दुलारी बाई @ एमए इन हिंदी: व्यंग्य (डॉ० कर्मानंद आर्य)

"फारवर्ड ब्लाक आजकल एक दूसरे का कान फोड़ रहे हैं. गरिया रहे हैं अपने पूर्वजों को. सालों और बनो प्रगतिशील और भला करो मनुष्यों का. आदमी को आदमी समझो बहुत बोलते थे अब भुगतो. ‘एमए इन हिंदी’ सांप घुस गया है छाती में.... Read More...

डकार की दरकार: व्यंग्य (डॉ० कर्मानंद आर्य)

‘डकार’ पर जांच कराना टेढ़ी खीर है. जांच का शिरा हर सरकार से जुड़ता है इसलिए ‘सरकार’ इससे बच रही है. इतिहास कहता है कि एक विशाल प्रदेश का मुख्यमंत्री भी यह नहीं समझ पाया कि गरीब के पेट को कितना चारा चाहिए? कई बार ... Read More...