यादें हैं शेष, इंसान और इंसानियत को ऊँचाई देने वाले कवि की:

कुंवर नारायण (19 सितम्बर, 1927, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते हैं। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक क... Read More...

मुसलमान: कविता (निवेदिता)

कुछ रचनाएं वर्तमान समय की विद्रूप विभीषिकाओं को बेहद स्पष्ट स्वरूप में सामने ला खड़ा करती हैं | ये रचनाएं मानव अंतर्मन को गहरे तक हिला देती हैं जहाँ इंसान खुद को एक बड़े सवाल के सामने जबावदेह के रूप में खड़ा पा... Read More...

मैंने एक लड़की को मरते देखा: कविता (अंजली पूनिया)

हर पल, हर दम, मरती, दम तोडती आधी दुनिया की तस्वीर, रचनात्मक दृष्टि से उकेरती साहित्यिक हस्ताक्षर बनती खुद आधी दुनिया ....... सराहनीय प्रयास हमरंग पर स्वागत के साथ ...| - संपादक  मैंने एक लड़की को मरते देखा ... Read More...

पहला सुख निरोगी काया…. (अनीता चौधरी)

पहला सुख निरोगी काया.... अनीता चौधरी विश्व जनसंख्या की दृष्टि में दूसरा स्थान रखने वाला देश भारत जिसकी आबादी लगभग एक अरब इक्कीस करोड़ है | जिसकी मूलभूत आवश्यकताओं में से स्वास्थ्य की सेवाओं को अलग करके नही द... Read More...

विश्वविद्यालयों की ‘धंधेबाज़ी’ की नई तैयारी !

(विश्वविद्यालयी व्यवस्था पर अगर प्रस्तावित बदलाव लागू हुए तो किस किस्म की समस्याएं खड़ी होंगी...... भारतीय शिक्षा व्यवस्था और युवा पीढी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहीं हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे... Read More...

हिंदी रंगमंच से विश्वासघात: आलेख (अनीश अंकुर)

"शौकिया रंगमंच का आंदोलन इस देश के हर क्षेत्र में और हरेक गॉंव में फैलाना है और यही रंगमंच के टिके रहने का आधार है। शौकिया रंगमंच ही पेशेवर रंगमंच का भरण-पोषण करता है।’’ हमरंग पर ‘नटरंग’ पत्रिका के ब.व.कारंत वि... Read More...

प्रेमचंद, एक पुनर्पाठ: संपादकीय आलेख (हनीफ़ मदार)

प्रेमचंद, एक पुनर्पाठ हनीफ मदार प्रेमचंद की साहित्य धारा को जिस तरह 'यशपाल', रांगेय राघव' और राहुल सांकृत्यायन ने जिस मुकाम तक पहुंचाने में अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल किया वह साहित्यिक दृष्टि और ऊर्जा बाद की पीढ... Read More...

‘न्यूटन’ फिल्म नहीं एक विचार प्रक्रिया… : फिल्म समीक्षा (नवलकिशोर व्यास)

चुनाव को हम सभी ने बुलेट और बटन तक सीमित कर दिया है। पिछले कुछ समय में बड़े शहरों में वोट कास्टिंग बढ़ी है पर भारत केवल दिल्ली-मुम्बई-बेंगलोर नही है। ठेठ गांव तक जाकर लोगो के वोट करने के पीछे कारण भी हमें जानने ह... Read More...

बीस सौ इक्यावन का एक दिन: कहानी (नमिता सिंह)

"मित्र ने बताया कि हिंदुस्तान के विदेशी मित्रों ने देश को लबालब आर्थिक सहायता इस शर्त पर दी थी कि देश से गरीबी हटा दी जाएगी। मित्र राष्ट्रों से पर्यटक आते तो उन्हें गरीबी और भुखमरी को देखकर अच्छा नहीं लगता था। ... Read More...

ग्लोबल गांव में रंगकर्म पर संकट: आलेख (राजेश कुमार)

मौजूदा जो हालात है उसमें रंगमंच को विकेन्द्रित करना ही होगा। रंगमंच की स्थानीयता को पहचान देनी होगी। इसके कथ्य और रंगकर्म को सम्मान देना होगा क्योंकि इन्होंने कारपोरेट के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं बल्कि जो व्य... Read More...