क़बरखुद्दा : कहानी (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

शहर मे अभी भी रियसती शहर होने के अवशेष मौजूद हैं, शहरपनाह की मोटी-मोटी दीवारें, कई दरवाज़े, अस्तबल, मक़बरे, छोटी हवेलियाँ, छोटी गढ़ियाँ, इमारतें, म... Read More...

शोकपर्व: कहानी (अनवर सुहैल)

आशा -निराशा, कुंठा-अवसाद के बीच जीते-जी अपना शोकपर्व मनाती युवा पीढी के मानसिक एवं आंतरिक अंतर्द्वंद का बेहद रोचक और पठनीय शैली में विश्लेष्ण करती ‘अन... Read More...
शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

‘राजू ने कहा – ”हम खुद अपने गांव में हर साल दुर्गा-पूजा में खुबसूरत ढंग से पंडाल सजाते हैं साब, भले से दाढ़ी-टोपी वाले गुस्सा करते हैं लेकिन क... Read More...

लाईट हाउस सिनेमा: कहानी (शेखर मल्लिक)

पूंजीवादी सिद्धांतों के आधार पर विकास या सामाजिक बदलाव की प्रिक्रिया में हमेशा ही एक बड़े वर्ग की मूल आवश्यकताओं उसके सपने, आकांक्षा, बल्कि उसका सम्पूर... Read More...

मोटेराम जी शास्त्री: कहानी (प्रेमचंद)

भिषगाचार्य पण्डित मोटेराम जी शास्त्री की लखनऊ मे घूम मच गई। अलंकारों का ज्ञान तो उन्हे था ही, कुछ गा-बजा भी लेते थे। उस पर गुप्त रोगो के विशेषज्ञ, रसि... Read More...

फलितार्थ: कहानी (अवधेश प्रीत)

कथाकार ‘अवधेश प्रीत’ मानवीय जिंदगियों के साथ इंसानी जिजीविषा के संघर्षों से उत्पन्न छोटी से छोटी घटनाओं को ऐसे सहेजते हैं जैसे समय की गुल्लक मान... Read More...

ठाकुर का कुआँ: कहानी (मुंशी प्रेमचंद)

मुंशी प्रेमचंद के लेखन काल को एक सदी से ज्यादा वक़्त हो गया | हमारी सभ्यता प्रेमचंद के तत्कालीन समय और समाज से सौ साल और आगे निकल आई | सामाजिक, स... Read More...

मुहब्बत ही दीन-औ-ईमां मेरा: कहानी (शेखर मल्लिक)

“वसंत और तबस्सुम की अंतरजातीय शादी, इस औद्योगिक शहर के एक छोटे से हिस्से में, जहाँ ये लोग बसर कर रहे थे, एक किस्म के लोगों को पसंद नहीं आई थी…... Read More...

टुअर होते वक्त में: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाहा)

समाज, स्थितियों, परिस्थितियों या राजनीति में समय के साथ क्या वाकई कुछ बदलाव हुआ …… या महज़ नाम और स्वरूप ही बदले यह तो देखना और सोचना हमें खु... Read More...