नव वर्ष पर ‘अश्विनी आश्विन’ की चंद ग़ज़लें…….

एक और वर्ष का गुज़रना यकीनन मानव सभ्यता का एक क़दम आगे बढ़ जाना, ठहरना…. एक बार पीछे मुड़कर देखना, ताज़ा बने अतीत पर एक विहंगम दृष्टि डालकर सोचना, क्या छूटा, क्या है जिसे पूरा होना था और न हुआ, क्या हम निराश ह... Read More...

‘अश्विनी आश्विन’ की ग़ज़लें

शांत पानी में फैंका गया  पत्थर, जो पानी के ऊपर मजबूती से जम रही काई को तोड़ कर पानी की सतह तक जाकर उसमें हलचल पैदा कर देता है ...... अश्विनी आश्विन की ग़ज़लें मस्तिष्क से होकर ह्रदय तक पहुंचकर उसी पानी की तरह विचल... Read More...

‘अश्विनी आश्विन’ की तीन ग़ज़लें

'अश्विनी आश्विन' की तीन ग़ज़लें  अश्विनी आश्विन 1-  जो भरे-बाज़ार, सब के बीच, नंगा हो गया। वो सियासतदां, शहर का फिर मसीहा हो गया।। फिर चले चाकू-छुरे कल, फिर जलीं कुछ बस्तियां, हो गई काशी खफा, नाराज़ कावा ह... Read More...
क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

अश्विनी ‘आश्विन’ अश्विनी ‘आश्विन’ उन रचनाकारों में से है जिन्हें रचनाओं के रूप में खुद के प्रकाशित होने से कहीं ज्यादा रचनाधर्मिता का नशा रहता है | चुपके से कहीं कोने में बैठ कर समाज का जरूरी व... Read More...

सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

फोटो गूगल से साभार सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? चिंतित हूँ!! क्या विगत वर्ष के जैसा होगा ?? विगत वर्ष का भी यूं ही सत्कार किया था । नूतन विध... Read More...

ऐसा क्यों है ?: ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

अश्विनी आश्विन 1- ऐसा क्यों है ? इस दुनिया में ऐसा क्यों है ? जीवन इतना सस्ता क्यों है?? सब अपनी दुनिया में ग़ुम हैं, सब की हसरत, पैसा क्यों है?? बेशक, भीड़ भरी है दुनिया, इन्सां मगर अकेला ... Read More...

अश्विनी आश्विन: की ग़ज़लें

 शांत पानी में फैंका गया  पत्थर, जो पानी के ऊपर मजबूती से जम रही काई को तोड़ कर पानी की सतह तक जाकर उसमें हलचल पैदा कर देता है …… अश्विनी आश्विन की ग़ज़लें मस्तिष्क से होकर ह्रदय तक पहुंचकर उसी पानी की तरह व... Read More...

15 अलविदा, 16 के स्वागत में ‘अश्विनी आश्विन’ की दो ग़ज़लें

चुप्पी और वेवशी के रहस्यमय बाने में लिपटे जाते हुए २०१५ को अलविदा कहते हुए २०१६ के आगमन पर बेहतर सामाजिक और मानवीय परिकल्पना में कुछ गहरे इंसानी सवालों से जूझती ‘अश्विनी आश्विन’ की कलम …… | – संपादक  1... Read More...