अधिकार तो है, पर उनको आप उपयोग में नहीं ले सकते: (प्रो० अपूर्वानंद)

पिछले कुछ समय से अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को रेखांकित करते हुए कई विद्वानों ने इस दौर को अघोषित आपातकाल की संज्ञा तक दे डाली,  इसमें दिल्ली... Read More...

स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात, एक दिन की नहीं होती: (डॉ० नमिता सिंह)

'आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है | आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है| इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा ... Read More...

सांझी संस्कृति की भाषा है, हिंदी और उर्दू- शायर शीन काफ़ निजाम, साक्षात्कार (मोहम्मद हुसैन डायर)

 सांझी संस्कृति की भाषा है, हिंदी और उर्दू मोहम्मद हुसैन डायर खड़ी बोली के दो रूप हैं, हिंदी और उर्दू। हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब को समझने के लि... Read More...

“आंचलिक सांस्कृतिक पहचान है क्षेत्रीय भाषा”, हरदान हर्ष (साक्षात्कार)

साहित्यकार हरदान हर्ष से मोहम्मद हुसैन डायर व ममता नारायण की बातचीत के अंश ........ "आंचलिक सांस्कृतिक पहचान है क्षेत्रीय भाषा", हरदान हर्ष मोहम्मद... Read More...

यादें हैं शेष, इंसान और इंसानियत को ऊँचाई देने वाले कवि की:

कुंवर नारायण (19 सितम्बर, 1927, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते हैं। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भया... Read More...

एक संक्षिप्त परिचय और कवितायें : स्मरण-शेष, वीरेन डंगवाल

इस त्रासद समय में भी 'उजले दिन जरूर आएंगे' का भरोसा दिलाने वाले साथी जन कवि 'वीरेन डंगवाल' हमारे बीच नहीं रहे | आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली ....| इ... Read More...

पढ़ने-गुनने की जगह : संस्मरण (राजेश उत्साही)

"1985 में जब चकमक शुरू हुई तो किताबों से बिलकुल अलग तरह का रिश्‍ता शुरू हुआ।  हर महीने चकमक के लिए सामग्री जुगाड़ने, तैयार करने के लिए घंटों इस पुस्‍त... Read More...

थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन” , डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे... Read More...

एक जिप्सी चितेरे का जीवन संघर्ष: (राजेश चन्द्र)

मुंबई के बीहड़ फुटपाथों पर रात गुज़ारते हुए हुसैन सिनेमा के होर्डिंग बनाने का काम शुरू करते हैं और उनकी गुमनामी के दिन तब समाप्त होते हैं जब वे 1947 में... Read More...

‘मंटो का टाइपराइटर’: किस्से, (सूरज प्रकाश)

कृशन चंदर जब  दिल्‍ली रेडियो में थे, तभी पहले मंटो और फिर अश्‍क भी रेडियो में आ गये थे। तीनों में गाढ़ी छनती थी। चुहलबाजी और छेड़छाड़ उनकी ज़िंदगी का ... Read More...