रात बिखरने लगी है: एवं अन्य कविताएँ (नीता पोरवाल)

जैसे रेगिस्तान की तपती दोपहरी में पानी का दिख भर जाना भी तृषाग्नि को असीम शांति से भरकर थके क़दमों में भी एक अजीब जोश का संचरण कर देता है ......ठीक ऐसे ही जीवन संघर्ष की आपा-धापी, एवं वैचारिक द्वंद्ध की गंभीरता ... Read More...

‘नीता पोरवाल’ की दो कवितायेँ

(नीता पोरवाल की प्रस्तुत कविताऐ श्रमिक जीवन की त्रासद स्थिति और भरपेटों के नकली दुखों की पड़ताल करती है...संपादक ) १-  कह सकोगे क्या ? हम मेहनतकशों की बाजुओं की ताकत और ज़ज्बा देख उद्व्गिन रहते हो त... Read More...