दो दिलचस्प उबाऊ किताबें : आलेख (उज्जवल भट्टाचार्य)

दो दिलचस्प उबाऊ किताबें  बर्लिन दीवार गिरने के बाद एक मुहावरा बन गई. अब भी इसके इस्तेमाल की कोशिश जारी है. यहां तक तो ठीक था, लेकिन पूंजीवाद की इस... Read More...

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. (विनय सुल्तान)

सुसाइड नोट: ‘बस मरना ही हमारे हिस्से है.. साभार गूगल (तीसरी क़िस्त) हमारे जेहन में हर शब्द के साथ एक या अधिक छवियां जुड़ी होती हैं. मसलन बुंदेलखंड नाम ... Read More...

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

"प्रेम क्या है? प्रेम में पड़ना क्या होता है? इसे लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता है फ़िर भी युगों-युगों से प्रेम पर लिखा जाता रहा है, आगे भी लिखा जाता ... Read More...

राष्ट्रगान की लय से टकराती बिदेसिया की धुन: आलेख (अनीश अंकुर)

राजनीतिक सत्ता समाज के हाशिए पर रहने वाले बहिष्कृत  तबकों केा भले ही पहचान अब मिली हो लेकिन भिखारी ठाकुर ने हमेशा अपने नाटकों के नायक इन तबकों से आने ... Read More...

विदेशी पूंजी निवेश की अनियंत्रित बाढ़ (डब्ल्यू. टी. ओ.) (डॉ0 नमिता सिंह)

'आज़ादी के बाद अपने देश के सुयोग्य वैज्ञानिकों और नयी खोजों में लगी प्रतिभाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में नयी तकनीकों का निर्माण कर अपने बलबूते रक्षा और अ... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘तीसरी क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

सुसंगठित रूप में स्त्री अधिकारों के लिये आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरूआती दशक से ही माने जा सकते हैं। लैंगिक असमानता की पोषक... Read More...

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर)

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मा... Read More...

मेरे समय में नेहरू: आलेख (अभिषेक प्रकाश)

नेहरू को हमने किताबों के माध्यम से जाना जरूर पर सबसे शिद्दत से मोदी युग में ही महसूस किया। एक घटना याद आ रही है मुझे जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मै... Read More...

दुख-सुख के साझीदार, ‘मुक्तिबोध’: आलेख (नासिरूद्दीन)

मुक्तिबोध की पैदाइश का सौंवा साल चल रहा है. 2017 में वे सौ साल के होते. तीन दशक पहले सामाजिक बदलाव के आंदोलनों से जुड़े हमारे जैसे नौजवान लड़के-लड़किय... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘दूसरी क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

स्त्रीवाद या नारीवाद या नारी विमर्श (फेमिनिज़्म) की जब बात की जाती है तो इसका तात्पर्य स्त्रियों के लिये समान अधिकार तथा उनका कानूनी संरक्षण है। प्रार... Read More...