जलतरंग : कहानी (प्रतिभा)

उसके तिलिस्म को बिखरते हुए देखने का मेरा इन्तज़ार जितना लम्बा हो रहा था उसका तिलिस्म उतना ही ताकतवर हो रहा था..... उस कल्पनाजीवी औरत के विश्वास के महलों के आगे मेरे यथार्थ के महल काँपते नज़र आ रहे थे ..... कुछ ... Read More...

सुबह होने तक: कहानी (हनीफ़ मदार)

"गुड़िया खेलने की उम्र में ब्याह दिया था मुझे । मैं रानी ही तो थी उस घर की । दिन में कई-कई बार सजती-सँवरती, घर भर में किसी ऐसे फूल की तरह थी जिसके मुरझाने पर सब चिंतित हो जाते । मोटी-मोटी कच्ची मिट्टी की बनी दी... Read More...

इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था- यों ह... Read More...

अन्नाभाई का सलाम: कहानी (सुभाष पंत)

भाषा और ऐतिहासिक नायक सुरक्षा की मजबूत दीवारें हैं। इसके अलावा हमें अपनी कमजोर पड़ गई खिड़की तो बदलनी ही है...’’  बहुत भोला विश्वास है सावित्री तुम्हारा। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर-बाहर, स्कूल, देव... Read More...

अधिकार तो है, पर उनको आप उपयोग में नहीं ले सकते: (प्रो० अपूर्वानंद)

पिछले कुछ समय से अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रेखांकित करते हुए कई विद्वानों ने इस दौर को अघोषित आपातकाल की संज्ञा तक दे डाली,  इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का नाम अग्रणी है । कां... Read More...

नाट्य लेखन का कृत्रिम संकट: आलेख (राजेश कुमार)

जो लोग छाती पीट-पीट कर आज नाटक न लिखे जाने को रोना रोते हैं, वे आजादी के बाद धर्मवीर भारती और मोहन रोकष से आगे बढ़ ही नहीं पाते। उनकी सूई उन्हीं तक अटकी हुई है, या आजादी के पूर्व की बात करें तो भारतेन्दु हरिश्च... Read More...

स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात, एक दिन की नहीं होती: (डॉ० नमिता सिंह)

'आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है | आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है| इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है | अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्... Read More...

दलित साहित्य के पुरोहित: आलेख (ओमप्रकाश वाल्मीकि)

बात पुरानी॰॰॰॰ आश नई  दलित साहित्य में आत्मकथाओं ने जिस वातावरण का निर्माण किया है। वह अद्भुत है। जिसे चाहे विद्वान आलोचक जो कहें, लेकिन दलित जीवन की विद्रूपताओं को जिस साहस और लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ दलित आ... Read More...

नाक के नीचे : आलेख (रूपाली सिन्हा )

समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी... Read More...

लाल पान की बेगम : कहानी (फणीश्वरनाथ रेणु )

प्रसिद्ध कहानीकार 'फणीश्वरनाथ रेणु ' के जन्मदिवस के अवसर पर उनको याद करते हुए, आइये पढ़ते हैं उनकी कहानी 'लाल पान की बेगम'.....  लाल पान की बेगम फनीश्वरनाथ रेणु क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्य... Read More...