दुनिया बदल गई: कविता (अनीश कुमार)

क्रूर भूख के अट्टाहास के बीच रोटी के लिए मानवीय संघर्षों के रास्ते इंसानी बेवशी को बयाँ करतीं 'अनीश कुमार' की दो कवितायेँ ....... दुनिया बदल गई  अनीश कुमार काली रात के अतल गहराइयों में टिमटिमाता छोटा ... Read More...

समकालीन साहित्य में मुस्लिम महिला साहित्यकार: आलेख (अनीश कुमार)

स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा । स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा । पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर... Read More...

वो हत्या जिसने सोवियत संघ को हिला दिया : समीक्षा (अनीश अंकुर)

सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि तीस के दशक समझा जा रहा था। तीनों इस राय से एकमत हैं कि स्टालिन... Read More...

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार)

सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है। भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे (1990) के दशक से होती है। इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे... Read More...

समय के साथ संवाद करतीं ‘भीष्म साहनी’ की कहानी: आलेख (अनीश कुमार)

मानवीय संवेदनाओं और मानव मूल्यों के निरतंर क्षरण होते समय में सामाजिक दृष्टि से मानवीय धरातल से जुड़े साहित्यकारों का स्मरण हो आना सहज और स्वाभाविक ही है | वस्तुतः इनकी कहानियों और उपन्यासों से गुज़रते हुए वर्तमा... Read More...