रचनात्मक हस्तक्षेप का ‘जुटान’: रिपोर्ट (मज्कूर आलम)

रचनात्मक हस्तक्षेप का 'जुटान'  मज्कूर आलम 25 अप्रैल को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में साहित्यिक संस्था ‘जुटान’ का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में देशभर के आंदोलनकर्मी और साहित्य... Read More...

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री ... Read More...

अवचेतन की चेतन से लड़ाई: ‘तमाशा’ (मजकूर आलम)

ऐसे ऊपर से शांत दिखने वाले अशांत समुन्दर में अगर कोई कंकड़ी भी मार दे तो जाहिर है कि उसमें हलचल मचेगी ही। और यही काम करती है तारा। और, अगर समुद्र में हलचल मचेगी तो ज्वारभाटा आएगा ही और ज्वारभाटा आएगा तो महासागर ... Read More...

…और फिर परिवार: कहानी (मज्कूर आलम)

मज़्कूर आलम की कहानी 'और फिर परिवार' एक बेहद मजबूर, बेबस और लाचार लड़की की त्रासदी लगी, जो खुद को विकल्पहीन महसूस कर आत्महत्या कर लेती है, लेकिन पुनर्पाठ में लगा कि कई बार स्थितियां आपसे बलिदान मांगती हैं। रतिका... Read More...

यह चुप्पी: कविता (मज्कूर आलम)

यह कविता किसी कवि की कलम से नहीं निकली और न ही रचनाकार की कवि के रूप में कोई पहचान ही है तब निश्चित ही यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो खुद शब्द ग्रहण करके बाहर आई है | मजकूर आलम की यह कविता ....| यह चुप्पी  यह ... Read More...

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’  मज्कूर आलम तमाम हंगामों और तमाशों के बीच साल 2015 समाप्त हो गया। इस बीच साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सारोकार की पैरोकारी के लिए बना वेबपोर्टल 'हमरंग डॉट कॉम' ने भी पिछले ही महीने अपना एक ... Read More...

ग्लोबल युग का क्रिकेटीय राष्ट्रवाद: संपादकीय (मज्कूर आलम)

ग्लोबल युग का क्रिकेटीय राष्ट्रवाद  मज्कूर आलम हम देशवासियों की तमाम शुभकामनाओं के बावजूद भी भारत टी-20 विश्वकप से बाहर हो गया । हालांकि क्वार्टर फाइनल बन गए आस्ट्रेलिया के साथ हुए कठिन मुकाबले में उसे हरा क... Read More...
‘कबीर का मोहल्ला’ वाणी पकाशन पर उपलब्ध

कबीर का मोहल्ला: कहानी (मज़कूर आलम)

‘कबीर का मोहल्ला’ मजकूर आलम के कथा संग्रह की शीर्षक कहानी है | उनकी चिर-परचित शैली में उपस्थित यह कहानी समाज में गहरे धंसे विकृत मानवीय पूर्वाग्रहों को आईना दिखाते हुए तमाम पारम्परिक व् आधुनिक व्यवस्थापकी... Read More...

…और फिर परिवार : कहानी (मज़कूर आलम)

मज़्कूर आलम की कहानी ‘और फिर परिवार’ एक बेहद मजबूर, बेबस और लाचार लड़की की त्रासदी लगी, जो खुद को विकल्पहीन महसूस कर आत्महत्या कर लेती है, लेकिन पुनर्पाठ में लगा कि कई बार स्थितियां आपसे बलिदान मांगती हैं... Read More...

पानीदार …, कहानी (मज़कूर आलम)

‘रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून’ क्या हुआ गर रहीम ने कहा था तो,  शहर कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है, पानी की समस्या सभी जगह मूलभूत समस्या ही है, फिर चाहे इंसानी आँखों का पानी ही क्यों न हो ….. |  यह त्रास... Read More...