‘नीलाम्बुज’ की ग़ज़लें: humrang

'नीलाम्बुज' की ग़ज़लें  नीलाम्बुज 1-  नगरी नगरी हम भटके हैं हो कर के बंजारे जी जुगनू-सा कोई दीप जला के बस्ती में मतवारे जी। आहिस्ता आहिस्ता हमने खुद को पढ़ना सीख लिया अभी तलक तो दूजों पर ही किये थे कागद क... Read More...

नीलाम्बुज की ग़ज़लें:

नीलाम्बुज ग़ज़ल और कवितायें सामान रूप से लिख रहे हैं | आपकी न केबल ग़ज़लें बल्कि कविताओं में भी राजनैतिक प्रभाव में बनती बिगड़ती सामाजिक मानवीय अमानवीय तस्वीरें साफ़ साफ़ झलकती हैं ….. | कवितायेँ फिर कभी आज हमरंग पर आ... Read More...