‘कही-अनकही’ कविता की : समीक्षात्मक आलेख (निलय उपाध्याय)

                                                                 जिएऔर लिखे के बीच का फ़र्क नीलकमल दिखे और लिखे से झांकने लगे पकडना मेरा गिरेबान मेरे गुनाहो का हिसाब लेना कभी दस्खत मत करना... Read More...

‘निलय उपाध्याय’ की दो कवितायेँ

कबीर नगर   तुम्हारा नगर तो अजीब है कबीर सच कहूं तो अदभुत, क्या तुम्हे पता था इसीलिए रच दिए एक साथ दो दो प्रतीक और किया उलटवासियों का विधान सच कहता हूं मजा आ गया उलट बांसिया उलट रही है ,पुलट रही है ... Read More...