भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

 हमारी वर्तमान सांकृतिकता की विरासतीय थाती लोक भाषा, बतकही, किस्से-कहानियाँ, मानवीय चेतना की विकास प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण पायदान रही है | लोक या दन्त कथाओं, किस्सों में उच्चरित वर्गीय चरित्र और स... Read More...
अमीन मियां सनक गये हैं: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

अमीन मियां सनक गये हैं: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

सामाजिक बदलाव के समय में साहित्य से गाँव और ग्रामीण जीवन की कहानियाँ जैसे गायब होती जा रहीं हैं, उसकी जगह बाजारी अतिक्रमण से प्रभावित नगरीय जनजीवन और उसके बीच पनपते नये मध्यवर्ग की आर्थिक विषमताओं एवं व्य... Read More...

टुअर होते वक्त में: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाहा)

समाज, स्थितियों, परिस्थितियों या राजनीति में समय के साथ क्या वाकई कुछ बदलाव हुआ …… या महज़ नाम और स्वरूप ही बदले यह तो देखना और सोचना हमें खुद को…….. | ‘कभी’ सामंती व्यवस्था ‘थी’ और आज……कॉर्पोरेट या कॉ... Read More...