‘तरसेम कौर’ की तीन कविताएँ

कविता लिखी नहीं जाती शायद वह बनती है, सजती है भीतर कहीं गहरे मन के अंतस में, और रिस पड़ती है शब्दों की बुनावट लेकर, कुछ ऐसे ही एहसास से भरतीं हैं 'तररसेम कौर' की कविताएँ ...................... १-   तरसेम कौ... Read More...

एक बिटिया की मनोव्यथा…: कविता (तरसेम कौर)

नए लेखकों को बेहतर मंच प्रदान करना भी हमरंग के उद्देश्यों में शामिल है | इसी पहल के साथ अब तक हमरंग एक नहीं कई नव लेखकों की रचनाएं प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहित कर चुका है और उनकी कलम निरंतर चल रही है  | आज इस... Read More...

तारीख पे तारीख…., कविता (तरसेम कौर)

देश के किसी भी नागरिक को समय पर न्याय न मिल पाना भी हमारे सरकारी तंत्र और लचर क़ानून व्यवस्था की पोल तो खोलता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि  सदियों बीत जाती है पर बेबस और लाचार लोगों को इन्साफ नहीं मिल पाता... Read More...

‘चाँद की आँखों में’ एवं अन्य कवितायें : (तरसेम कौर)

जीविका की जद्दो-जहद में  लगातार क्षीण होती हमारी संवेदनाएं , अपना जीना भूलकर दूसरों के  जीवन को ही अपना जीना समझने की स्त्री मन की कोमलता, प्राकृतिक और वास्तविक रंगों के साथ जिन्दगी की कला को समझने की कोशिश करत... Read More...