मुट्ठी भर धूप : कविताएं (अमृता ठाकुर)

धूसर समय की विद्रूपताओं को देखती, समझती और मूर्त रूप में मानवीय कोमलता के साथ संघर्षशील स्त्री के समूचे वजूद का एहसास कराती दो कवितायें .....| सम्पादक  मुट्ठी भर धूप  अमृता ठाकुर घुप्प अंधेरा,कभी बेहद र... Read More...

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर)

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मानवीय दुनिया के उन कृत्यों और व्यवस्थाओं से जिनकी ये सड़कें न ... Read More...

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां : अमृता ठाकुर

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में  कहीं कोई जटिलता... Read More...

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां: ‘कोई भी दिन’ ‘पंखुरी सिंहा’ :-

 पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में  कहीं कोई... Read More...
बुझव्वल: कहानी (अमृता ठाकुर)

बुझव्वल: कहानी (अमृता ठाकुर)

सामाजिक ताने-बाने और उसके बितान में उलझी स्त्री, अबूझ मान्यताओं और परम्पराओं के नाम पर मानवीय शोषण के कितने ही आयामों से गुजरती है, उस गाँठ को खोलना, सुलझाना और एक सिरा पकड़कर सही और मुकम्मल दिशा दे पाना भ... Read More...
लौट आओ वसीम !: कहानी (अमृता ठाकुर)

लौट आओ वसीम !: कहानी (अमृता ठाकुर)

प्रेम, स्पंदन के साथ बाल मनो-भावों का शिद्दत से विश्लेष्ण करती ‘अमृता ठाकुर’ की बेहद संवेदनशील कहानी ….| – संपादकीय  लौट आओ वसीम ! अमृता ठाकुर जन्म – बिहार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प... Read More...
बुझव्वल: कहानी (अमृता ठाकुर)

अपने-अपने सच: कहानी (अमृता ठाकुर)

भावनात्मक संवेदनाओं से खेलना, गिरबी रखना या किसी भी कीमत पर खरीदना किसी वस्तु या खिलौने की तरह और तब तक खेलना जब तक खुद का जी चाहे फिर चाहे किसी लेस्बियन स्त्री की दमित इच्छाएं हों या किसी कामुक पुरुष की ... Read More...