राष्ट्रगान की लय से टकराती बिदेसिया की धुन: आलेख (अनीश अंकुर)

राजनीतिक सत्ता समाज के हाशिए पर रहने वाले बहिष्कृत  तबकों केा भले ही पहचान अब मिली हो लेकिन भिखारी ठाकुर ने हमेशा अपने नाटकों के नायक इन तबकों से आने वाले चरित्रों को ही बनाया। उनके नाटकों के पात्रों केा देखने ... Read More...

रंगमंच का बदलता स्वरूप: आलेख (अनीश अंकुर)

नाटक, रंगमंच समाज में जनता की आवाज़ बनकर किसी भी प्रतिरोध के रचनात्मक हस्तक्षेप की दिशा में जरूरी और ताकतवर प्रतीक के रूप में मौजूद रहा है | न केवल आज बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी में  1857 का  प्रथम स्वाधीनता संग्रा... Read More...

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’: संस्मरण (अनीश अंकुर)

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ….या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्रामक है बल्कि सच तो यह है कि उनकी परम्परा के प्रतिबद्ध संवा... Read More...