डिजिटल के भरोसे में: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘हर अच्छी चीज का विरोध करने की तुमको आदत हो गयी है. जब हमने सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेजा था तब भी तुमने विरोध किया था.अब वही देखो कितनी मदद कर रहा है हम... Read More...

बायपास के पास : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘लेकिन यहाँ पोहे-जलेबी नहीं है..दोस्त नहीं हैं.. गांधी चौराहे का धरना प्रदर्शन नहीं है..लायब्रेरी नहीं है..गोष्ठी नहीं है..कविता नहीं है...इनके बगैर म... Read More...

‘पद यात्रा,‘पद’ और ‘अंतिम यात्रा: व्यंग्य (देवेन्द्र सिंह सिसौदिया)

व्यंग्यकार की दृष्टि खुद से लेकर अपने आस-पास, सामाजिक और राजनैतिक क्रिया कलापों और घटनाओं,  जो आम तौर पर सामान्य घटनाओं की तरह ही दिखाती हैं, उनमें से... Read More...

शौचालय चिंतन: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व... Read More...

पिंकीसिंह की प्रेरक कहानी, उर्फ़ पिक्चर अभी बाकी है..: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

महात्मा जी ने कभी स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था हमें। देश की हर सरकार बापू के विचारों को अपनाने को कृत संकल्पित रहती है, न भी रहती है तो यह विश्वास दिलाने ... Read More...

ईमानदारी का पर्व और वो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

बीवी ने समझाया कि तुम काम पर जाओ मैं जाकर लाइन में लग जाऊँगी बच्ची छोटी है तो क्या हुआ? घर में मरीज है तो क्या हुआ ? किसी न किसी को तो बैंक जाना होगा ... Read More...

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धं... Read More...

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

"कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं ह... Read More...

ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर: व्यंग्य (आरिफा एविस)

नेताजी: "बिना समर्थन के आपको जल, जंगल और जमीन का पुश्तैनी हक़ कैसे मिल सकता है? जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है फिर तुम्ह... Read More...