मैंने एक लड़की को मरते देखा: कविता (अंजली पूनिया)

हर पल, हर दम, मरती, दम तोडती आधी दुनिया की तस्वीर, रचनात्मक दृष्टि से उकेरती साहित्यिक हस्ताक्षर बनती खुद आधी दुनिया ....... सराहनीय प्रयास हमरंग पर स्वागत के साथ ...| - संपादक  मैंने एक लड़की को मरते देखा ... Read More...

विश्वविद्यालयों की ‘धंधेबाज़ी’ की नई तैयारी !

(विश्वविद्यालयी व्यवस्था पर अगर प्रस्तावित बदलाव लागू हुए तो किस किस्म की समस्याएं खड़ी होंगी...... भारतीय शिक्षा व्यवस्था और युवा पीढी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहीं हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे... Read More...

एक संक्षिप्त परिचय और कवितायें : स्मरण-शेष, वीरेन डंगवाल

इस त्रासद समय में भी 'उजले दिन जरूर आएंगे' का भरोसा दिलाने वाले साथी जन कवि 'वीरेन डंगवाल' हमारे बीच नहीं रहे | आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली ....| इस जन साहित्यिक त्रासद पूर्ण घटना से दुखी सम्पूर्ण हमरंग परिव... Read More...

डेमोक्रेसी का खुरदुरा आख्‍यान, ‘न्यूटन’ फिल्म समीक्षा

अमित वी मासुरकर और मयंक तिवारी की तारीफ बनती है कि वे बगैर किसी लाग-लपेट के जटिल राजनीतिक कहानी रचते हैं। वे उन्‍हें दुर्गम इलाके में ले जाते हैं। इस इलाके में नक्‍सली प्रभाव और सिस्‍टम के दबाव के द्वंद्व के बी... Read More...

इनाम और ओहदे लौटाने से क्या होगा ? : आलेख ( विष्णु खरे )

"आज जिस पतित अवस्था में वह है, उसके लिए स्वयं लेखक जिम्मेदार हैं, जो अकादेमी पुरस्कार और अन्य फायदों के लिए कभी चुप्पी, कभी मिलीभगत की रणनीति अख्तियार किए रहते हैं। नाम लेने से कोई लाभ नहीं, लेकिन आज जो लोग दाभ... Read More...

पुरस्कार वापसी का अर्थ : रिपोर्ट (मंडलेश डबराल)

पुरस्कार वापसी का अर्थ मंडलेश डबराल साहित्य अकादेमी ने अगर अगस्त में कन्नड़ वचन साहित्य के विद्वान् एमएम कलबुर्गी की बर्बर हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की होती तो शायद नौबत यहाँ तक नहीं आती कि देश की इतनी सा... Read More...

जन-गण-मन एवं अन्य कवितायें, स्मरण शेष (रमाशंकर यादव ‘विद्रोही)

3 जनवरी 1957 को फिरोज़पुर (सुल्तानपुर) उत्तरप्रदेश में जन्मे, रमाशंकर यादव 'विद्रोही' हमारे बीच नहीं रहे ... जैसे जे एन यू खाली हो गया है... जैसे फक्कड़ बादशाहों की दिल्ली खाली हो गयी है !! उनका बेपरवाह अंदाज़, फ... Read More...

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

हर वर्ष की भांति एक जनवरी २०१६ को कोवैलैंट ग्रुप ने अपना स्थापना दिवस अनूठे तथा रचनात्मक ढंग से उन युवा और किशोर प्रतिभाओं के साथ  मनाया |जिनकी सामाजिक, साहित्यिक और कलात्मक प्रतिभाएं किसी मंच के अभाव में मुखर ... Read More...

डर.. : कविता (अनिरुद्ध रंगकर्मी)

हमरंग हमेशा प्रतिवद्ध है उभरते नवांकुर रचनाकारों को मंच प्रदान करने के लिए | यहाँ हर उस रचनाकार का हमेशा स्वागत है जिसकी रचनाएँ आम जन मानस के सरोकारों के साथ रचनात्मकता ग्रहण करने को अग्रसर दिखाई देती हैं | हमर... Read More...

समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई…: आलेख (’सुधेंदु पटेल)

हरिशंकर परसाई केवल लेखक कभी नहीं रहे. वे लेखक के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे. उनका समूचा जीवन आन्दोलनों और यूनियनों से जुड़ा रहा. आन्दोलन छात्रों के, श्रमिकों के, शिक्षकों के, लेखकों के भी. वे लेखक के रूप में अपनी... Read More...