‘पहचान’ पर एक ख़त: (अनवर सुहैल)

'अनवर सुहैल' के उपन्यास "पहचान" पर 'पाखी' ने किन्ही धर्मव्रत चौधरी की समीक्षा छापी थी..जिसमे उपन्यास की विषयवस्तु और लेखक के औचित्य पर सवाल उठाया गया ... Read More...

मैं, उस नगर की कविता: संस्मरण, दूसरा भाग (पद्मनाभ गौतम)

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक रूप में सामने आना एक अवसर देता है अपने सा... Read More...

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक), पद्मनाभ गौतम

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने ... Read More...

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’ : आलेख (अनीश अंकुर)

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ....या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्राम... Read More...

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. साभार गूगल (तीसरी क़िस्त) हमारे जेहन में हर शब्द के साथ एक या अधिक छवियां जुड़ी होती हैं. मसलन बुंदेलखंड नाम ... Read More...

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरात... Read More...

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

हमरंग के दो वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-... Read More...

‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

एक ऐसे समय में जब चारों तरफ़ बाज़ार का शोर अपने चरम पर है, और एक से बढकर एक मंहगी और विलासी चीज़ों का प्रलोभन दे, लोगों के मन पर हमले कर रहा है ! शहर के ... Read More...

कैसा है इंतिज़ार हुसैन का भारत: साक्षात्कार (मिर्ज़ा ए. बी. बेग)

७ दिसंबर १९२३ को डिवाई बुलंदशहर, भारत में जन्मे इंतज़ार हुसैन पाकिस्तान के अग्रणी कथाकारों में से थे | वे भारत पाकिस्तान के सम्मिलित उर्दू कथा साहित्य... Read More...

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपा... Read More...