भूमिका: सिनेमा की भाषा में: आलेख

"पिछली सदी के चालीस और पचास के दशक में मराठी मंच और फ़िल्म की प्रसिद्ध अभिनेत्री हंसा वाडेकर ने पत्रकार अनिल साधु के साथ मिल कर अपनी जीवनी लिखी। मराठी में इस आत्मकथा का शीर्षक ‘सांगत्ये आएका’ (सुनो और मैं कहती ह... Read More...

शार्लिट ब्रॉन्टी: आज की स्त्री : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

खासकर साहित्य के संदर्भ में, अभिव्यक्ति में स्त्री स्वर तब से शामिल हो रहे थे जब स्त्रियों का लिखना तो दूर शिक्षा प्राप्त करना भी सामाजिक अपराध था | दरअसल गोल-मोल तरीके से समाज स्वीकृत स्थितियों को लिखना या चित... Read More...

किसने बिगाड़ा मुझे: आत्मकथ्य (डा० विजय शर्मा)

यूं तो इंसानी व्यक्तित्व के बनने बिगड़ने में हमारे सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है किन्तु इस बिगड़ने “इंसान बनने” के लिए सामाजिक असमानताओं और विषमताओं के खिलाफ मन में उठते सवालों को न मार कर उनके जबाव खोजने ... Read More...

तीसमार खाँ: कहानी (डा० विजय शर्मा)

“अरे भई औरतों को काबू में रखना जरूरी है। बड़े घर की बेटियाँ बड़ी मगरूर होती हैं, उन्हें ठीक करना जरूरी है।” उन्होंने स्त्री संबंधी अपने विचारों का खुलासा किया। मैं कुछ कहूँ उसके पहले उन्होंने कहा, “आप हमे ब... Read More...