राजा रवि वर्मा: दो फ़िल्में, दो नजरिए : फिल्म समीक्षा (प्रो० विजय शर्मा)

"जब कलाकार और उसकी कृतियों की कहानी किसी दूसरे कैनवस पर उकेरी जाती है तो वहाँ बहुत कुछ बदल जाती है। सच्चाई और कल्पना का मिश्रण एक नई कृति रचता है। यही हुआ है हाल में बनी दो फ़िल्मों में। ‘मकर मञ्ञ्’ और ‘रंग रसिय... Read More...

आयेंगे अमरीका से अच्छे दिन एवं अन्य कवितायें, विमल कुमार

प्रतीकों के गहरे संदर्भों के साथ गहन गंभीरता के साथ आती आधुनिक कविता में 'विमल कुमार की कवितायें एक अतरिक्त खिंचाव के साथ आती हैं | सहज सरल शब्दों में मौजूं वक्ती परिस्थितियों को व्यंग्यात्मक रचनाशीलता के साथ उ... Read More...

वो औरत : कविता (अशोक तिवारी)

स्त्री जीवन के क्षणिक, स्थाई, सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक विभिन्न रूप स्वरूप, कुंठा अवसाद प्रेम आलाप के आरोह अवरोह से गुजरते हुए उसके अनेक पहलुओं का रचनात्मक विश्लेष्ण करती अशोक तिवारी की एक लम्बी कविता....| -... Read More...

स्थिति नियंत्रण में है एवं अन्य कवितायें, शहनाज़ इमरानी

अनचाहे गहराते अंधेरों में व्याप्त सन्नाटे को अपने रचना शब्दों से तोड़ने का प्रयास करती "शहनाज़ इमरानी की कविता .....| - संपादक  स्थिति नियंत्रण में है शहनाज़ इमरानी पुलिस कि गश्त है चौराहों, सड़कों, गलियों म... Read More...

वर्तमान सांस्कृतिक परिदृष्य में रंगकर्म की चुनौतियाँ: आलेख (राजेश कुमार)

लेखक और कलाकार आम जनता से अलग-थलग होने लगे। एकांकी जीवन व्यतीत करने लगे। सामूहिकता व्यक्तिवाद में तब्दील होने लगा। मुगालते में रहने लगे कि जनता के बीच जाने की जरूरत क्या है? अगर जनता के विचार की जरूरत भी होगी त... Read More...

एक जोड़ा झपकती हुई आँखें : कविता (पद्मनाभ गौतम)

हमरंग का संपादकीय आलेख 'विचलन भी है जरुरी ' को पढ़ते हुए 'पद्मनाभ गौतम' को यह अपना भोगा हुआ यथार्थ लगा | और सहज ही उनकी कलम से यह कविता आलेख पर टिपण्णी के रूप में निकली | यह कविता एक पद्मनाभ का ही यथार्थ नहीं लग... Read More...

पढ़ने-गुनने की जगह : संस्मरण (राजेश उत्साही)

"1985 में जब चकमक शुरू हुई तो किताबों से बिलकुल अलग तरह का रिश्‍ता शुरू हुआ।  हर महीने चकमक के लिए सामग्री जुगाड़ने, तैयार करने के लिए घंटों इस पुस्‍तकालय में लगाने होते थे।  तो यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि... Read More...

पागलों ने दुनिया बदल दी: कहानी (रमेश उपाध्याय)

घोर अँधेरे वक़्त की हताशाओं के बीच, संवेदनशील इंसानी धरती की आशाओं के सपने संजोने को, आसान है कि दिवास्वप्न देखना कह दिया जाय किन्तु उजाले की उम्मीदों के यही सपने ही तो हैं जो इंसान को अँधेरे के खिलाफ खड़े रहने औ... Read More...

जिस्म ही नहीं हूँ मैं : कविता (संध्या नवोदिता)

कविता के रूप में आकार लेती आधुनिक स्त्री जो लवरेज है अपने समय के ज़िंदा सवालों से, जो ढहा चुकी है सामाजिक रुढियों के मानवीय अंतर के किले को,.... खड़ी होती अपने पैरों पर इंसानी रूप में बुनने को एक आकाश सामाजिक भाग... Read More...

हाशिये पे खडे़ लोग : कवितायें (लतिका बत्रा)

कविता अभिव्यक्ति का वह आलोड़न है जो सहज ही व्यक्तिगत स्पन्दनों को समष्टिगत भावों की ओर अग्रसर कर देता है । ह्रदय स्पंदन से फूटती मानवीय अभिव्यक्ति, सामाजिक धरातल पर यथार्थ रूप लेतीं 'लतिका बत्रा' की कुछ कविताएँ... Read More...