आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धं... Read More...

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

"कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं ह... Read More...

ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर: व्यंग्य (आरिफा एविस)

नेताजी: "बिना समर्थन के आपको जल, जंगल और जमीन का पुश्तैनी हक़ कैसे मिल सकता है? जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है फिर तुम्ह... Read More...

गुस्से की गूँज: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

यद्यपि गुस्से को पी जाने का सटीक फार्मूला हमारे संत महात्मा बहुत पहले से बता गए हैं लेकिन अब ऐसा सम्भव नही रह गया है, क्योंकि पीने के लिए अब बहुत सी च... Read More...

शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार: व्यंग्य (आरिफा एविस)

यह जंगलराज के गर्व की बात है कि जन्मजात राजा ही जंगल पर राज करे. राजा ने ये एलान कर दिया कि वह जन्मजात अधिकारों को कभी भी जंगल से हटने नहीं देगा. जो भ... Read More...

पानी नहीं है तो क्या हुआ कोक पियो, खेल देखो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

"करीब दस राज्यों के साथ महाराष्ट्र के कई जिले सूखा ग्रस्त घोषित कर दिये गए. लेकिन अब लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं, अगर कोई किसान पानी के नाम पर द... Read More...

फिर बच जाएंगे रंगों से : व्यंग्य(ब्रजेश कानूनगो)

होली पर विशेष ...... होली की अशीम बधाइयों के साथ ..... हमरंग के पाठकों के लिए  फिर बच जाएंगे रंगों से ब्रजेश कानूनगो मेरा विश्वास है कि वे इस बार ... Read More...

मई दिवस की संघर्ष गाथा: व्यंग्य (आरिफा एविस)

दिल्ली एन.सी.आर से सटे हुए क्षेत्र पूरी तरह से मजदूर बस्ती के रूप में पहचाने जाते हैं. हर रोज लाखों लोग 5 से 10 हजार रुपये तक की नौकरी करने के लिए दिल... Read More...

बहिष्कारी तिरस्कारी व्यापारी : व्यंग्य (आरिफा एविस)

भारत एक त्यौहारों वाला देश है तब ऐसे सीजन में त्यौहारी वक्तव्यों का सीजन न हो ऐसे कैसे हो सकता है? यूँ तो हमें किसी बात से गुरेज नहीं लेकिन कोई अगर हम... Read More...

बोलो अच्छे दिन आ गये: व्यंग्य (आरिफा एविस)

पुलिस विभाग देशद्रोही, आतंकवादियों, आदिवासियों, किसानों और छात्रों को नियन्त्रित करने में लगी है | क्या यह हमारी सफलता नहीं है? क्या ये सब अच्छे दिनों... Read More...