बाबा नागार्जुन’ सा कोई नहीं: आलेख (सूरज प्रकाश)

बिहार के धधकते खेत-खलिहानों के खेत-मजदूरों के दर्द को अपनी कविताओं से बुलंद आवाज़ देने वाले जनकवि “बाबा नागर्जुन” का व्यक्तित्व महज़ कविता लेखन तक ही सी... Read More...

सांस्कृतिक मसलों पर राजनीतिक पक्षधरता: आलेख (अनीश अंकुर)

विश्वविख्यात सांस्कृतिक चिंतक अर्डाेनो कहते हैं ‘‘ संस्कृति के सवाल अंततः प्रशासनिक प्रश्न होते हैं ।’’ खास सियासी पक्षधरता वाले संस्कृतिकर्मी अपनी रा... Read More...

सोशल मीडिया का दिशा प्रवाह….! आलेख (सीमा आरिफ)

सोशल मीडिया,विकी,पॉडकास्ट,वेबब्लॉग,मिक्रोब्लॉगिंग जैसे टूल्स ने लोगो के ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ एक क्लिक से पूरी दुन... Read More...

सज्जाद ज़हीर: तरक्कीपसंद तहरीक के रूहेरवां: आलेख (जाहिद खान)

"मेरी यह छोटी सी किताब प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े उन तमाम कलमकारों, फनकारों, और संस्कृतिकर्मियों के नाम, जिन्होंने अपने लेखन और कला से कभी समझौता नहीं क... Read More...

विद्यार्थी को पतन की ओर ले जाती माता पिता की महत्वाकांक्षा: आलेख (पंकज प्रखर)

आज खुशहली के मायने बदल रहे है अभिभावक अपने बच्चे को हर क्षेत्र में अव्वल देखने व सामाजिक दिखावे के चलते उन्हें मार्ग से भटका रहे है। एक प्रतिशत के लिए... Read More...

सारे दृश्य बदल रहे हैं….: आलेख (नीलाभ अश्क़)

युवा कविता का समालोचना के साथ जायजा लेने का प्रयास कर रहे हैं नीलाभ अश्क | उनकी इस अंतर्दृष्टिय कविता यात्रा में कविता के स्वरुप, सम्प्रेषण, संवेदनशील... Read More...

दो दिलचस्प उबाऊ किताबें : आलेख (उज्जवल भट्टाचार्य)

दो दिलचस्प उबाऊ किताबें  बर्लिन दीवार गिरने के बाद एक मुहावरा बन गई. अब भी इसके इस्तेमाल की कोशिश जारी है. यहां तक तो ठीक था, लेकिन पूंजीवाद की इस... Read More...

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. साभार गूगल (तीसरी क़िस्त) हमारे जेहन में हर शब्द के साथ एक या अधिक छवियां जुड़ी होती हैं. मसलन बुंदेलखंड नाम ... Read More...

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

"प्रेम क्या है? प्रेम में पड़ना क्या होता है? इसे लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता है फ़िर भी युगों-युगों से प्रेम पर लिखा जाता रहा है, आगे भी लिखा जाता ... Read More...

राष्ट्रगान की लय से टकराती बिदेसिया की धुन: आलेख (अनीश अंकुर)

राजनीतिक सत्ता समाज के हाशिए पर रहने वाले बहिष्कृत  तबकों केा भले ही पहचान अब मिली हो लेकिन भिखारी ठाकुर ने हमेशा अपने नाटकों के नायक इन तबकों से आने ... Read More...