अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवा... Read More...

सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त, ‘कहानी २’ आलेख (सैयद एस तौहीद)

सेक्सुअल शोषण की काली हकीक़त, 'कहानी २'  एस तौहीद शहबाज़ शोषण के हर रुप का विरोध ज़रूरी है. यह किसी भी रुप में मौजूद हो सकता है.सुजॉय घोष की हालिया '... Read More...

अवचेतन की चेतन से लड़ाई: ‘तमाशा’ (मजकूर आलम)

ऐसे ऊपर से शांत दिखने वाले अशांत समुन्दर में अगर कोई कंकड़ी भी मार दे तो जाहिर है कि उसमें हलचल मचेगी ही। और यही काम करती है तारा। और, अगर समुद्र में ह... Read More...

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

जिंदगी में प्यार बहुत से रिश्तों से मिलता है लेकिन हमें बचपन से भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है. रोओ तो कहा जाता है रोते नहीं, स्ट्रांग बनो. किसी पर ग... Read More...

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्य... Read More...

झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी…! ‘द जंगल बुक’ फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी…! ‘द जंगल बुक’ फिल्म समीक्षा  संध्या नवोदिता -: (संध्या नवोदिता) जंगल का है यह क़ानून ..  कि झुण्ड में रहना होता है ज़... Read More...