‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | ... Read More...

कटी नाक, जुड़ी नाक: कहानी (अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’)

'अमरपाल सिंह' की कहानियों में भाषाई पकड़ और कहानीपन निश्चित ही एक प्रौड़ कथाकार होने का आभास कराता है | प्रस्तुत लघुकहानी में भी अमरपाल सिंह में एक संभा... Read More...

बिहार वाली बस : लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

"ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहर... Read More...

नये स्वरों की वाहिका-‘वाड्.मय’ पत्रिका :समीक्षा (डॉ अल्पना सिंह)

इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्... Read More...

भक्ति आन्दोलन और काव्य: समीक्षा (आशीष जायसवाल)

‘सूर की कविता  का समाज’ और ‘मीरा के काव्य में सामाजिक पहलू’ दो ऐसे महत्वपूर्ण कवियों के विषय में लिखा गया लेख है जो प्रायः हिन्दी साहित्य के आलोचकों क... Read More...

स्त्रियों की छद्म आज़ादी का सूरज फेसबुक की झिरियों से: समीक्षा (डॉ० मोहसिन खान)

यूँ तो हिन्दी उपन्यासों की श्रृंखला में हिन्दी में हजारों उपन्यास आए, जो विषयों के प्रतिपादन में नए चौंका देने वाले विषय लेकर उपस्थित हुए। कई उपन्यास ... Read More...

वो हत्या जिसने सोवियत संघ को हिला दिया : समीक्षा (अनीश अंकुर)

सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि ती... Read More...

भोजपुरी फिल्मों का सफरनामा: समीक्षा (रविशंकर)

"सिनेमा सबसे नयी, उन्नत और आकर्षक कला है | जिसका असर जादू की तरह होता है | तब ये कैसे हो सकता है कि कोई भाषा अपने को इस जादू से दूर रखे | भोजपुरी  के ... Read More...

गोजर: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

यूं तो कहानी बहुत पहले लिखी गई .... लेकिन आज पढ़ते हुए लगता है जैसे हम सब पूरा समाज असहाय गोजर (कांतर) बनता जा रहा है और ऊपर रखी अनचाही ईंट का वज़न लगात... Read More...

महापंचायत…: कहानी (अभिषेक प्रकाश)

अभिषेक की कलम खासकर साहित्यिक विधा के तौर पर पूर्व नियोजित होकर लिखने की आदी  नहीं है | हाँ बस वे मानव जीवन की घटना परिघटनाओं पर वौद्धिक क्रिया-या प्र... Read More...