भाषा बहता नीर है: समीक्षा ‘कुतुबनुमा’ कविता संग्रह, (प्रदीप कांत)

अग्रज कवि सुमित्रानंदन पंत ने कहा था - वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान...| यह कविता का एक कारण हो सकता है| इस कोमल भावना से थोड़ा आगे बढ़ें, व्यक्तिगत पीढा ... Read More...

जब ग़ज़ल मेहराबान होती है: समीक्षालेख (प्रदीप कांत)

कभी कतील शिफाई ने कहा था- लाख परदों में रहूँ, भेद मेरे खोलती है, शायरी सच बोलती है| अशोक भी इस तरह के सच का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तभी कह पाते हैं-  "मुझे ज़रूर कोई जानता है अन्दर तक मेरे खिलाफ़ ये सच्चा... Read More...

प्रदीप कांत की दो ग़ज़लें……

आधुनिकता के साथ गजल की दुनियां में अपनी पहचान बना चुके 'प्रदीप कान्त' अपनी दो बेहतर गजलों के साथ हमरंग पर दस्तक दे रहे हैं ....आपका हमरंग पर स्वागत है ...| - संपादक  1 -   प्रदीप कांत जल रहा सारा शहर अब... Read More...