हर व्यक्ति के दिमाग की हार्ड डिस्क में बचपन की अनेक स्मृतियाँ अंकित होती हैं, जब भी इस बाजारी भाग दौड़ से थककर थोड़े फुर्सत के पल मिलते है तो हम उन यादों में खो जाते हैं और ये यादों हमें अन्दर ही अन्दर गुदगुदाने लगती हैं |अगर बात साइकिल की हो तो ये यादें और भी रोचक हो जाती हैं |ऐसी ही अपनी साइकिल की याद को एक लघु कथा के माध्यम से सांझा कर रहे हैं बाबा मायाराम ….. सम्पादक Roblox HackBigo Live Beans HackYUGIOH DUEL LINKS HACKPokemon Duel HackRoblox HackPixel Gun 3d HackGrowtopia HackClash Royale Hackmy cafe recipes stories hackMobile Legends HackMobile Strike Hack

साइकिल की सैर

बाबा मायाराम

शुक्रवार का दिन था। सुबह जल्द नींद खुल गई। घर में कुछ खटर-पटर की आवाज आ रही थी। आंगन में आकर देखा तो बब्बा अपनी साईकिल ठीक कर रहे थे। वे हाथ में पिचिंग लेकर उसके पैडलों को सुधारने की कोशिश कर रहे थे। स्टैंड पर खड़ी साईकिल के पहिये तेजी से घूमते जा रहे थे।
लेकिन जब बहुत देर हो गई और वे उसकी मरम्मर न पाए तो अचानक उठे और बोले, “चलो बढ़ई के पास चलते हैं।” मैं कुछ समझ न पाया” और पूछा, “क्यों?” वे बोले, “चलो तो तुम।”
हम बढ़ई के पास गए। बब्बा ने बढ़ई को साईकिल का एक पैडल दिखाते हुए कहा, “ऐसा पैडल लकड़ी का बनवाना है।” बढ़ई ने कहा, “क्या करोगे ? ये तो आपको दुकान पर मिल जाएगा।”
बब्बा ने कहा, “लेकिन यहां तो कोई दुकान नहीं। इसमें आइलिंग व ग्रीसिंग की समस्या भी नहीं रहेगी। लकड़ी के पैडल ज्यादा घिसेंगे नहीं। आप तो बना दीजिए।”
बढ़ई ने दो लकड़ी के गट्टे ढूंढे़। उन्हें पैडलनुमा बनाया और फिर उनमें बीच में छेद कर दिया। और कहा, “लो आपके पैडल बनकर तैयार हैं। फिट कर लीजिए।”
हमने घर आकर साईकिल में नए पैडल लगाए। अब साईकिल सवारी के लिए तैयार थी।
गांव में साईकिल मरम्मत की कोई दुकान नहीं थी। साईकिल भी कम लोगों के पास थी। ज्यादातर लोग एक जगह से दूसरी जगह पैदल ही जाते थे। हमारे घर पुरानी साईकिल थी जिसे बिगड़ने पर बब्बा ही सुधारते थे।
साईकिल में हवा भरना, हवा भरने वाले पंप को सुधारने, टायर फटने पर उसे सुई धागे से सिलना और उसमें गेटर डालना इत्यादि। उनकी यह बात मुझे बहुत अच्छी लगती थी।
थोड़ी देर में ही हम बाजार के लिए साईकिल पर सवार होकर निकल पड़े।
बाजार जाने की मुझे बहुत खुशी हो रही थी। खासतौर पर जब बब्बा ने यह भी बताया था कि वहां मेला भी लगा है। हमारी साईकिल तेजी से दौड़ रही थी। बब्बा ने नीले रंग की कमीज, लाल जेकैट व धोती पहन रखी थी। मैं हाफ पेंट व शर्ट पहने हुए मजे से साईकिल के कैरियर पर पीछे बैठा हुआ था।
हरे-भरे खेत, खेतों में काम करते किसान पीछे छूटते जा रहे थे। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे पैदल चलने वाले लोग ,धीरे-धीरे चर्र चूं करती बैलगाड़ियां और इक्का -दुक्का वाहन मिल रहे थे। सड़क के दोनों ओर बबूल के पेड़ थे। बकरियां और गाय-बैल चराने वाले चरवाहे अपने मवेशी चरा रहे थे। जब हम ठैनी गांव पहुंचे तो हमने बनखेड़ी पहुंचने के लिए सड़क छोड़कर बैलगाड़ी का रास्ता पकड़ा।
ओल नदी में पानी साफ था। छोटे-बड़े पत्थरों पर से छल-छल, कल-कल बहते हुए पानी को देखना बहुत ही अच्छा लग रहा था। नदी पर रेल का बड़ा पुल था। उसी समय छुक-छुक पुल से रेल गुजरी। उसकी आवाज सुनकर मैं सहम गया।
अब हम बाजार में पहुंच गए। मेले में स्थान पर बाजार लगा था। स्कूल के पीछे बड़े मैदान में मेला लगा था। वहां मिठाई की दुकानें, कड़ाई, करछली, झारे जैसे घरेलू सामानों की दूकानें, चाय और चाट की दूकानें लगी थी।
मैदान में बैलगाड़ी दौड़ होने वाली थी। इसकी सूचना माईक पर दी जा रही थी। वहां भारी भीड़ थी। दौड़ देखने के लिए लोग पेड़ों पर भी बैठे हुए थे। मैदान में चूने से लाइनें खीची गई थी।
तीन झकड़ा बग्घियां दौड़ने के लिए तैयार थी । रैफरी के सीटी बजाते ही बग्घियां दौड़ पड़ी। बैल हवा से बातें करने लगे। जोर-जोर से आवाज लगाते बैलों के हक्कैया उन पर हकनियों से वार करते। उन्हें जोर से दौड़ाने के लिए चिल्लाते। भीड़ उनके पीछे भागती। लोगों के उत्साह का ठिकाना न रहा। भीड़ की भगदड़ में मेरी चप्पल छूट गई।
कुछ देर तक हम मेले में घूमते रहे। बब्बा ने मुझे चाट खिलाया और गाय के लिए एक रस्सी खरीदी। हरी सब्जियां लेकर हम घर लौट आए। साईकिल की सवारी और मेला मुझे दोनों बरसों बाद भी याद हैं। क्या आप भी ऐसी यात्रा करोगे?

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