मेरे सामने उसकी जिंदगी की कई गिरहें खुलीं जो उसने अपने दिल से छुपा कर बांध रखी थी ।

बौदा की दिमाग़ी हालत कमज़ोर थी , धोखे से उसकी शादी नाउन से कर दी गयी ।

नाउन का नाम रेहाना है , उसने पहली  मुलाक़ात में जान लिया था कि बौदा बुध्धु है घामड़ है । काम कोई करता नही था , पैसे कमाने का कोई ज़रिया न था । रेहाना ने अपना ख़ानदानी पेशा अपना लिया , शादी ब्याह में लड़की को उबटन लगाना , शादी के बर्तन साफ करना , गावँ में कार्ड देना ,और भी बहुत से अल्लम गल्लम काम ।

ख़ुशशकल थी मेहनती हंसमुख थी इसलिए मर्दो की नज़र में तर माल थी , ये अलग बात है कि रेहाना होशियारी से अपना काम निकाल कर ऐसा बच निकलती कि सब हाथ मलते रह जाते । गावँ के ही रसूख़ वाले चौधरी से उसे मुहब्बत हो गयी थी , बक़ौल रेहाना ,” चौधरी ने पहली नज़र उस पे डाली तो रेहाना एकटुक उन्हें देखती रह गयी , और घर आकर सारी रात जाग जाग कर ख़्वाब देखती रही ।””

बाक़ी के मर्द हज़रात कहते थे चौधरी में ऐसा क्या जड़ा है जो हममे नही है ? रेहाना  हंस कर भद्दी सी गाली देकर भाग खड़ी होती ।

ख़ैर हैरानी मुझे  तब हुई जब उसने ख़ुशदिली से मुस्कुराकर  बताया कि उसे बौदा से भी मुहब्बत है । 

इंसानी दिमाग़ रेशम के गुच्छे से ज़्यादा उलझा हुआ नाज़ुक है । वाक़ई कब क्या सोचे क्या समझे क्या कर बैठे कुछ खबर नही ।

आगे की ज़िंदगी 

सारा ने ख़्वाब में भी नही सोचा था कि तैयबा फूफी के यहाँ आयेशा से मुलाक़ात हो जाएगी । ख़ानदान भर की लड़कियों औरतों से रस्मन दुआ सलाम ,अलैक सलैक ही थी ,किसी से गहरा ताल्लुक़ न था कि साथ बैठकर ख़ुशनुमा वक़्त गुज़ारा जाए ।

कुछ वक़्त पहले आयेशा किसी न किसी तक़रीब में दिखाई दे जाती थी , मगर जबसे उसकी शादी टूटी तब से उसने लोगो से मिलना जुलना ही बंद कर दिया , रिश्तेदारों के बेहूदा सवाल ,लोगो की जांचती परखती , तंजिया नज़रें उसे सख़्त ज़हर लगा करतीं । मज़े की बात ये थी कि जो औरतें उसकी शादी टूटने का अफसोस कर रही होतीं थीं दरअसल वो सब अपनी असल ज़िन्दगी में शादी ,घर बच्चे और शौहर को झेल रही थीं। 

सब ऐसी कश्ती में सवार थीं ,जिसका किनारा कोई नही ,हां डूबना तय था और वो डूबने के इंतज़ार में जिये जा रही थीं। 

उनसे हज़म नही हो रहा था कि आयेशा ने ऐसा मज़बूत क़दम उठा कर वो कश्ती क्योंकर पार कर ली ।

ख़ैर, रिश्तेदारो का होना भी ज़रूरी है वरना इंसान सिर्फ़ खुश ख़ुश रहे तो ये भी अच्छा नही है न । 

आयेशा ने दूसरी शादी कर ली है ,इस मर्तबा अपनी पसंद के लड़के से । इस ख़बर से मुझे इतनी ख़ुशी हुई थी कि मैं ख़ुद को रोक नही पायी आयेशा को मुबारकबाद देने से । 

आयेशा को कोई ग़म नही ,सिर्फ अपने 5 साल के बेटे का मलाल है जो उसके पहले शौहर के पास है । मैंने उसे समझाया ,” तुम ग़म क्यों कर रही हो  , बच्चा अपने दादा दादी अब्बू के पास है उनकी निगहदाश्त में है । रन्ज किसलिए ? 

