सत्यनारायण पटेल

एक था चिका एक थी चिकी: कहानी (सत्यनारायण पटेल)

        सत्यनारायण पटेल एक था चिका एक थी चिकी आज रूपा का काम जल्दी समेटा गया। रोज़ रात ग्यारह के आसपास बिस्तर लगाती। आज खाना-बासन से क़रीब नौ बजे ही फारिग़ हो गयी।  बिस्तर पर बैठी और रिमोट से टी... Read More...
सुसाइड नोट: हाँ यह सच है, लोग गश खा कर गिर रहे हैं….(विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: हाँ यह सच है, लोग गश खा कर गिर रहे हैं….(विनय सुल्तान)

2-3 और 14-15 मार्च को हुई बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के बाद देश-भर से किसानों की आत्महत्या की खबरें आने लगी. praxis के साथी पत्रकार विनय सुल्तान  ने तीन राज्यों की यात्रा कर खेती-किसानी के जमीनी हालात पर ... Read More...
गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये (दो ग़ज़ल: माहीमीत)

गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये (दो ग़ज़ल: माहीमीत)

महीमीत गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये परिंदो संग हर मस्तियां छोड़ आये गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये यूं तो इक घर की दहलीज छोड़ी थी हमने लगता है... Read More...
सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

फोटो -हनीफ मदार सतेन्द्र कुमार “सादिल” सतेन्द्र कुमार यूं तो भौतिकी के शोध छात्र हैं लेकिन खुशफहमी है कि वर्तमान में जहाँ युवाओं दृष्टि समाज सापेक्ष कम ही नज़र आती है ऐसे में भी सतेन्द्र की र... Read More...
सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है..’ (विनय सुल्तान)

कब्रगाह बनते खेतों से ‘विनय सुल्तान’ कि डायरी…. से ..तीसरी क़िस्त  “युद्ध का वर्णन सरल होता है. कुछ लोग युद्ध करते हैं. शेष उनका साथ देते हैं. कितना ही घमासान हो, महाकाव्य उसे शब्दों में बांध लेते हैं. पर... Read More...
मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

मेरा जूता है जापानी… (लघुकथा)

धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी धर्मेन्द्र कृष्ण तिवारी पेशे से भले ही पत्रकार हैं लेकिन उनकी सामाजिक और जनवादी सोच उन्हें बाजारवाद के दौर में प्रचलित पत्रकारिता की परिभाषा से अलग करती है | उनकी यह छोटी सी कहानी... Read More...
सहमा शहर: ग़ज़लें (सतेन्द्र कुमार सादिल)

गज़ल: सत्येन्द्र कुमार “सादिल”

सतेन्द्र कुमार “सादिल” गज़ल  कुछ भी नहीं, मैं माँ के चरागों का ख़्वाब हूँ एक दास्तां, कहानी, एक खुली किताब हूँ ख़ुशबू लुटाने की मैं, ख्वाईश लिए हुए काँटों की परवरिश में, खिलता गुलाब हूँ अब तक... Read More...
राहुल गुप्ता की दो ग़ज़लें

राहुल गुप्ता की दो ग़ज़लें

राहुल गुप्ता 1 – ग़ज़ल  कब सुबह होगी, कब निजाम बदलेगा ? इंतहा बदलेगी या अवाम बदलेगा ? भूख, मुफलिसी, ज़ुल्म और बेरोज़गारी, बता ! कैसे ये चहरे तमाम बदलेगा ? सुना है तेरे यार तेरी तरह ही नंगे है... Read More...
लकी सिंह ‘बल’ की लघुकथाएं

लकी सिंह ‘बल’ की लघुकथाएं

लकी सिंह ‘बल’ की छोटी कहानियां बड़ी बात कहती हैं जो उन्हें लघुकथा के उभरते हस्ताक्षर के रूप में एक संभावनाशील लेखक होने का परिचय देतीं हैं | इनकी कलम और धारदार रूप में चलत... Read More...
‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

एक ऐसे समय में जब चारों तरफ़ बाज़ार का शोर अपने चरम पर है, और एक से बढकर एक मंहगी और विलासी चीज़ों का प्रलोभन दे, लोगों के मन पर हमले कर रहा है ! शहर के हृदय स्थल(गांधी मैदान) पटना, में पुस्तक मेले का आयोजन ... Read More...