‘हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा’: व्यंग्य (आरिफा एविस)

"हिंदी दिवस" पर विशेष..... 'आरिफा एविस' की हिंदी व्यंग्य रचना..... और क्या बताऊँ  अम्मा!  कालेज पूरा किया तो नौकरी की तलाश शुरू की. नौकरी मिलती कहाँ आजकल, जॉब मिलती है .पर चाहिए वहां भी अंग्रेजी ही. एक रिशेप्श... Read More...

‘अट्टहास’ पत्रिका का नया प्रयोग: समीक्षा (आरिफा एविस)

पिछले काफी समय से नये और पुराने व्यंग्यकारों के लेखन पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें या तो सिरे से नकार दिया जा रहा है या छपास की श्रेणी में डाला दिया जाता है. अकसर हाल फ़िलहाल लिखे जा रहे व्यंग्यों को सपाट बयानी कह... Read More...

मौत के बाद भी आवाज़ ज़िंदा है, ‘गौरी लंकेश’: आलेख (आरिफा एविस)

इस तरह की हत्याओं का ये पहला मामला नहीं हैं. पहले भी आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया. दाभोलकर ,पनसारे ,कलबर्गी और गौरी लंकेश में एक ही चीज कॉमन थी वो यह कि उनकी आवाज जनता की आवाज बनी थी. शोषित, उत्पीड़ि... Read More...

कब्र का अजाब : लघु कथा (आरिफा एविस)

अब अम्मी जोया को क्या समझाती कि एक ख़ास उम्र के बाद लड़कियों में जिस्मानी बदलाव होता है जिसकी वजह से लड़कियां मस्जिद-मदरसों में नहीं जाया करतीं. औरतें तो वैसे भी नापाक होती हैं. और नापाक चीज खुदा को भी पसंद नहीं. ... Read More...

पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं : व्यंग्य (आरिफा एविस)

सरकार तो आती जाती है आज ये है कल वो थी. लेकिन देश का विकास कभी नहीं रुकता क्योंकि सरकार और कम्पनी में अच्छा गठजोड़ है. ये तो देश की सेवा या लोगों की सेवा बड़ी मुस्तैदी और ईमानदारी से कर रहे थे. 2 साल के प्रोजेक्ट... Read More...

बेवकूफी का तमाशा : व्यंग्य, आरिफा एविस

'अरे जमूरे ! आजकल के बुद्धिजीवी और लेखक भी तो लोगों का अप्रैल फूल बनाते हैं. ऐसे मुद्दों पर लिखते और ऐसे विषयों पर चर्चा करते हैं जिसका अवाम से कुछ भी लेना देना नहीं होता.लेकिन अपना स्वार्थ सिद्ध जरूर पूरा हो ज... Read More...

बेवकूफी का सौन्दर्य: समीक्षा (आरिफा एविस)

"पूरी वर्णमाला में मेरे और तेरे और 'ञ' के अलावा और कोई स्त्रीलिंग नहीं है. .... क्या पता खूब सारे स्त्रीलिंग शब्द रहे हों लेकिन उनको मिटा दिया गया हो जिस तरह आज लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है. क्या पता वर्... Read More...

ईमानदारी का पर्व और वो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

बीवी ने समझाया कि तुम काम पर जाओ मैं जाकर लाइन में लग जाऊँगी बच्ची छोटी है तो क्या हुआ? घर में मरीज है तो क्या हुआ ? किसी न किसी को तो बैंक जाना होगा अगर घर का खर्च चलाना है. ईमानदारी का पर्व है पूरा देश मना रह... Read More...

ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर: व्यंग्य (आरिफा एविस)

नेताजी: "बिना समर्थन के आपको जल, जंगल और जमीन का पुश्तैनी हक़ कैसे मिल सकता है? जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है फिर तुम्हें तो घी से मतलब है.आम खाओ गुठलियों को मत गिनों. सरकार आये य... Read More...

शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार: व्यंग्य (आरिफा एविस)

यह जंगलराज के गर्व की बात है कि जन्मजात राजा ही जंगल पर राज करे. राजा ने ये एलान कर दिया कि वह जन्मजात अधिकारों को कभी भी जंगल से हटने नहीं देगा. जो भी जंगलराज के जन्मजात कानूनों को तोड़ने की कोशिश करेगा दंड का ... Read More...