गुस्से की गूँज: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

यद्यपि गुस्से को पी जाने का सटीक फार्मूला हमारे संत महात्मा बहुत पहले से बता गए हैं लेकिन अब ऐसा सम्भव नही रह गया है, क्योंकि पीने के लिए अब बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं।  गुस्सा पीना पिछडा हुआ और अप्रासंगिक तरीका ... Read More...

फिर बच जाएंगे रंगों से : व्यंग्य(ब्रजेश कानूनगो)

होली पर विशेष ...... होली की अशीम बधाइयों के साथ ..... हमरंग के पाठकों के लिए  फिर बच जाएंगे रंगों से ब्रजेश कानूनगो मेरा विश्वास है कि वे इस बार भी रंगों से ठीक उसी तरह बच निकलेंगे जिस तरह हर साल अपने आप क... Read More...

मोटेमाल की महिमा: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

दिनों बहुत उत्साह से लोगों से ‘हाथ धुलवाने’ के प्रयास हो रहे हैं, जब तब किन्ही हाथों से गुलाबी रंग जरूर झरने लगता है मगर यह विकास का समय है. कोयला भी केवल कोयला नहीं रहा, कोयला बहुरूपिया हो गया है. वह हीरा हो स... Read More...

चाँद के टुकड़े : कवितायें (ब्रजेश कानूनगो)

अगर जीवन में प्रेम न हो तो जिन्दगी बेज़ार हो जाती है | संसार की उत्पत्ति ही प्रेम की धुरी पर टिकी है | प्रेम के उसी  स्पंदन की खूबसूरत अनुभूति को सहज ही अनुभव कराती हैं  ब्रजेश कानूनगो की कवितायें ..... संपादक  ... Read More...

हिन्दी और मेरा आलाप: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

सब जानते हैं कि हिन्दी रोजगार की कोई गारंटी नही देती, अन्य कोई भाषा भी नही देती लेकिन यह भी सत्य है कि  अंग्रेजी के ज्ञान के बगैर नौकरी नही मिलती। मीटिंगों-पार्टियों में हिन्दी में बातचीत नही होती। मॉल और होटलो... Read More...

ढूंढ सके तो ढूंढ

एक सप्ताह बाद जैसे ही दूरदर्शन पर  रामायण धारावाहिक  शुरू हुआ, हमारा पूरा परिवार आंखें गड़ाए, साधुरामजी को  उसमें  शॉट दर शॉट खोजने लगा।  महाबली रावण  रथ पर सवार हुआ।  'जय लंकेश!' के घोष के साथ  लंका का पश्चिमी... Read More...
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विज्ञापन बोर्डों में हिन्दी का हाल: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

हिंदी दिवस पर विशेष…… विज्ञापन बोर्डों में हिन्दी का हाल  ब्रजेश कानूनगो भाषा विज्ञान और व्याकरण जहां टकराते हों वहां भाषा की शुद्धता एक बिंदु हो सकता है. स्थापित और निर्धारित प्रणाली के अनुसार शब्दों और सह... Read More...