उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल….

उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल.... १-   उपेन्द्र परवाज़ आँख के मौसम जो बरसे, ज़िस्म पत्थर हो गये अब के सावन बारिशों से, बादल ही तर हो गये | इस कदर ... Read More...

मंडी हाउस में एक शाम: एवं अन्य कविताएँ (अंकिता पंवार)

कविता प्रेम है, प्रकृति है, सौन्दर्य है और सबसे ऊपर एक माध्यम है खुद के प्रतीक बिम्बों में समाज के धूसर यथार्थ को उकेरने का | जैसे खुद से बतियाते हुए ... Read More...

एक मोर्चा एवं अन्य कवितायें : जिजीविषा रजनी

शब्द और संवेदनाओं के सम्मलित एहसास से गुथी जिजीविषा रजनी की कविताएँ सहज ही मानवीय अन्तःकरण में इंसानी उद्वेग को झकझोरती सी प्रतीत होती हैं | जैसे खड़े ... Read More...

नव वर्ष पर ‘अश्विनी आश्विन’ की चंद ग़ज़लें…….

एक और वर्ष का गुज़रना यकीनन मानव सभ्यता का एक क़दम आगे बढ़ जाना, ठहरना…. एक बार पीछे मुड़कर देखना, ताज़ा बने अतीत पर एक विहंगम दृष्टि डालकर सोचना, क्... Read More...

लकीरें— एवं अन्य कविताएँ (रवि सिंह)

संवेदनाएं किसी सीमा, रेखा, पद, प्रतिष्ठा या क़ानून की बंदिश से ऊपर वह मानवीय गुण है जो इंसानी दृष्टि से शुरू होकर प्रेम और करुणा तक जाता है और सम्पूर्ण... Read More...

ओस की बूँदें: एवं अन्य कविताएँ (अर्चना कुमारी)

जैसे बीज को तोड़कर निकलता हो कोई अंकुर | 'अर्चना कुमारी' की कविताओं से गुज़रना भी कुछ ऐसी ही अनुभूति से रूबरू होना है, जब, कविता की साहित्य दृष्टि सामाज... Read More...

प्रदीप कांत की दो ग़ज़लें……

आधुनिकता के साथ गजल की दुनियां में अपनी पहचान बना चुके 'प्रदीप कान्त' अपनी दो बेहतर गजलों के साथ हमरंग पर दस्तक दे रहे हैं ....आपका हमरंग पर स्वागत है... Read More...

धरती भयानक हो गई ! कविता (प्रमोद बेड़िया)

गहरे अर्थों और प्रतीकों के सहारे जैसे इतिहासबोध, आदमी ... न.. सम्पूर्ण मानव जाति, धरती .... नहीं.... धरतियों का जीवन आलाप | सभ्यता या सभ्यता के प्रस्फ... Read More...