आवाज़ों के घेरे : आलेख (डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’)

सामाजिक और राजनैतिक, वैचारिक समानता और द्वन्द के बीच साहित्य से लालित्य और भारतीय संस्कृति के लोक रंग कहीं विरक्त हो रहे हैं | निसंकोच साहित्य की सार्थकता वैचारिक प्रवाह एवं राजनैतिक चेतन के बिना न केवल अधूरी ब... Read More...

थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन” , डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। 'रवींद्र जैन' एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है... Read More...

शातिर आँखें: एवं अन्य कविताएँ (डॉ० मोहसिन खान ‘तनहा’)

इंसानी हकों के उपेक्षित और अनछुए से पहलुओं के मानवीय ज़ज्बातों को चित्रित करतीं 'डॉ० मोहसिन खान 'तनहा' का कवितायें  शातिर आँखें  डा0 मोहसिन खान ‘तनहा कई जगह, कई आँखें पीछा कर रही हैं आपका क़ैद कर रही हैं ... Read More...

स्त्रियों की छद्म आज़ादी का सूरज फेसबुक की झिरियों से: समीक्षा (डॉ० मोहसिन खान)

यूँ तो हिन्दी उपन्यासों की श्रृंखला में हिन्दी में हजारों उपन्यास आए, जो विषयों के प्रतिपादन में नए चौंका देने वाले विषय लेकर उपस्थित हुए। कई उपन्यास अपनी मौलिक शैली के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। परंतु मेरी दृष्ट... Read More...

प्रेमचंद एक पुनर्पाठ, के संदर्भ में एक टिपण्णी: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा)

“हमरंग” के संपादकीय आलेख ‘प्रेमचंद एक पुनर्पाठ‘ के संदर्भ में साहित्यकार डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा की एक बड़ी टिपण्णी ……जिसे विमर्श के तौर पर जस के तस यहाँ प्रकाशित कर रहे है... Read More...

नए-नए जुमले और मुहावरे: कविता (डॉ मोहसिन खान)

सदियों से सत्ताधारी अपनी सत्ता के लालच में आमजन में पनपे भाई चारे को कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम, तो कभी भाषा को हथियार बना कर आम जनता को बांटकर हमेशा अपनी सत्ता कि रोटियां सेकते  रहे  हैं | इसी दर्द को... Read More...

डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की गज़लें: humrang

डॉ. मोहसिन ख़ान 'तनहा' की गज़लें  डा0 मोहसिन खान ‘तनहा 1-  ज़्यादा उड़िये मत वर्ना धर लिए जाएंगे। अब हौसलों के पंख कतर लिए जाएंगे। आजकल मौसम है तेज़ाबी बारिश का, तो ख़ुद को बाहर किधर लिए जाएंगे। बेबाक बात... Read More...

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

हमरंग के दो वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...

जिस्म की गिरफ़्त : कवितायें (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

सामाजिक बुनावट से त्रिस्कृत  और अछूत जिन्दगी के मानवीय पहलुओं को रेखांकित करती, कथित सभ्य समाज को खुद का विद्रूप चेहरा दिखाती एवं वर्तमान व्यवस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खडा करती डॉ मोहसिन खान की बेहतरीन कवितायें ..... Read More...

गाँधी : संकल्प, शक्ति और अर्थवत्ता (डॉ मोहसिन खान)

वर्तमान में हम भारत को देखें तो ग्रामों के विकास की अवस्था और दुर्दशा स्पष्ट हो जाती है। आज भी कई गांवों में पानी पीने की असुविधा के साथ बिजली, विद्यालय और स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। भारत का आज़ादी के बाद अ... Read More...