प्रेमचंद, एक पुनर्पाठ: संपादकीय आलेख (हनीफ़ मदार)

प्रेमचंद, एक पुनर्पाठ हनीफ मदार प्रेमचंद की साहित्य धारा को जिस तरह 'यशपाल', रांगेय राघव' और राहुल सांकृत्यायन ने जिस मुकाम तक पहुंचाने में अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल किया वह साहित्यिक दृष्टि और ऊर्जा बाद की पीढ... Read More...

विचलन भी है जरूरी: ‘हमरंग’ संपादकीय (हनीफ़ मदार)

विचलन भी है जरूरी  हनीफ मदार कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया औ... Read More...

हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की: संपादकीय (हनीफ मदार)

हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की  हनीफ मदार फिर से हिंदी दिवस पर मैं असमंजस में हूँ हर साल की तरह, ठीक वैसे ही जैसे हर वर्ष मदर्स डे, फादर्स डे…….लम्बी सी लिस्ट है (कुछ और का आविष्कार और हो गया होगा, उसकी जान... Read More...

मासूम से राही मासूम रज़ा तक…: साक्षात्कार (हनीफ मदार)

राही मासूम रजा का नाम वर्तमान युवा वर्ग के बीच से उसी तरह गुमनाम होता जा रहा है जिस तरह प्रेमचन्द, त्रिलोचन शास्त्री, यशपाल, रांगेय राघव, नागार्जुन, मुक्तिबोध  जैसे अनेक नामों से वर्तमान बाजार में भटकी युवा पीढ़... Read More...

भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए  हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स  देखते हैं | हालां... Read More...

ये है मथुरा मेरी जान….: सम्पादकीय (हनीफ मदार)

ऐसे बहुत से वाक़यात और क्षण हैं अपने इस शहर को व्यक्त करने के, बावजूद इसके, दूर शहरों और प्रदेशों के लोग इसे एक प्राचीन शहर की छवि में वही घिसी पिटी औसत मिथकीय धारणाओं के साथ इसके इकहरे मृत खोल को ही देखते या जा... Read More...

बंद ए सी कमरों में झांकते होरी, धनियाँ…, संपादकीय (हनीफ मदार)

"ऐसा नहीं कि वर्तमान यथास्थिति का विरोध या प्रतिकार आज नहीं है, बल्कि ज्यादा है | एकदम राजनीतिज्ञों की तरह | कुछ हो न हो, बदले न बदले लेकिन व्यवस्थाई यथास्थिति का विरोध करके व्यक्ति सुर्ख़ियों में तो रहता ही है ... Read More...

वह किसान नहीं है….?: (हनीफ मदार)

वह किसान नहीं है….?  हनीफ मदार किसान और किसानी पर बातें तो खूब होती रहीं हैं उसी तादाद में होती रही हैं किसानों की आत्महत्याएं | बावजूद इसके कोई ठोस नीति किसानों के हक़ में अब तक नहीं बन पाई | हालांकि ऐसा भी ... Read More...

मैं भी आती हूं ….! कहानी (हनीफ मदार)

वर्तमान समय की  उपभोगातावादी व्यवस्था के कारण  हरी भरी भूमि और  पेड़ों को काटकर ईट पत्थर की चन्द दीवारों द्वारा बने मकानों के दर्द को बयाँ करती है  हनीफ मदार की कहानी  ' मैं भी आती हूँ ..... ' जिसमें धर्म के आगे... Read More...

जब तक मैं भूख ते मुक्त नाय है जाँगो…. : नाट्य समीक्षा (हनीफ मदार)

13 व् 14 जून को मथुरा में दो दिवसीय नाट्य आयोजन में मंचित हुए 'राजेश कुमार' के नाटक "सुखिया मर गया भूख से" की मंचीय प्रस्तुति पर 'हमरंग' के संपादक "हनीफ मदार" का समीक्षालेख......| - अनीता चौधरी  जब तक मैं भू... Read More...