थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन”

कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। ‘रवींद्र जैन’ एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का ... Read More...
ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

मोहसिन ‘तनहा’ की गज़लें

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’ 1- कितनी होशियारी की होशियारों ने। पहनली है खाल शेर की सियारों ने। रोज़ ही चौराहे पर बिक जाता हूँ मैं, तरह-तरह से लूटा मुझे ख़रीदारों ने। बनाया था मंसूबा जहाँ पर ... Read More...
आम आदमी को समर्पित: ग़ज़ल (मोहसिन ‘तनहा’)

आम आदमी को समर्पित: ग़ज़ल (मोहसिन ‘तनहा’)

मोहसिन तनहा आम आदमी को समर्पित मछलियों को तैरने का हुनर चाहिए। गंदला है पानी साफ़ नज़र चाहिए। बातों से न होगा हासिल कुछ यहाँ, आवाज़ में भी थोड़ा असर चाहिए। न देखो ज़ख्मों से बहता ख़ून मेरा, ... Read More...
ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

ग़ज़ल : (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

आज ख़ास “माँ” को समर्पित डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की एक ग़ज़ल डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’ जो बीज था आज वो शजर है। ऐ माँ बस ये तेरा ही हुनर है। तेरी रोनक तेरा ही है उजाला, तू है तो ही ये मकान घर है।... Read More...
डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की ‘ग़ज़लें’

डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ की ‘ग़ज़लें’

डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’  डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’ स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक जे. एस. एम. महाविद्यालय, 201, सिद्धान्त गृह निर्माण संस्था, विद्या नगर, अलीबाग – ज़िला रायगढ़ (महाराष्... Read More...
साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’

हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमा... Read More...

क़बरखुद्दा : कहानी (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

शहर मे अभी भी रियसती शहर होने के अवशेष मौजूद हैं, शहरपनाह की मोटी-मोटी दीवारें, कई दरवाज़े, अस्तबल, मक़बरे, छोटी हवेलियाँ, छोटी गढ़ियाँ, इमारतें, मोहल्लों के नाम इत्यादि से अब भी पता चलता है कि यह एक रियासत ... Read More...