आवाज़ों के घेरे : आलेख (डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’)

सामाजिक और राजनैतिक, वैचारिक समानता और द्वन्द के बीच साहित्य से लालित्य और भारतीय संस्कृति के लोक रंग कहीं विरक्त हो रहे हैं | निसंकोच साहित्य की सार्... Read More...

हवा हवाई है हमारा यह अंध राष्ट्रवाद : आलेख (पलाश विस्वास)

"हमें मुल्क की परवाह हो न हो, इस मुल्क के लोगों की परवाह हो न हो, हमें सरहद और देश के नक्शे की बहुत परवाह है। हमें इस देश की जनता की रोजमर्रे की बुनिय... Read More...

राजा रवि वर्मा: दो फ़िल्में, दो नजरिए : फिल्म समीक्षा (प्रो० विजय शर्मा)

"जब कलाकार और उसकी कृतियों की कहानी किसी दूसरे कैनवस पर उकेरी जाती है तो वहाँ बहुत कुछ बदल जाती है। सच्चाई और कल्पना का मिश्रण एक नई कृति रचता है। यही... Read More...

वर्तमान सांस्कृतिक परिदृष्य में रंगकर्म की चुनौतियाँ: आलेख (राजेश कुमार)

लेखक और कलाकार आम जनता से अलग-थलग होने लगे। एकांकी जीवन व्यतीत करने लगे। सामूहिकता व्यक्तिवाद में तब्दील होने लगा। मुगालते में रहने लगे कि जनता के बीच... Read More...

पश्चिमी नारीवाद की अवधारणा और विभिन्न नारीवादी आंदोलन :आलेख (डा0 नमिता सिंह)

"स्त्रियों की अंधेरी दुनियां में रोशनी के प्रवेश की, घर-परिवार की चारदीवारी के भीतर सामाजिक-धार्मिक बंधनों में जकड़ी स्त्री मुक्ति की कहानी लगभग अठारह... Read More...

‘कही-अनकही’ कविता की : समीक्षात्मक आलेख (निलय उपाध्याय)

                                                                 जिएऔर लिखे के बीच का फ़र्क नीलकमल दिखे और लिखे से झांकने लगे पकडना ... Read More...

सिनेमाई स्त्री का विकास और इतिहास : आलेख (डॉ.यशस्विनी पाण्डेय)

परिवार और राष्ट्र की धुरी 'स्त्री' द्वारा दुनिया में लड़ी गई 'स्त्री मुक्ति और अस्मिता' की लड़ाई का इतिहास सदियों पुराना है | इन आंदोलनों के विभिन्न रूप... Read More...

इनाम और ओहदे लौटाने से क्या होगा ? : आलेख ( विष्णु खरे )

"आज जिस पतित अवस्था में वह है, उसके लिए स्वयं लेखक जिम्मेदार हैं, जो अकादेमी पुरस्कार और अन्य फायदों के लिए कभी चुप्पी, कभी मिलीभगत की रणनीति अख्तियार... Read More...

हिन्दी के प्रयोग में सोशल मीडिया की भूमिका : आलेख (ब्रजेश कानूनगो )

ऐसे में सोशल मीडिया अपने तमाम खतरों और अतिवादी प्रकृति के बावजूद भाषा विशेषकर हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रसार में बहुत मददगार हो सकता है. हुआ भी है... Read More...

सामाजिक व्यवस्था का केन्द्र परिवार: आलेख (आशीष मिश्र)

सृजन और सृजनात्मकता की सार्थकता इससे और भी बढ़ जाती है जब पाठक उसे पढ़ते हुए लेखकीय परिकल्पना से एक कदम आगे जा कर उसे सोचने, समझने और मूल्यांकन करने को ... Read More...