अब तो खुशियाँ बिखर रही हैं उन्हें लपक लो ,झोली में भर लो ,कि तुमने अपने दिल को बड़ी अज़ीयत दी है ।”

“नही सारा , वैसे तो अमन निहायत नेक और मुहब्बत लुटाने वाला बन्दा है ,उसके साथ रहकर अपनी पिछली ज़िन्दगी के तमाम दुख मुझे याद भी नही आते ,मगर अपने बेटे की याद आती है मुझे । मैं सेल्फिश मा साबित हुई ,जिसने सिर्फ अपनी ख़ुशी देखी , ।

तुम्हे पता है सारा , हमारी पूरी जेनरेशन ही सेल्फिश है ,हमसे पहले के लोग फैमिली के लिए क्या क्या कुर्बानियां देते थे,एक हम हैं मतलबपरस्त जेनरेशन ।””

देखो आयेशा ,मेरी नज़र में तुम बहादुर और बोल्ड हो , जिसने अपने रास्ते को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक हमवार किया , अपने दिल अपने वजूद को रोशनी अता की , अपनी रूह को ज़िंदा रखा । अपनी खुशियों की परवाह करना  , मतलबपरस्त होना नही है ।

हमसे पहले के लोग अपनी रूह का क़त्ल करते थे ,अपनी मर्ज़ी को बक्से में बंद किये रहते थे , दूसरों की मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी बसर करते थे , वो कुर्बानी नही  , मेरी नज़र में कमअक़्ली है ।

 और ,कल तुम्हारा बेटा बड़ा होगा ,तुमसे मिलेगा ,उसे सारी बातों का इल्म होगा ,वो समझेगा ज़रूर क्योंकि वो जिन लोगो के साथ रह रहा है उसे एहसास होगा कि उसकी मां के लिए मुश्किल रहा होगा एडजस्ट करना ।फ़िक्र मत करो , तुमने दुनिया के लिए घर वालो के लिए 8 साल जीकर क्या हासिल कर लिया ? अब आगे की ज़िंदगी तुम मुहब्बत के लिए अमन के लिए जियो  , बग़ैर माज़ी की बोसीदा बातों को याद किये ।”

आयेशा मुस्कुरा रही है ,”” मुझे पता है ख़ानदान रिश्तेदार मुझे कितना भी ग़लत समझें ,तुम हमेशा मुझे सपोर्ट करोगी। अमन से बताया है मैंने तुम्हारे बारे में , किसी रोज़ मिलवाऊंगी ज़रूर ।””

या अल्लाह !क्या क्या बता दिया , वैसे भी किसी अच्छी बात की उम्मीद तुमसे नही रहती मुझे । “

 “तौबा है  सारा !सिर्फ अच्छी वाली बातें बताई हैं और बाक़ी के हमारे सीक्रेट वाले कारनामे अमन से भी सीक्रेट ही रखे हुए हैं । “

 ज़ोर की हंसी आयेशा के होंटो से फूटी सारा भी शरारतन सारी बातें याद करके हंस दी।

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    By: सबाहत आफ़रीन

    शिक्षा – गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा sociology MA , B.ED
    House wife
    रुचियाँ – कविताएं लिखना , कहानियां लिखना , किताबें पढ़ना , म्यूज़िक सुनना ,ग़ज़लें सुनना , पेंटिंग करना ।

    सिध्दार्थ नगर , उत्तर प्रदेश

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    ‘सबाहत आफ़रीन’ की कविताएँ ॰॰॰॰॰

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