समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. : फिल्म समीक्षा (सैयद एस तौहीद)

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई..  एस तौहीद शहबाज़ प्रेम रतन की परिभाषा एवम दायरा इतना अधिक सीमित नही होना चाहिए जितना कि हालिया रीलिज 'प्रेम रतन धन पायो' या उसके समान फिल्मों में पेश किया जाता है. प्रेम एहसान तथ... Read More...

यादों में ‘राजकपूर’ छलिया के बहाने: आलेख (एस तौहीद शहबाज़)

'राजकपूर' के जन्मदिवस पर फिल्म 'छलिया' के संदर्भों में फिल्म की सामाजिक और मनोरंजक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए राजकपूर की भूमिका को याद कर रहे हैं 'सैयद एस तौहीद'..... यादों में 'राजकपूर' छलिया के बहाने  ... Read More...

रफ़ी साहेब की दीवानगी: आलेख (सैयद एस तौहीद )

'रफ़ी साहेब को पहला फिल्मी ब्रेक श्याम सुंदर ने एक पंजाबी फ़िल्म मे दिया, फ़िर जी एम दुर्रानी की फ़िल्म में पहले हिन्दी गीत के लिए नौशाद ने पहल की. उस जमाने में हुश्नलाल भगतराम व गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ कुछ स... Read More...

जिंदा रहना हर आदमी का अधिकार है: आलेख (एस तौहीद शाहवाज़)

"देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। हाशिए के लोगों के हांथ अब भी खाली हैं । महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निच... Read More...

सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त, ‘कहानी २’ आलेख (सैयद एस तौहीद)

सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त, 'कहानी २'  एस तौहीद शहबाज़ शोषण के हर रुप का विरोध ज़रूरी है. यह किसी भी रुप में मौजूद हो सकता है.सुजॉय घोष की हालिया 'कहानी 2 दुर्गा रानी सिंह' इसी बात को रेखांकित करती है.सेक्सु... Read More...

आईए ‘नक्शाब जारचवी’ को जाने : आलेख (सैयद एस तौहीद)

आज फिल्मउद्योग में बाजारी प्रभाव और नित नए उगते चहरों कि भीड़ में गुम होते और हो चुके कई नामों में शामिल है बुलंद शहर में जन्मे  गीतकार  'नक्शाब जारचवी' का नाम विसरे हुए इसी फनकार कि कुछ यादें ताज़ा करा रहे हैं '... Read More...

शहीद एक प्रेरक चरित्र: सिने चर्चा (सैयद एस तौहीद)

अजीब विडम्बना है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में भगत सिंह पर दर्जनों फिल्मे आने के बाद भी क्या एक भी फिल्म भगत सिंह को उनके वास्तविक विचार के साथ चित्रित कर सकी है.....? जिस पर आज चर्चा की जा सके.....बावजूद इसके... Read More...

क्या एडल्ट कॉमेडी वाकई कूल है..? (एस0 तौहीद शहवाज़)

सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी | मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे | एक जमाना था जब बी आर इशारा ... Read More...

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्यार व दोस्ती जैसे सरल सुंदर भाव को उलझन बना देना। कभी न ख़त्म... Read More...

राजनीतिक मुखौटों का दस्तावेज: फिल्म गुलाल

गुलाल में नयी सदी के युवा आंदोलनों को समझने की एक पहल हुई है। फिल्म को देखते वक़्त विश्वविद्यालयों का चुनावी माहौल की फिजाएं याद आती हैं। रैगिंग के भय से नए विद्यार्थियों का नामर्दगी की हद तक सीनिअर्स की हुक्मप... Read More...