‘अश्विनी आश्विन’ की तीन ग़ज़लें

'अश्विनी आश्विन' की तीन ग़ज़लें  अश्विनी आश्विन 1-  जो भरे-बाज़ार, सब के बीच, नंगा हो गया। वो सियासतदां, शहर का फिर मसीहा हो गया।। फिर चले चाकू-छ... Read More...

कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग: समीक्षा

कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग  -: श्रीराम तिवारी :- जीवन के अंत में ही मुक्तिबोध का एक ढ़ीला-ढ़ाला कविता-संग्रह आया। उनकी एक कविता को पाठ्य... Read More...

घर वापसी : एवं अन्य कवितायेँ

ये कवितायें एक तरफ जीवन से रूप,रंग गंध लेती हैं तो दूसरी तरफ समाज की नब्ज़ पर भी हाथ रखती हैं। पितृसत्ता के आवरण में चलने वाले शोषण और फरेब के अनेक रूप... Read More...

जिस्म की गिरफ़्त : कवितायें (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

सामाजिक बुनावट से त्रिस्कृत  और अछूत जिन्दगी के मानवीय पहलुओं को रेखांकित करती, कथित सभ्य समाज को खुद का विद्रूप चेहरा दिखाती एवं वर्तमान व्यवस्थाओं प... Read More...

चाँद के टुकड़े : कवितायें (ब्रजेश कानूनगो)

अगर जीवन में प्रेम न हो तो जिन्दगी बेज़ार हो जाती है | संसार की उत्पत्ति ही प्रेम की धुरी पर टिकी है | प्रेम के उसी  स्पंदन की खूबसूरत अनुभूति को सहज ह... Read More...

आत्महत्या, एवं अन्य कवितायें (शहनाज़ इमरानी)

सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से निरंतर होते मानवीय क्षरण को देखती 'शहनाज़ इमरानी' की कवितायें ......... आत्महत्या  शहनाज़ इमरानी आत्महत्या पलायन है... Read More...

दो गज़ ज़मीन, एवं अन्य कवितायें (अनुकृति झा)

हमरंग प्रतिवद्ध है उन तमाम संभावनाओं से परिपूर्ण कलमकारों को स्थान देने के लिए जो अपनी रचनाओं को लेकर किसी विशिष्टता के विभ्रम में नहीं हैं बल्कि स्पष... Read More...

तारीख पे तारीख…., कविता (तरसेम कौर)

देश के किसी भी नागरिक को समय पर न्याय न मिल पाना भी हमारे सरकारी तंत्र और लचर क़ानून व्यवस्था की पोल तो खोलता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि  सदियो... Read More...

‘जपते रहो’ कविता (अनुपम त्रिपाठी)

युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आ... Read More...

ओह दाना मांझी तुम भी न, एवं अन्य कवितायें (अशोक कुमार)

कम शब्दों में बड़ी बात कहने का सामर्थ्य रखती है कविता | जैसे मिर्ची का एक बीज जो झनझना सकता है दिमाग तक | शब्दों की घनी बुनावट के बिना भी जिंदगी के गहर... Read More...