शांतिनिकेतन की यात्रा : संस्मरण (बाबा मायाराम)

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था, क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लि... Read More...

मेरा मूल नाम कुछ और है…: ‘सलोनी किन्नर’ साक्षात्कार

"हर व्यक्ति की तरह है हम किन्नरों के भी अपने नियम बनाएं हुए है और उनका पालन करना पड़ता है। जैसे रोजमर्रा का काम, नहाना-धोना, पूजा -पाठ करना, मंदिर जान... Read More...

‘आधा गांव’ का सम्पूर्ण दृष्टा, ‘राही’ साक्षात्कार (एम् फीरोज खान)

उर्दू अदब से शुरू होकर हिंदी साहित्य में बड़ा दख़ल रखने वाले 'राही मासूम रज़ा' के व्यक्तित्व और जीवन संघर्षों का परिचायक खुद उनका विपुल साहित्य है बाव... Read More...

मैं, उस नगर की कविता: अंतिम भाग (पद्मनाभ गौतम)

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने ... Read More...

प्रेमचंद एक पुनर्पाठ, के संदर्भ में एक टिपण्णी: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा)

“हमरंग” के संपादकीय आलेख ‘प्रेमचंद एक पुनर्पाठ‘ के संदर्भ में साहित्यकार डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा की एक बड़ी टिपण्णी …&... Read More...

हाँ मैं किन्नर हूँ, ‘मनीषा महंत’ (थर्ड जेंडर) साक्षात्कार

15 अप्रैल 2014 को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा किन्नरों को थर्ड जेंडर घोषित किए जाने के ऐतिहासिक फैसले के बाद इस समुदाय के प्रति समाज में सथापित कथित... Read More...

‘पहचान’ पर एक ख़त: (अनवर सुहैल)

'अनवर सुहैल' के उपन्यास "पहचान" पर 'पाखी' ने किन्ही धर्मव्रत चौधरी की समीक्षा छापी थी..जिसमे उपन्यास की विषयवस्तु और लेखक के औचित्य पर सवाल उठाया गया ... Read More...

मैं, उस नगर की कविता: संस्मरण, दूसरा भाग (पद्मनाभ गौतम)

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक रूप में सामने आना एक अवसर देता है अपने सा... Read More...

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक), पद्मनाभ गौतम

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने ... Read More...

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’ : आलेख (अनीश अंकुर)

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ....या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्राम... Read More...